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केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण) यानी जी-राम-जी को यदि कानून का रूप दिया जाता है, तो इसका सीधा असर झारखंड की वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों और उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस नई व्यवस्था से राज्य सरकार को औसतन हर वर्ष करीब 1000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ सकता है।
वर्तमान में ग्रामीण रोजगार की गारंटी के लिए लागू महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत केंद्र सरकार मजदूरी की पूरी राशि वहन करती है। इसके अलावा योजनाओं में लगने वाली सामग्री लागत का 75 प्रतिशत केंद्र और 25 प्रतिशत राज्य सरकार देती है। इस तरह किसी भी मनरेगा योजना में कुल खर्च का लगभग 90 प्रतिशत केंद्र और केवल 10 प्रतिशत राज्य सरकार पर आता है।
जी-राम-जी में बदलेगा फंडिंग पैटर्न
मनरेगा के स्थान पर प्रस्तावित जी-राम-जी योजना में रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 दिन करने का प्रावधान है, लेकिन इसके साथ ही फंडिंग पैटर्न में बड़ा बदलाव किया गया है। इस नई योजना में कुल खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार और 40 प्रतिशत राज्य सरकार वहन करेगी। इससे राज्य सरकार पर वित्तीय दबाव काफी बढ़ जाएगा।
विश्लेषण के अनुसार, इस बदले हुए अनुपात के कारण झारखंड को मनरेगा की तुलना में योजनाओं पर 2.69 गुना अधिक खर्च करना होगा। यही कारण है कि राज्य सरकार को हर साल कम से कम 1000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार झेलना पड़ सकता है।
घटती जा रही है मनरेगा की केंद्रीय सहायता
आंकड़े बताते हैं कि झारखंड को मनरेगा मद में मिलने वाली केंद्रीय राशि में बीते वर्षों में लगातार गिरावट आई है।
- वर्ष 2020-21 में झारखंड को 3489.83 करोड़ रुपये मिले थे
- 2024-25 में यह राशि घटकर 2721.53 करोड़ रुपये रह गई
- 2025-26 में अब तक 2443.98 करोड़ रुपये ही प्राप्त हुए हैं
ऐसे में नई योजना के तहत राज्य की हिस्सेदारी बढ़ने से स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
एक योजना से समझें फर्क
मनरेगा के तहत यदि 4.24 लाख रुपये की लागत से एक सिंचाई कूप बनाया जाता है, तो मौजूदा व्यवस्था में राज्य सरकार का खर्च करीब 63 हजार रुपये होता है। वहीं जी-राम-जी योजना लागू होने पर उसी कार्य के लिए राज्य सरकार को लगभग 1.70 लाख रुपये खर्च करने होंगे। यानी एक ही योजना में राज्य का व्यय कई गुना बढ़ जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि मनरेगा के स्थान पर प्रस्तावित जी-राम-जी योजना रोजगार के अवसर बढ़ाने का दावा तो करती है, लेकिन वित्तीय हिस्सेदारी में बदलाव से झारखंड जैसे राज्यों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ेगा। यदि केंद्र और राज्य के बीच वित्तीय संतुलन नहीं बनाया गया, तो इससे राज्य की अन्य विकास योजनाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।

