झारखंड आंदोलन की बौद्धिक शक्ति थे जस्टिस एलपीएन शाहदेव, जिनके संघर्ष ने अलग राज्य का सपना किया साकार

Ravikant Upadhyay

झारखंड अलग राज्य के निर्माण की कहानी केवल कुछ पन्नों में नहीं समाई जा सकती। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हुए इस ऐतिहासिक आंदोलन में अनगिनत लोगों ने त्याग, संघर्ष और बलिदान दिया। इन्हीं महान व्यक्तित्वों में एक नाम था—जस्टिस एलपीएन शाहदेव, जिन्हें झारखंड आंदोलन की बौद्धिक ऊर्जा कहा जाता है। उनकी पुण्यतिथि पर पूरा झारखंड उस न्यायाधीश को याद कर रहा है, जिसने न्यायालय से लेकर सड़कों तक संघर्ष का रास्ता चुना।

जस्टिस एलपीएन शाहदेव आदिवासी-मूलवासी समाज से आने वाले झारखंड क्षेत्र के पहले व्यक्ति थे, जिन्हें उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने का गौरव प्राप्त हुआ। आम जनता के बीच वे “जज साहेब” के नाम से प्रसिद्ध थे। न्यायिक सेवा के दौरान उन्होंने ईमानदारी, शालीनता और निर्भीकता के साथ अपने दायित्व निभाए। सेवानिवृत्ति के बाद भी उन्होंने आरामदायक जीवन नहीं चुना, बल्कि झारखंड आंदोलन में पूरी शक्ति के साथ कूद पड़े।

1998 का दौर झारखंड आंदोलन के लिए निर्णायक था। उस समय बिहार से अलग राज्य बनाने की मांग अपने चरम पर थी। बिहार सरकार की ओर से कड़े विरोध और दमन के बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा समेत 16 राजनीतिक दलों ने सर्वदलीय अलग राज्य निर्माण समिति का गठन किया। सर्वसम्मति से इस समिति की कमान जस्टिस एलपीएन शाहदेव को सौंपी गई। उनके नेतृत्व ने आंदोलन में नई जान फूंक दी। युवाओं में जबरदस्त उत्साह पैदा हुआ और आंदोलन व्यापक जनआंदोलन में तब्दील हो गया।

21 सितंबर 1998 को आहूत ऐतिहासिक बंद ने सरकारों को हिला कर रख दिया। इसी दौरान जुलूस का नेतृत्व करते हुए जस्टिस शाहदेव को घंटों हिरासत में लिया गया। यह देश का पहला मामला था, जब किसी उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश को जनआंदोलन के दौरान गिरफ्तार किया गया। उनकी गिरफ्तारी ने पूरे देश का ध्यान झारखंड आंदोलन की ओर खींचा और सरकार को यह अहसास करा दिया कि इस मांग को अब और अनदेखा नहीं किया जा सकता।

अलग राज्य बनने के बाद भी जस्टिस शाहदेव का संघर्ष थमा नहीं। वे लगातार आदिवासी-मूलवासी और भूमि पुत्रों के अधिकारों की आवाज उठाते रहे। उनका मानना था कि झारखंड का वास्तविक विकास तभी संभव है, जब सत्ता और संसाधनों पर यहां के मूल निवासियों का अधिकार होगा। वे अक्सर कहते थे कि झारखंड सिर्फ विकास की नहीं, बल्कि सत्ता की भी लड़ाई है।

लातेहार जिले के चंदवा प्रखंड के रोल गांव में जन्मे जस्टिस शाहदेव ने गांव के स्कूल से लेकर उच्च न्यायालय तक का सफर तय किया। राजपरिवार से संबंध होने के बावजूद उनका जीवन बेहद सादा रहा। हरमू स्थित उनका आवास आंदोलनकारियों का केंद्र बना रहता था, जहां आंदोलन की रणनीति और कानूनी पहलुओं पर गहन चर्चा होती थी।

आज भले ही जस्टिस एलपीएन शाहदेव हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन झारखंड आंदोलन में उनका योगदान, उनका विचार और उनका संघर्ष हमेशा प्रेरणा देता रहेगा। उन्होंने सिखाया कि लोकतांत्रिक और अहिंसक आंदोलन तभी सफल होते हैं, जब वे अनुशासन और जनचेतना के साथ आगे बढ़ें। झारखंड की पहचान में जस्टिस एलपीएन शाहदेव का नाम सदैव स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।

Share This Article
Leave a Comment