झारखंड को मच्छर-मुक्त और सेप्टिक टैंक-मुक्त शहर के लिए, रमेश चंद डागा ने सीएम को भेजा प्रस्ताव

Shashi Bhushan Kumar

झारखंड के शहरों को जलभराव, बदबूदार नालों और मच्छरों की समस्या से राहत दिलाने के लिए एक नया स्वदेशी मॉडल का श्रीरामकृष्ण आश्रम ट्रस्ट के ट्रस्टी ब्रह्माकुमार रमेश चंद डागा ने मुख्यमंत्री, नगर विकास विभाग और रांची के मेयर को ‘रेडीमेड पाइप ड्रेनेज मॉडल’ का प्रस्ताव सौंपा है।

प्रस्ताव के अनुसार, इस तकनीक के जरिए महज 8 घंटे में 1 किलोमीटर ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया जा सकता है, जबकि पारंपरिक तरीके से यह काम महीनों में पूरा होता है।

इस मॉडल में ईंट-सीमेंट के पारंपरिक नालों की जगह ‘स्टेप-डाउन’ तकनीक से बने रेडीमेड कंक्रीट पाइप का इस्तेमाल किया जाएगा। 200 मिमी से 2000 मिमी व्यास वाले ये पाइप जमीन के नीचे बिछाए जाएंगे। हर 25 से 50 फुट पर एक विशेष ‘पिट’ बनाया जाएगा, जो कचरे और मिट्टी को छानकर पानी के प्रवाह को बनाए रखेगा।

इस तकनीक के कई फायदे बताए गए हैं। बंद पाइप प्रणाली होने से मच्छरों का प्रजनन लगभग खत्म हो जाएगा और बीमारियों में कमी आएगी। खुले नालों के खत्म होने से सड़कों की चौड़ाई 3 से 4 फीट तक बढ़ सकती है। साथ ही, इस मॉडल से निर्माण लागत में लगभग 40 प्रतिशत तक बचत होने का दावा किया गया है।

इसके अलावा, शोधन के बाद निकलने वाले पानी का उपयोग मछली पालन और खेती की सिंचाई में किया जा सकेगा, जिससे नगर निकायों को अतिरिक्त राजस्व प्राप्त होगा।

ट्रस्ट ने सरकार से रांची के किसी एक वार्ड में पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की मांग की है। प्रस्ताव में यह बताया गया है कि यदि यह मॉडल सफल होता है, तो झारखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन सकता है जहां सेप्टिक टैंक की अनिवार्यता समाप्त हो जाएगी और शहर पूरी तरह स्वच्छ बनेंगे।

ब्रह्माकुमार रमेश चंद डागा का कहना है, “मैंने पिछले 25 वर्षों में इस तकनीक को विकसित किया है। मेरा उद्देश्य केवल नाली बनाना नहीं, बल्कि झारखंड को एक आधुनिक और स्वास्थ्यवर्धक व्यवस्था देना है।”

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शशी भूषण कुमार | पत्रकार (Journalist)- शशी भूषण कुमार 12+ वर्षों के अनुभव वाले पत्रकार हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया में कार्य करते हुए वर्तमान में Live 7 TV.com में सीनियर प्रोड्यूसर के रूप में संपादकीय नेतृत्व और न्यूज़ प्लानिंग की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। वे पिछले तीन वर्षों से झारखंड स्टेट ओपन यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता विभाग के गेस्ट फैकल्टी भी हैं। ग्रामीण पत्रकारिता पर शोध कार्य से जुड़े रहते हुए वे जमीनी और आदिवासी क्षेत्रों की आवाज़ को मुख्यधारा तक पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
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