इकोनॉमिक सर्वे: वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत, विकास दर 7% के करीब

Ravikant Upadhyay

नई दिल्ली।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संसद में आर्थिक सर्वेक्षण (इकोनॉमिक सर्वे) पेश किया। सर्वे के मुताबिक, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक तनावों के बावजूद भारत की घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत बनी हुई है। रिपोर्ट में अनुमान जताया गया है कि वित्त वर्ष 2026-27 में देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रह सकती है। सरकार का मानना है कि हाल के वर्षों में किए गए संरचनात्मक सुधारों के चलते भारत की मध्यम अवधि की विकास क्षमता लगभग 7 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है।

आर्थिक सर्वेक्षण 2026 में कहा गया है कि मौजूदा वैश्विक हालात भारत के लिए किसी तात्कालिक बड़े आर्थिक संकट का संकेत नहीं देते, बल्कि ये बाहरी अनिश्चितताओं की ओर इशारा करते हैं। इसके बावजूद देश की आंतरिक आर्थिक स्थिति संतुलित और स्थिर बनी हुई है। रिपोर्ट के अनुसार महंगाई दर ऐतिहासिक रूप से निचले स्तरों के करीब रही है, हालांकि आने वाले समय में कीमतों में हल्की बढ़ोतरी देखी जा सकती है।

सर्वे में बताया गया है कि घरेलू स्तर पर परिवारों, कंपनियों और बैंकों की वित्तीय स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है। बैंकों के बैलेंस शीट मजबूत हुए हैं और गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) में कमी आई है। सरकारी पूंजीगत निवेश लगातार आर्थिक गतिविधियों को गति दे रहा है, जिससे बुनियादी ढांचे और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिल रहा है। इसके साथ ही उपभोग की मांग मजबूत बनी हुई है और निजी निवेश के संकेत भी धीरे-धीरे सकारात्मक हो रहे हैं। ये सभी कारक मिलकर भारत को बाहरी झटकों से निपटने में सक्षम बनाते हैं।

आर्थिक सर्वे में यह भी कहा गया है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आधार वर्ष में संभावित बदलाव (रीबेसिंग) से महंगाई के आकलन में अंतर आ सकता है। इसलिए आने वाले समय में कीमतों के रुझान को समझते समय विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होगी।

वैश्विक मोर्चे पर चुनौतियों का उल्लेख करते हुए सर्वे में कहा गया है कि भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों में धीमी आर्थिक वृद्धि, टैरिफ और व्यापार प्रतिबंधों के कारण निर्यात और पूंजी प्रवाह पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में उतार-चढ़ाव से निवेशकों की धारणा भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि, अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं के इस वर्ष पूरा होने की संभावना जताई गई है, जिससे बाहरी अनिश्चितताओं में कुछ कमी आने की उम्मीद है।

रिपोर्ट के अनुसार, मध्यम अवधि में वैश्विक अर्थव्यवस्था का आउटलुक कमजोर बना हुआ है और जोखिम नीचे की ओर झुके हुए हैं। दुनिया के कई हिस्सों में आर्थिक वृद्धि सीमित रहने की संभावना है, जिससे कच्चे माल और कमोडिटी की कीमतें भी अपेक्षाकृत स्थिर रह सकती हैं। वहीं, वैश्विक स्तर पर महंगाई में आई कमी के चलते मौद्रिक नीतियां आगे चलकर विकास को समर्थन देने वाली हो सकती हैं।

सर्वे ने यह भी आगाह किया है कि कुछ बड़े जोखिम अभी भी बने हुए हैं। यदि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से अपेक्षित उत्पादकता लाभ हासिल नहीं हो पाता, तो शेयर बाजार और अन्य परिसंपत्तियों की कीमतों में गिरावट आ सकती है, जिससे वैश्विक वित्तीय स्थिरता पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा, यदि देशों के बीच व्यापार विवाद लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो निवेश और वैश्विक विकास दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

कुल मिलाकर, आर्थिक सर्वेक्षण का निष्कर्ष है कि भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल संतुलित स्थिति में है। घरेलू मांग, निवेश और नीतिगत सुधारों के दम पर विकास की संभावनाएं मजबूत बनी हुई हैं, हालांकि वैश्विक जोखिमों पर सतत निगरानी जरूरी होगी।

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