संताली भाषा लिखने, बोलने और पढ़ने वाले देश-विदेश में फैले करीब 80 लाख से अधिक लोगों के लिए ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण दिन है। दशकों तक चले संघर्ष और लंबे आंदोलन के बाद वर्ष 2003 में इसी दिन संताली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था। तभी से हर वर्ष 22 दिसंबर को ‘संताली विजय दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम के आदिवासी अंचलों के साथ-साथ बांग्लादेश, नेपाल और भूटान में भी संताली भाषा व्यापक रूप से बोली जाती है। एक समय गांवों की चौपालों और लोकजीवन तक सीमित रही संताली भाषा ने अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है। इसका ताजा उदाहरण संसद तक इसकी पहुंच है। वर्ष 2025 से लोकसभा की कार्यवाही का अनुवाद संताली भाषा में शुरू किया गया है, जिससे संताली भाषी लोगों को संसद की गतिविधियों को अपनी मातृभाषा में समझने का अवसर मिल रहा है।
भाषाविदों के अनुसार संताली भाषा ऑस्ट्रोएशियाटिक भाषा परिवार की मुंडा शाखा से संबंधित है और इसकी निकटता हो और मुंडारी भाषाओं से है। संताली भाषा की सबसे बड़ी पहचान इसकी स्वदेशी ‘ओल चिकी’ लिपि है, जिसे वर्ष 1925 में महान भाषा विद्वान पंडित रघुनाथ मुर्मू ने विकसित किया था। वर्तमान में संताली भाषा को झारखंड और पश्चिम बंगाल में दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है।
संताल समुदाय स्वयं को ‘होर’ या ‘होर होपोन’ अर्थात मानव जाति का पुत्र कहता है और अपनी भाषा को ‘होर रोर’ के नाम से जानता है। हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर संताली के कई अन्य नाम भी प्रचलित हैं। कहीं इसे जांगली या पहाड़िया कहा जाता है, तो कहीं ठर या पारसी नाम से जाना जाता है।
हाल के वर्षों में संताली भाषा और लिपि के संरक्षण तथा प्रचार-प्रसार के लिए सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर प्रयास तेज हुए हैं। आदिवासी सोशियो-एजुकेशनल एंड कल्चरल एसोसिएशन (आसेका) द्वारा झारखंड के करीब 100 गांवों में ‘ओल इतुन आसड़ा’ नामक विद्यालय संचालित किए जा रहे हैं, जहां बच्चों को निःशुल्क शिक्षा दी जा रही है। आसेका के सचिव शंकर सोरेन का कहना है कि भाषा का संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
संताली अनुवादक मंगल माझी के अनुसार अब संताली भाषा में केजी से लेकर पीजी तक की पुस्तकें तैयार की जा रही हैं। यहां तक कि तकनीकी और व्यावसायिक विषयों की किताबें भी संताली में उपलब्ध कराई जा रही हैं। झारखंड सरकार ने भी राज्य के 1080 सरकारी स्कूलों में संताली सहित पांच जनजातीय भाषाओं में पढ़ाई की व्यवस्था की है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने इन भाषाओं के लिए नियमित शिक्षकों की नियुक्ति की घोषणा कर आदिवासी भाषाओं को मजबूती देने का संकेत दिया है। संताली विजय दिवस केवल एक भाषा की जीत नहीं, बल्कि आदिवासी अस्मिता, संस्कृति और अधिकारों की पहचान का प्रतीक बन चुका है।

