PESA Act की आड़ में आदिवासी पहचान कमजोर करने की साजिश: बाबूलाल मरांडी

Ravikant Upadhyay

झारखंड विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार और कुछ राजनीतिक दलों पर पेसा कानून की आड़ में आदिवासी पहचान, आस्था और परंपराओं को कमजोर करने की साजिश रचने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना, स्वशासन व्यवस्था और जीवन पद्धति प्राचीन सनातन मूल्यों और परंपराओं से गहराई से जुड़ी हुई है, जिन्हें जानबूझकर कमजोर करने का प्रयास किया जा रहा है।

बाबूलाल मरांडी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर जारी बयान में कहा कि आदिवासी समाज की पहचान उसकी परंपराओं, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों से बनी है। यही परंपराएं सदियों से आदिवासी समाज को संगठित रखने के साथ-साथ उनके स्वशासन की मजबूत नींव रही हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि झारखंड सरकार और कुछ राजनीतिक दल वोटबैंक की राजनीति तथा विदेशी धर्मों के प्रभाव में आकर आदिवासी समाज की जड़ों पर प्रहार कर रहे हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने दावा किया कि राज्य में धर्मांतरण, घुसपैठ और लालच जैसे हथकंडों के माध्यम से आदिवासी समाज को खंडित करने की सुनियोजित साजिश रची जा रही है। उन्होंने कहा कि यह केवल सामाजिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राजनीतिक स्तर पर भी आदिवासी समाज को कमजोर करने का प्रयास है। मरांडी के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकार की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, क्योंकि सरकारी मशीनरी आदिवासी समाज को उसकी पारंपरिक पहचान और मूल से दूर करने में अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग करती दिखाई दे रही है।

पेसा कानून को लेकर राज्य सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए बाबूलाल मरांडी ने कहा कि भले ही अदालत के दबाव में सरकार को पेसा कानून लागू करना पड़ा हो, लेकिन आज भी इसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि पेसा की मूल भावना, यानी आदिवासी स्वशासन और ग्रामसभा की सर्वोच्चता को लेकर सरकार की ओर से कोई स्पष्ट नीति या दिशा सामने नहीं आई है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सदियों पुरानी है, जिसमें मांझी-परगना, मुंडा-मानकी-दिउरी, ढोकलो-सोहोर, हातु मुंडा, पड़हा राजा, पाहन, सरदार, नापा और डाकुआ जैसे पदों को सामाजिक मान्यता प्राप्त रही है। मरांडी ने जोर देकर कहा कि पेसा कानून तभी सार्थक होगा, जब इन पारंपरिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को विधिवत कानूनी मान्यता दी जाएगी।

अंत में बाबूलाल मरांडी ने स्पष्ट कहा कि जब तक पेसा कानून के वास्तविक अधिकार मूल आदिवासियों और उनकी पारंपरिक ग्रामसभाओं को नहीं सौंपे जाते, तब तक इस कानून का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा। उन्होंने राज्य सरकार से मांग की कि पेसा नियमावली को सार्वजनिक किया जाए और ग्रामसभा के अधिकारों तथा पारंपरिक स्वशासन पद्धति को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट की जाए, ताकि आदिवासी समाज में व्याप्त भ्रम और असमंजस को दूर किया जा सके।

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