नई दिल्ली। मकर संक्रांति का पर्व देशभर में श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ इस पर्व को पुण्य और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक माना जाता है। इस अवसर पर अयोध्या, प्रयागराज, ऋषिकेश और हरिद्वार समेत कई प्रमुख धार्मिक स्थलों पर श्रद्धालुओं ने नदियों में पवित्र स्नान किया।
प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान मकर संक्रांति पर संगम तट पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिली। बुधवार तड़के सुबह से ही संगम घाटों पर हर उम्र के लोग स्नान के लिए पहुंचे और आस्था की डुबकी लगाई। घाटों पर सुरक्षा और सुविधाओं के व्यापक इंतजाम किए गए थे।
स्नान के बाद एक श्रद्धालु ने बताया कि वह अयोध्या से आए हैं और यहां की व्यवस्थाएं काफी संतोषजनक हैं। सड़क, घाट और सुरक्षा से जुड़ी व्यवस्थाएं सुचारू रूप से संचालित की जा रही हैं। वहीं एक महिला श्रद्धालु ने कहा कि वह कई वर्षों से नियमित रूप से माघ मेले में आ रही हैं और इस स्थान की आध्यात्मिक अनुभूति को शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।
अयोध्या में सरयू नदी के घाटों पर भी भोर से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। कड़ाके की ठंड के बावजूद सुबह चार बजे से स्नान का क्रम शुरू हो गया। स्नान के उपरांत श्रद्धालु हनुमानगढ़ी और श्रीराम मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचे।
पहली बार अयोध्या आए मध्य प्रदेश के एक श्रद्धालु ने कहा कि लंबे समय से यहां आने की इच्छा थी, जो इस बार पूरी हुई। वहीं मिर्जापुर से आए एक युवक ने बताया कि सरयू नदी को अत्यंत पवित्र माना जाता है और यहां स्नान कर मन को विशेष शांति मिली।
उत्तराखंड के ऋषिकेश में भी मकर संक्रांति के अवसर पर त्रिवेणी घाट पर हजारों श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया। श्रद्धालुओं ने पूजा-पाठ, दान-पुण्य और प्रार्थना कर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। राजस्थान से आए एक श्रद्धालु ने बताया कि वह कई वर्षों से इस दिन ऋषिकेश आकर गंगा स्नान करते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
इसी तरह हरिद्वार में हर की पौड़ी पर भी श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगाई। श्रद्धालुओं का कहना था कि मकर संक्रांति का स्नान वर्ष में एक बार आने वाला विशेष अवसर है, जिसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। स्नान के बाद लोगों में आत्मिक शांति और उत्साह देखने को मिला।
देशभर के तीर्थस्थलों पर उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ ने मकर संक्रांति के पर्व को आस्था और संस्कृति का जीवंत उत्सव बना दिया।

