RANCHI
रांची सिविल कोर्ट ने एक बहुचर्चित नक्सल मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। अपर न्यायायुक्त शैलेंद्र कुमार की अदालत ने यह फैसला पर्याप्त और ठोस साक्ष्य प्रस्तुत न किए जाने के आधार पर सुनाया।
यह मामला बुंडू थाना कांड संख्या 18/2009 से संबंधित है, जिसमें दोनों आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता, आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट और यूएपीए जैसी गंभीर धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में असफल रहा।
अभियोजन के अनुसार, 5 फरवरी 2009 की रात पुलिस को सूचना मिली थी कि बुंडू थाना क्षेत्र में नक्सली हथियारों के साथ सक्रिय हैं। इसके बाद पुलिस द्वारा सर्च ऑपरेशन चलाने और कथित मुठभेड़ की बात कही गई थी, जिसमें हथियार बरामद होने का दावा किया गया। हालांकि, दोनों आरोपी वर्ष 2017 से न्यायिक हिरासत में थे।
सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष केवल एक गवाह प्रस्तुत कर सका, जो तत्कालीन बुंडू थाना प्रभारी थे और वही मामले के सूचक भी थे। अदालत ने यह माना कि इतने गंभीर मामले में न तो किसी स्वतंत्र गवाह को प्रस्तुत किया गया और न ही अन्य पुलिसकर्मियों की गवाही कराई गई। लंबे समय तक समन और वारंट जारी होने के बावजूद गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित नहीं हो सकी।
अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों की पहचान और गिरफ्तारी की प्रक्रिया संदेह के घेरे में है। सूचक गवाह ने जिरह के दौरान स्वीकार किया कि उन्होंने आरोपियों को घटनास्थल पर नहीं देखा था और न ही गिरफ्तारी की कार्रवाई में शामिल थे। दोनों आरोपियों को उन्होंने पहली बार अदालत में ही देखा।
पुलिस द्वारा मुठभेड़ के दौरान भारी गोलीबारी का दावा किया गया था, लेकिन जांच के दौरान घटनास्थल से कोई भी खोखा बरामद नहीं हुआ। साथ ही कथित रूप से जब्त हथियारों और कारतूसों को न तो मौके पर विधिवत सील किया गया और न ही अदालत में सुसंगत ढंग से प्रस्तुत किया जा सका। घटनास्थल से खून या खून लगी मिट्टी की कोई बरामदगी भी रिकॉर्ड में नहीं पाई गई।
इन सभी तथ्यों और साक्ष्यों की कमी को देखते हुए अदालत ने कुंदन पाहन उर्फ विकास जी और राम मोहन सिंह मुंडा को आईपीसी की धारा 147, 148, 353/149, 307/149 सहित आर्म्स एक्ट, सीएलए एक्ट और यूएपीए की धारा 13 के तहत लगाए गए सभी आरोपों से बरी कर दिया। बचाव पक्ष की ओर से अधिवक्ता ईश्वर दयाल किशोर ने प्रभावी पैरवी की।

