बुला चौधरी: ‘भारतीय जलपरी’, समुद्री जल से एलर्जी के बावजूद इंग्लिश चैनल पार कर रचा इतिहास

Shashi Bhushan Kumar

नई दिल्ली, LIVE 7 TV। भारत में तैराकी एक पारंपरिक कला के रूप में प्रतिष्ठित है। इसका वर्णन हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी मिलता है। आधुनिक समय में तैराकी एक खेल के रूप में प्रतिष्ठित है। एक ऐसा खेल जो स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सबसे बेहतर माना जाता है। तैराकी में भारत की मौजूदा स्थिति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकासशील अवस्था में है। भारतीय महिलाएं भी तेजी से इस विधा में आगे आ रही हैं।

भारतीय लड़कियों को तैराकी में आने का साहस जिन महिला तैराकों से मिला है, उनमें बुला चौधुरी का नाम प्रमुख है।

बुला चौधरी का जन्म 2 जनवरी, 1970 को हुगली, पश्चिम बंगाल में हुआ था। महज दो साल की उम्र से ही एक तैराक के रूप में उनकी यात्रा शुरू हो गई थी, तब उनके पिता पहली बार उन्हें हुगली नदी के तट

पर ले गए थे। पांच साल की उम्र में, उनका एडमिशन एक स्विमिंग एकेडमी में कराया गया था। नौ साल की उम्र में वह भागीरथी नदी पार कर पहली बार चर्चा में आईं थीं। वह यह नदी पार करने वाली सबसे कम उम्र की तैराक बनी थीं। 1979 में अपनी पहली राष्ट्रीय प्रतियोगिता में उन्होंने छह स्वर्ण पदक जीते थे।

1984 में, बुला चौधरी ने 100 मीटर बटरफ्लाई इवेंट्स में राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया। 1986 में सियोल में हुए एशियन गेम्स में, बुला ने 100 मीटर और 200 मीटर बटरफ्लाई में रिकॉर्ड तोड़े। 1989 में, 19 साल की उम्र में, वह इंग्लिश चैनल (इंग्लैंड से फ्रांस) तैरने वाली पहली एशियाई महिला बनीं, उन्होंने इसे लगभग 10-11 घंटे में पूरा किया। उन्होंने 1999 में दोबारा यह उपलब्धि हासिल की। बुला ने 1991 में श्रीलंका में आयोजित दक्षिण एशियाई खेल में 50मी, 100मी फ्रीस्टाइल और 100मी, 200 मीटर बटरफ्लाई में स्वर्ण पदक जीते थे।

बुला चौधुरी ने 1996 में 81 किलोमीटर की मुर्शिदाबाद लॉन्ग डिस्टेंस स्विम जीती। उन्होंने स्ट्रेट ऑफ जिब्राल्टर (2000), टायरहेनियन सी (2001), कैटालिना चैनल (2002), टोरोनियोस गल्फ (2002), कुक स्ट्रेट (2003), पाल्क स्ट्रेट (2004, श्रीलंका से इंडिया तक लगभग 14 घंटे में), और केप टाउन के पास एक चैनल (2005) पार किया। 2005 में, वह पांच महादेश में समुद्री चैनलों को तैरकर पार करने वाली दुनिया की पहली महिला बनीं, जिससे उन्हें ‘सात समुद्र’ जीतने का नाम मिला।

बुला चौधरी को समुद्री पानी से एलर्जी थी। डॉक्टरों ने कई बार उन्हें तैराकी छोड़ने की सलाह दी, लेकिन डॉक्टरों की सलाह और बुला की शारीरिक कमजोरी उनके दृढ़ संकल्प के सामने कमजोर पड़ गई। समुद्री पानी से एलर्जी के बावजूद उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की, उसके लिए उन्हें ‘समुद्रों की रानी’ और ‘भारतीय जलपरी’ के नाम से भी पुकारा गया।

तैराकी में बुला चौधरी को उनके योगदान के लिए 1990 में अर्जुन अवॉर्ड, 2002 में तेनजिंग नोर्गे नेशनल एडवेंचर अवॉर्ड और 2009 में पद्मश्री सम्मान दिया गया। तैराकी से संन्यास के बाद उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा था। फिलहाल वह युवाओं को तैराकी की कला सिखाती हैं। बुला चौधरी की यात्रा तैराकी में करियर बनाने वाले युवाओं के लिए प्रेरणादायी है।

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Digital Head,Live-7, Committed to impactful journalism, Shashi Bhushan Kumar continues to bring meaningful narratives to the public with diligence and passion. Active Journalist since 2012.
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