नई दिल्ली। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के खिलाफ मूल प्रस्ताव लाने की पहल कर राजनीतिक हलचल बढ़ा दी है। इस कदम के समर्थन में उन्होंने वर्ष 1978 की संसदीय कार्रवाई का हवाला दिया है।
दुबे ने दिसंबर 1978 की उस घटना का जिक्र किया, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की लोकसभा सदस्यता एक प्रस्ताव के आधार पर समाप्त की गई थी और उन्हें जेल भी भेजा गया था। उनका कहना है कि संसदीय परंपरा में ऐसे कदम पहले भी उठाए जा चुके हैं।
संसदीय प्रक्रिया में ‘मूल प्रस्ताव’ एक स्वतंत्र प्रस्ताव होता है, जिसे सदन के समक्ष किसी निर्णय या मत व्यक्त करने के लिए रखा जाता है। प्रस्ताव स्वीकार होने के बाद उस पर चर्चा होती है और अंततः मतदान कराया जाता है।
निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी पर विशेषाधिकार हनन का आरोप लगाते हुए उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त करने और भविष्य में चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग की है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर 1978 की कार्यवाही से जुड़े दस्तावेजों का उल्लेख करते हुए अपने तर्क प्रस्तुत किए।
1978 का मामला 22 नवंबर को लोकसभा में लाए गए एक प्रस्ताव से संबंधित था, जो विशेषाधिकार समिति की रिपोर्ट पर आधारित था। रिपोर्ट में इंदिरा गांधी को सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन का दोषी माना गया था। आरोप आपातकाल के दौरान की गई कुछ प्रशासनिक कार्रवाइयों से जुड़े थे। लंबी बहस के बाद 19 दिसंबर 1978 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा लाया गया प्रस्ताव पारित हुआ, जिसके परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी की सदस्यता समाप्त कर दी गई। हालांकि बाद में 1981 में यह निर्णय वापस ले लिया गया।
हाल ही में लोकसभा में हुई तीखी बहस के बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर केंद्र सरकार की आलोचना की थी। उनके बयान पर सत्तापक्ष के सांसदों ने आपत्ति जताई और इसे असंसदीय करार देते हुए रिकॉर्ड से हटाने की मांग की।
इसके बाद भाजपा सांसदों ने विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की बात कही। वहीं कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का संवैधानिक अधिकार है।
इस बीच केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने स्पष्ट किया कि सरकार ने फिलहाल अपना प्रस्ताव स्थगित रखा है, क्योंकि निजी सदस्य के रूप में निशिकांत दुबे का प्रस्ताव पहले ही प्रस्तुत किया जा चुका है। इस घटनाक्रम से संसद और सियासत में बहस का दौर तेज हो गया है।

