नई दिल्ली: दुनिया भर में समान अवसर, सामाजिक समावेशन और न्यायपूर्ण व्यवस्था को बढ़ावा देने के उद्देश्य से हर वर्ष 20 फरवरी को ‘विश्व सामाजिक न्याय दिवस’ मनाया जाता है। यह दिवस समाज में व्याप्त गरीबी, बेरोजगारी, भेदभाव, बहिष्कार और असमानता जैसी चुनौतियों के समाधान की दिशा में सामूहिक प्रयासों पर बल देता है।
इस अंतरराष्ट्रीय दिवस की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 26 नवंबर 2007 को की गई घोषणा के बाद हुई। इसका उद्देश्य देशों के भीतर और उनके बीच शांति, सुरक्षा और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सामाजिक न्याय और समावेशी विकास को प्राथमिकता देना है। भारत में यह दिवस वर्ष 2009 से नियमित रूप से मनाया जा रहा है।
यह दिन वैश्विक स्तर पर बढ़ती आर्थिक विषमताओं, वित्तीय अस्थिरता और सामाजिक असुरक्षा के बीच न्यायपूर्ण नीतियों की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की वर्ष 2008 की घोषणा ‘निष्पक्ष वैश्वीकरण के लिए सामाजिक न्याय’ ने भी समान अवसर, श्रमिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया था।
2026 की थीम क्या है?
वर्ष 2026 में यह दिवस “सामाजिक विकास और सामाजिक न्याय के प्रति नवीकृत प्रतिबद्धता” विषय के साथ मनाया जाएगा। यह विषय दोहा में आयोजित दूसरे विश्व सामाजिक विकास शिखर सम्मेलन और दोहा राजनीतिक घोषणा के बाद सामने आया। इसमें 1995 की कोपेनहेगन घोषणा की प्रतिबद्धताओं को दोहराते हुए गरीबी उन्मूलन, उत्पादक रोजगार, सम्मानजनक कार्य और सामाजिक समावेशन को विकास के प्रमुख स्तंभ के रूप में रेखांकित किया गया है।
यह थीम इस बात पर जोर देती है कि राजनीतिक घोषणाएं केवल दस्तावेज़ों तक सीमित न रहें, बल्कि उन्हें ठोस नीतियों और परिणामों में बदला जाए। इसके तहत आर्थिक, श्रम, जलवायु, डिजिटल और औद्योगिक नीतियों में सामाजिक न्याय के आयाम को समाहित करने की आवश्यकता बताई गई है।
भारत में सामाजिक न्याय की दिशा
भारत में सामाजिक न्याय को संवैधानिक आधार प्राप्त है। मौलिक अधिकारों के अंतर्गत मानव तस्करी और जबरन श्रम पर रोक, बाल श्रम निषेध, समान आजीविका, निःशुल्क विधिक सहायता तथा अनुसूचित जाति-जनजाति और कमजोर वर्गों के हितों की रक्षा जैसे प्रावधान शामिल हैं।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय सामाजिक-आर्थिक अंतर को कम करने के लिए विधायी सुधार, सशक्तिकरण कार्यक्रम और पुनर्वास योजनाएं संचालित करता है। इसका उद्देश्य एक ऐसा समावेशी समाज बनाना है, जहां वंचित और हाशिए पर रहने वाले समुदाय सुरक्षित, सम्मानजनक और गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
वर्ष 1985-86 में केंद्र सरकार ने कल्याण मंत्रालय का पुनर्गठन कर महिला एवं बाल विकास विभाग और अलग कल्याण विभाग का गठन किया था। बाद में मई 1998 में इसका नाम बदलकर सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय कर दिया गया।
‘विश्व सामाजिक न्याय दिवस’ हमें यह याद दिलाता है कि समानता, अवसर और सम्मान केवल आदर्श नहीं, बल्कि सतत विकास और स्थायी शांति की बुनियाद हैं।

