5 साल से ठप झारखंड सूचना आयोग पर हाईकोर्ट सख्त, 4 हफ्ते में चालू करने का भरोसा

Ravikant Upadhyay

रांची। झारखंड राज्य सूचना आयोग पिछले लगभग पाँच वर्षों से निष्क्रिय पड़े होने को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस मामले में राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वस्त किया है कि आगामी चार सप्ताह के भीतर सूचना आयोग को पूरी तरह कार्यशील कर दिया जाएगा। गुरुवार को इस संबंध में सुनवाई करते हुए सरकार ने कहा कि आयोग को सक्रिय करने की दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

यह मामला बीरेंद्र सिंह द्वारा दायर अपील याचिका से जुड़ा है, जिस पर न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ में सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन ने अदालत को बताया कि सूचना आयोग को पुनः सक्रिय करने के लिए नियुक्ति प्रक्रिया सहित अन्य औपचारिकताएं तेजी से पूरी की जा रही हैं और चार सप्ताह के भीतर आयोग अपना कार्य प्रारंभ कर देगा।

सुनवाई के दौरान राज्य के मुख्य सचिव अविनाश कुमार तथा कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग के सचिव भी व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित हुए। गौरतलब है कि पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने आयोग के लंबे समय से निष्क्रिय रहने पर गहरी नाराजगी जताई थी और चेतावनी दी थी कि यदि शीघ्र कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई की जा सकती है। इसी के तहत मुख्य सचिव और कार्मिक सचिव को अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया गया था।

अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि इससे पूर्व 12 दिसंबर 2025 को राज्य सरकार को सूचना आयोग को सक्रिय करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई ठोस प्रगति नजर नहीं आई। गुरुवार की सुनवाई में सरकार का पक्ष सुनने के बाद कोर्ट ने अंतिम रूप से चार सप्ताह का समय दिया है, साथ ही यह स्पष्ट संकेत भी दिया है कि तय समयसीमा के भीतर आयोग को कार्यशील किया जाना चाहिए।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से यह बताया गया कि झारखंड राज्य सूचना आयोग लगभग पाँच वर्षों से निष्क्रिय है, क्योंकि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों के सभी पद लंबे समय से रिक्त हैं। इसके कारण सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत द्वितीय अपील की व्यवस्था पूरी तरह ठप हो गई है। आम नागरिकों को सूचना न मिलने पर आयोग के बजाय हाईकोर्ट का सहारा लेना पड़ रहा है, जिससे न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ भी बढ़ रहा है।

याचिकाकर्ता बीरेंद्र सिंह ने आरटीआई अधिनियम के तहत कुछ सूचनाएं मांगी थीं। निर्धारित 30 दिनों की अवधि में सूचना नहीं मिलने पर उन्होंने प्रथम अपील दायर की, लेकिन उसके बावजूद भी संबंधित विभाग द्वारा जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। सामान्यतः ऐसी स्थिति में द्वितीय अपील राज्य सूचना आयोग में की जाती है, लेकिन आयोग के निष्क्रिय होने के कारण यह संभव नहीं हो सका। मजबूरन उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विकास कुमार ने पक्ष रखा।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम लोकतंत्र का महत्वपूर्ण स्तंभ है और आयोग का लंबे समय तक निष्क्रिय रहना नागरिकों के अधिकारों का हनन है। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार अपने वादे पर कितना अमल कर पाती है और क्या निर्धारित समय सीमा में झारखंड सूचना आयोग वास्तव में फिर से कार्यशील हो पाता है या नहीं।

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