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आखिर मध्य प्रदेश में बीजेपी की बंपर जीत के बाद भी सिंधिया समर्थक निराश क्यों ?

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न्यूज़ डेस्क

मध्यप्रदेश में बीजेपी की बंपर जीत हुई। ऐसी जीत जिसकी कल्पना बीजेपी ने भी नहीं की थी। डेढ़ सौ से ज्यादा सीटें बीजेपी के पास गई है। कांग्रेस की बुरी तरह से हार हुई है। अब बीजेपी की फिर से सरकार बनने जा रही है। कहा जा रहा है कि मध्यप्रदेश में मोदी का जादू चला है इसके साथ ही शिवराज की लाड़ली बहना ने बीजेपी को जिताने में बड़ी भूमिका निभाई है। हर महीने हजार रुपये की नकदी ने लाड़ली बहन को उत्साहित किया और वह उत्साह वोट में बदल गया।

 

एमपी में किसके सिर पर ताज रखा जाएगा यह देखने की बात है। सीएम बनने को लेकर कई लोग उतावले हैं। कई रेस में हैं तो कई पीछे से बैटिंग कर रहे हैं। लेकिन सबकुछ अँधेरे में ही है। मोदी और शाह क्या निर्णय लेंगे यह कोई नहीं जानता। कहा जा रहा है कि इस बार किसी दलित आया पिछड़े को सीएम बनाया जा सकता है। सिंधिया जी भी मौन होकर सब कुछ देख रहे हैं। उनकी भी चाहत सीएम बनने की है। लेकिन गुमान करने के लिए उनके पास कुछ बचा नहीं है।

 

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दरअसल सिंध्या समर्थकों की बड़ी हार हुई है। ग्वालियर चम्बल संभाग में सिंधिया के 13 कट्टर समर्थक मैदान में उतरे थे। तब कहा जा रहा था कि अगर ये सभी चुनाव जीत जाते हैं तो सिंधिया सीएम के उम्मीदवार हो सकते हैं। लेकिन खेल जमा नहीं। बीजेपी की तो बंपर जीत हो गई लेकिन सिंधिया के 8 समर्थक चुनाव हार गए। कहा जा रहा है कि ये हार बड़ी बेइज्जती के साथ हुई है। कांग्रेस ने ये सब हारने का काम किया है।

 

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ग्वालियर चम्बल संभाग में कुल 34 सीटें आती है। इसमें बीजेपी 18 सीटों पर जीत दर्ज की है कांग्रेस के खाते में 16 सीटें गई है। कहा जा सकता है कि ग्वालियर और चंबल के इलाके में जहाँ सिंध्या का बोलबाला था वहां कांग्रेस ने बेहतर किया है। सिंधिया ने अपने लोगों को जिताने के लिए कड़ी म्हणत भी की थी। कई सभाएं की। लगभग 50 से ज्यादा सभाएं सिंधिया ने इन इलाकों में की थी। लेकिन सब बेकार गया। उनके लोग आखिरकार हार ही गए। जिन लोगों की हार हुई है उनमे शामिल हैं रघुराज सिंह कंसाना, कमलेश जाटव, इमरती देवी, माया सिंह, सुरेश धाकड़, महेंद्र सिसोदिया, जसपाल जज्जी और हीरेंद्र सिंह बना शामिल है। वहीं जो सिंधिया समर्थक चुनाव जीते हैं, उनमें प्रद्युमन सिंह तोमर, मोहन सिंह राठौड़, महेंद्र यादव, जगन्नाथ रघुवंशी और वीरेंद्र यादव है।

ग्वालियर चंबल अंचल में जितने सिंधिया के समर्थक जीते हैं, उससे ज्यादा चुनाव हारे हैं। इसे सिंधिया की साख पर भी कई सवाल खड़े होगे। इसका कारण यह है कि जब केंद्रीय मंत्री सिंधिया साल 2018 में कांग्रेस में थे, तब ग्वालियर चंबल अंचल से कांग्रेस से 26 सीटें जीतकर आई थी और जिसका श्रेय सिंधिया को गया था। उसके बाद जब सिंधिया बीजेपी में आए और उसके बाद अपनी साख को बचाने के लिए और उनके वर्चस्व को नापने के लिए पार्टी ने इस बार के चुनाव में पूरी कमान सौंप दी थी। यही कारण है कि ग्वालियर चंबल अंचल में उन्होंने सबसे ज्यादा ताबड़तोड़ रैलियां और सभाएं की। वहीं पार्टी ने पूरी जिम्मेदारी उनपर ही सौंप दी, लेकिन इसके बावजूद सिंधिया का जादू कुछ खास असर नहीं डाल पाया।

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