हर 4 में से 1 स्तन कैंसर मरीज में खानदानी जीन का असरः आईआईटी की रिसर्च

Shashi Bhushan Kumar

नई दिल्ली में किए गए एक व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन ने भारत में स्तन कैंसर को लेकर नई तस्वीर पेश की है। आईआईटी मद्रास और कार्किनोस हेल्थकेयर के वैज्ञानिकों द्वारा संयुक्त रूप से किए गए शोध में पाया गया है कि भारत में हर चार में से एक स्तन कैंसर मरीज में बीमारी का संबंध वंशानुगत जीन बदलाव से है।

अध्ययन के अनुसार, स्तन कैंसर को केवल उम्र, खानपान या जीवनशैली से जोड़कर देखना पर्याप्त नहीं है। बड़ी संख्या में मामलों के पीछे पारिवारिक आनुवंशिक कारण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते व्यापक जीन जांच कर ली जाए तो न केवल बीमारी का जोखिम पहले पहचाना जा सकता है, बल्कि उपचार को अधिक सटीक और प्रभावी बनाया जा सकता है।

शोध में यह भी सामने आया कि यदि किसी मरीज में खतरनाक जीन परिवर्तन पाया जाता है, तो उसके भाई-बहन, बच्चे और अन्य रिश्तेदारों में भी वही जोखिम मौजूद हो सकता है। ऐसे मामलों में परिवार के अन्य सदस्यों की समय पर जांच कर शुरुआती अवस्था में कैंसर की पहचान संभव है। कुछ परिस्थितियों में निवारक उपचार या नियमित चिकित्सकीय निगरानी भी शुरू की जा सकती है।

इस अध्ययन में 479 स्तन कैंसर मरीजों के रक्त नमूनों से जर्मलाइन डीएनए की जांच की गई। जर्मलाइन जीन वे आनुवंशिक तत्व होते हैं जो माता-पिता से संतान को प्राप्त होते हैं। शोधकर्ताओं ने कुल 97 अलग-अलग जीन का विश्लेषण किया। अब तक भारत में अधिकांश जांच केवल बीआरसीए1 और बीआरसीए2 जीन तक सीमित रहती थी, लेकिन इस अध्ययन ने दिखाया कि बीमारी का दायरा इससे कहीं अधिक व्यापक है।

रिपोर्ट के अनुसार लगभग 24.6 प्रतिशत मरीजों में गंभीर जीन बदलाव पाए गए। इनमें से केवल करीब 8.35 प्रतिशत मामलों में बीआरसीए1 या बीआरसीए2 जीन जिम्मेदार थे, जबकि शेष अधिकांश मामलों में अन्य जीन की भूमिका सामने आई। लगभग 11.9 प्रतिशत मरीजों में ऐसे जीन प्रभावित पाए गए जो शरीर की डीएनए मरम्मत प्रणाली से जुड़े होते हैं।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि कुछ जीन परिवर्तन ऐसे हैं जो कीमोथेरेपी दवाओं के प्रति शरीर की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। यदि इलाज शुरू होने से पहले जीन संबंधी जानकारी उपलब्ध हो, तो दवाओं की मात्रा समायोजित की जा सकती है या वैकल्पिक उपचार चुना जा सकता है। इससे गंभीर दुष्प्रभावों से बचाव और उपचार को अधिक सुरक्षित व व्यक्तिगत बनाया जा सकता है।

शोध का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि कई जीन परिवर्तन भारतीय आबादी में विशिष्ट रूप से पाए गए, जो अन्य देशों में बहुत कम देखे जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि भारत के लिए अलग आनुवंशिक डाटाबेस और स्थानीय आबादी के अनुरूप जांच व उपचार दिशानिर्देश विकसित किए जाने की आवश्यकता है।

विशेषज्ञों का मत है कि अब केवल सीमित जीन जांच के बजाय बहु-जीन पैनल परीक्षण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर समग्र जीन नीति तैयार कर सरकारी और निजी अस्पतालों में व्यापक व सुलभ जीन जांच की व्यवस्था विकसित करना समय की मांग है।

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शशी भूषण कुमार | पत्रकार (Journalist)- शशी भूषण कुमार 12+ वर्षों के अनुभव वाले पत्रकार हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में कार्य करते हुए वर्तमान में Live 7 TV.com में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में संपादकीय नेतृत्व और न्यूज़ प्लानिंग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे पिछले तीन वर्षों से झारखंड स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग के गेस्ट फैकल्टी भी हैं। ग्रामीण पत्रकारिता पर शोध कार्य से जुड़े रहते हुए वे जमीनी और आदिवासी क्षेत्रों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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