RANCHI
राज्य में बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स, 2016 के सख्त पालन को सुनिश्चित करने के लिए झारखंड हाईकोर्ट ने 19 बिंदुओं में विस्तृत निर्देश जारी किए हैं। साथ ही वर्ष 2012 से लंबित जनहित याचिका का निपटारा कर दिया गया।
मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की पीठ ने राज्य सरकार को 30 दिनों के भीतर सचिव स्तर के एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करने का आदेश दिया। यह अधिकारी विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर बायो-मेडिकल कचरे के प्रबंधन की निगरानी करेंगे।
अदालत ने झारखंड राज्य प्रदूषण नियंत्रण पर्षद को निर्देश दिया कि वह सभी जिलों के अस्पतालों और अधिकृत कॉमन बायो-मेडिकल वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट की अद्यतन सूची तैयार रखे। कचरे की उत्पत्ति से अंतिम निस्तारण तक बारकोड आधारित डिजिटल ट्रैकिंग प्रणाली लागू करने को भी कहा गया है।
नियमों के पालन की जांच के लिए नियमित और औचक निरीक्षण करने के निर्देश दिए गए हैं। उल्लंघन की स्थिति में पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। जिलों के उपायुक्तों को सुनिश्चित करना होगा कि अस्पतालों का कचरा सामान्य शहरी कचरे में न मिले।
30 से अधिक बिस्तरों वाले अस्पतालों में बायो-मेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट कमेटी का गठन अनिवार्य किया गया है, जबकि छोटे अस्पतालों को एक जिम्मेदार अधिकारी नामित कर उसका संपर्क विवरण सार्वजनिक करना होगा।
यह मामला वर्ष 2012 में रांची, धनबाद और जमशेदपुर में संक्रमित चिकित्सा कचरा खुले में फेंके जाने के आरोपों के बाद दायर जनहित याचिका से जुड़ा था। अदालत ने माना कि पिछले वर्षों में निगरानी के कारण राज्य में बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है और कई ट्रीटमेंट प्लांट अब संचालित हो रहे हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 से जुड़ा है। हालांकि अब निरंतर न्यायिक निगरानी की आवश्यकता नहीं है, लेकिन भविष्य में किसी भी उल्लंघन की स्थिति में संबंधित पक्ष विधिक उपाय अपना सकते हैं।

