गैस संकट से प्रभावित ‘मुख्यमंत्री दाल-भात योजना’, अब लकड़ी-कोयले पर बन रहा भोजन

Shashi Bhushan Kumar

राजधानी रांची में रसोई गैस की किल्लत का असर अब आम घरों और होटलों से आगे बढ़कर सरकारी योजनाओं पर भी दिखने लगा है। झारखंड सरकार की महत्वाकांक्षी ‘मुख्यमंत्री दाल-भात योजना’ भी इस संकट से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। सदर अस्पताल स्थित दाल-भात केंद्र में अब गैस के अभाव में लकड़ी और कोयले के सहारे भोजन तैयार किया जा रहा है।

गौरतलब है कि वर्ष 2011 में शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य गरीबों और जरूरतमंदों को सस्ती दर पर भोजन उपलब्ध कराना है। लेकिन वर्तमान में गैस आपूर्ति बाधित होने के कारण व्यवस्था प्रभावित हो गई है।

लकड़ी खरीदकर चल रहा काम

केंद्र की संचालिका सूती कुमारी ने बताया कि रसोई गैस नहीं मिलने के कारण उन्हें बाजार से लकड़ी खरीदनी पड़ रही है, जिसकी कीमत लगभग 10 रुपये प्रति किलो है। उन्होंने बताया कि केंद्र पर प्रतिदिन 600 से अधिक लोग भोजन करने आते हैं, जिनमें अस्पताल के मरीजों के परिजन और मजदूर वर्ग के लोग शामिल होते हैं।

लकड़ी पर खाना बनाने में अधिक समय लगने के कारण लोगों को भोजन के लिए लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। सुबह से ही लकड़ी काटने और चूल्हा तैयार करने का काम शुरू हो जाता है, जिसके बाद काफी मेहनत से भोजन तैयार किया जाता है।

कोयले की कीमत में भी बढ़ोतरी

संचालिका ने बताया कि पहले कोयला 300 रुपये में मिल जाता था, लेकिन अब इसकी कीमत बढ़कर 600 रुपये हो गई है, जिससे लागत दोगुनी हो गई है और संचालन में कठिनाई बढ़ गई है।

सरकारी योजना पर बढ़ता दबाव

देशभर में एलपीजी गैस की आपूर्ति और कीमतों को लेकर बनी स्थिति का असर अब इस तरह की जनकल्याणकारी योजनाओं पर भी पड़ने लगा है। ‘मुख्यमंत्री दाल-भात योजना’, जो गरीबों के लिए जीवनरेखा मानी जाती है, मौजूदा हालात में संसाधनों की कमी से जूझ रही है।

Share This Article
शशी भूषण कुमार | पत्रकार (Journalist)- शशी भूषण कुमार 12+ वर्षों के अनुभव वाले पत्रकार हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में कार्य करते हुए वर्तमान में Live 7 TV.com में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में संपादकीय नेतृत्व और न्यूज़ प्लानिंग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे पिछले तीन वर्षों से झारखंड स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग के गेस्ट फैकल्टी भी हैं। ग्रामीण पत्रकारिता पर शोध कार्य से जुड़े रहते हुए वे जमीनी और आदिवासी क्षेत्रों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
Leave a Comment