नई दिल्ली, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रस्तावित एक फिल्म के शीर्षक को लेकर उठा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। शीर्षक में प्रयुक्त शब्दों पर आपत्ति जताते हुए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि उसके नाम पर किसी समुदाय या वर्ग विशेष को अपमानित किया जाए।
मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और फिल्म के निर्माता-निर्देशक से जवाब मांगा है। कोर्ट ने कहा कि यह केवल एक फिल्म के नाम का सवाल नहीं, बल्कि उससे समाज पर पड़ने वाले व्यापक प्रभावों का विषय है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने टिप्पणी की कि अभिव्यक्ति की आजादी संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, लेकिन यह किसी भी वर्ग को नीचा दिखाने का लाइसेंस नहीं बन सकता। अदालत ने यह भी कहा कि देश की सामाजिक संरचना विविधताओं से भरी है और ऐसे में रचनात्मक अभिव्यक्तियों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने मामले को सामाजिक सौहार्द से जुड़ा बताते हुए अगली सुनवाई की तारीख 19 फरवरी तय की है। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दों पर संतुलन बनाए रखना आवश्यक है, विशेषकर तब जब समाज पहले से विभिन्न प्रकार के तनावों का सामना कर रहा हो।
फिल्म निर्माता की ओर से अदालत को बताया गया कि विवाद के बाद ट्रेलर को सोशल मीडिया से हटा लिया गया है और शीर्षक में बदलाव की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इस पर अदालत ने निर्देश दिया कि निर्माता लिखित हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करें कि नया शीर्षक क्या होगा और सामग्री में किसी समुदाय के प्रति आपत्तिजनक तत्व नहीं होंगे।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि फिल्म का मूल शीर्षक एक विशेष समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकता है और उसे नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करता है। याचिकाकर्ताओं ने फिल्म की रिलीज और ऑनलाइन प्रसारण पर रोक लगाने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रचनात्मक स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक जिम्मेदारियों का पालन भी उतना ही आवश्यक है।

