राष्ट्रीय युवा-दिवस पर आत्ममंथन का आह्वान—क्या आज की युवा-शक्ति स्वामी विवेकानन्द की राष्ट्र-निर्माण चेतना को आगे बढ़ा पा रही है?

भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक चेतना है—एक ऐसी जीवन-दृष्टि, जिसमें क्षमा, करुणा, त्याग, तपस्या, प्रेम और पवित्रता जैसे मानवीय गुणों का उत्कर्ष हुआ है। स्वामी विवेकानन्द ने इसी चेतना को विश्व के समक्ष उद्घोषित किया था। उनका स्वदेश-मंत्र आज भी यह स्मरण कराता है कि यदि इस संसार में कोई पुण्यभूमि है, जहाँ आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि ने मनुष्य को ऊँचाई दी है, तो वह भारतवर्ष ही है। राष्ट्रीय युवा-दिवस पर यह प्रश्न अनिवार्य रूप से सामने आता है—क्या आज का भारत, विशेषतः उसकी युवा-शक्ति, इस चेतना को आगे बढ़ा पा रही है?
स्वामी विवेकानन्द केवल संन्यासी नहीं थे; वे राष्ट्र-निर्माता थे। वे एक ऐसे भारत का स्वप्न देखते थे, जो खेतों, कारखानों, झोपड़ियों, जंगलों और पर्वतों से उठकर आत्मबल के साथ खड़ा हो। उनके विचार आज भी युवाओं में आत्मविश्वास जगाने की क्षमता रखते हैं। परंतु यह भी एक कठोर सत्य है कि आज की शिक्षा-व्यवस्था, दिशा और उद्देश्य दोनों के स्तर पर, युवाओं को उनकी जड़ों से काटती जा रही है। माता-पिता, परिवार, समाज और अपनी गौरवशाली संस्कृति से दूरी को आधुनिकता का नाम दिया जा रहा है।
वेद, उपनिषद, रामचरितमानस और मोक्षविद्यादायिनी भगवद्गीता—जिनमें जीवन-निर्माण का समग्र मार्गदर्शन उपलब्ध है—उन्हें बिना पढ़े, बिना समझे, अप्रासंगिक घोषित कर दिया जाता है। जो समाज अपनी संस्कृति-आधारित शिक्षा-व्यवस्था विकसित नहीं करता, उसकी नई पीढ़ी अपनी परंपरा पर गर्व करने के बजाय उससे घृणा करने लगती है। आज यह प्रवृत्ति केवल बौद्धिक नहीं, सामाजिक व्यवहार में भी स्पष्ट दिखाई देती है। परिणामस्वरूप, भारत के इतिहास, धर्म और आध्यात्मिक विरासत के प्रति आत्मसम्मान और आत्मविश्वास का तीव्र क्षरण हो रहा है।
दुर्भाग्यवश, इसी पृष्ठभूमि में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को एक विकृत रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। पढ़ा-लिखा युवा वर्ग बड़ी संख्या में राष्ट्र-विरोधी नारों के साथ खड़ा दिखाई देता है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। प्रश्न यह नहीं कि अभिव्यक्ति का अधिकार हो या न हो—प्रश्न यह है कि अभिव्यक्ति का उद्देश्य क्या है? क्या राष्ट्र-निर्माण से जुड़े वास्तविक मुद्दे आज युवाओं की दृष्टि से ओझल हो गए हैं?
गरीबी, बेरोजगारी, जाति-धर्म के नाम पर तुष्टिकरण, वंशवादी राजनीति, भ्रष्टाचार, कुशासन और सामाजिक कुरीतियाँ—ये वे ज्वलंत प्रश्न हैं, जिन पर युवा-ऊर्जा केंद्रित होती तो भारत को सशक्त और समृद्ध बनने से कोई नहीं रोक सकता था। किंतु आज ऊर्जा का बड़ा भाग आभासी संसार, गैजेट्स और तात्कालिक सुखों में खप रहा है। आँकड़े बताते हैं कि भारत के लगभग 75 प्रतिशत युवा डिजिटल दुनिया में अत्यधिक समय व्यतीत कर रहे हैं। इससे न केवल उनकी एकाग्रता, बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता भी क्षीण हो रही है।
आज की युवा पीढ़ी में शारीरिक प्रदर्शन को पुरुषार्थ मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जबकि चरित्र, साहस और सामाजिक उत्तरदायित्व पीछे छूटते जा रहे हैं। देश की किसी बहन-बेटी के साथ अन्याय होता है, तो तमाशबीन बनने की मानसिकता सामने आती है। नैतिकता, सामाजिक सुधार और राष्ट्रहित की बात आते ही “हमें क्या लेना-देना” का भाव हावी हो जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ स्वामी विवेकानन्द की चेतावनी प्रासंगिक हो जाती है—बिना चरित्र के शक्ति विनाशकारी बन जाती है।
यह मान लेना कि भारत अब सुरक्षित है, एक भ्रम है। आज भी देश का बड़ा हिस्सा दरिद्रता, बेरोजगारी, हिंसा, अन्याय, भय और भूख से जूझ रहा है। लगभग 20 करोड़ लोग आज भी भूखे पेट सोने को विवश हैं। यह समय उदासीन रहने का नहीं, बल्कि निर्णायक परिवर्तन का है। व्यक्तिगत स्वार्थ, निष्क्रियता और नकारात्मकता को राष्ट्रीय चेतना और सकारात्मक कर्म में बदलना होगा।
स्वामी विवेकानन्द व्यक्तित्व-क्रांति चाहते थे। वे ऐसा भारत चाहते थे, जहाँ युवा अपने भीतर शक्ति को पहचानें और उसे समाज के उत्थान में लगाएँ। यह क्रांति न नारों से आएगी, न आयोजन से—यह जीवन-आचरण से आएगी। जब युवा अपने जीवन में अनुशासन, अध्ययन, सेवा और राष्ट्र-भाव को स्थान देंगे, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।
राष्ट्रीय युवा-दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षण का अवसर है। यह दिन पूछता है—क्या हम केवल स्मरण कर रहे हैं, या वास्तव में स्वामी विवेकानन्द के स्वप्नों को जीने का साहस रखते हैं? जिस दिन भारत की युवा-शक्ति इस प्रश्न का उत्तर कर्म से देगी, उस दिन दरिद्रता, अशिक्षा, अंधविश्वास और देशद्रोह की धुंध स्वतः छँट जाएगी। तब केवल प्रकाश बचेगा—और वही स्वामी विवेकानन्द के स्वप्नों का भारत होगा।

