RANCHI
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य में डीजीपी नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए डीजीपी नियुक्ति नियमावली में संशोधन किया और यह तर्क दिया कि अनुभवी पुलिस प्रमुख की नियुक्ति आवश्यक है, लेकिन कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर होने के कारण उपलब्ध नहीं हैं।
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि गृह विभाग द्वारा अधिकारियों की अनुपलब्धता को लेकर दिया गया तर्क भ्रामक है। उन्होंने दावा किया कि झारखंड कैडर के डीजी रैंक के तीन वरिष्ठ अधिकारी—अनिल पालटा, प्रशांत सिंह और एम.एस. भाटिया—किसी भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं हैं। साथ ही, इन अधिकारियों की सेवा अवधि भी क्रमशः एक, दो और तीन वर्ष शेष है। इसके बावजूद, वरीयता क्रम में उनसे कनिष्ठ अधिकारी को सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले डीजीपी नियुक्त कर दिया गया।
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि यह नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ मामले में दिए गए फैसले का उल्लंघन है, क्योंकि यूपीएससी द्वारा तैयार पैनल से चयन नहीं किया गया। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार द्वारा स्वयं निर्धारित डीजीपी नियुक्ति नियमावली के वरीयता क्रम का पालन नहीं किया गया।
उन्होंने कहा कि डीजीपी पूरे राज्य की पुलिस व्यवस्था का प्रमुख होता है और इस पद पर नियुक्ति में नियमों की अनदेखी और पक्षपात से प्रशासनिक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है। इससे ट्रांसफर-पोस्टिंग में अनियमितता, अवैध वसूली, रंगदारी और फर्जी मामलों जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
बाबूलाल मरांडी ने अनुराग गुप्ता का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी नियुक्ति के लिए नियमों को दरकिनार किया गया और एसीबी व सीआईडी का प्रभार सौंपकर कथित तौर पर चल रही जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया गया। हालांकि बाद में परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उन्हें पद से हटाना पड़ा।
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के दिशा-निर्देशों का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने कहा कि डीजीपी नियुक्ति में किए गए कथित पक्षपात की समीक्षा कर सरकार को अपनी गलती सुधारनी चाहिए।

