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टुसु परब – अन्न (धान्य) के महत्व का जनजातीय महापरब


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    •प्रसेनजीत महतो
अगहन संक्रांति को टुसु थापना के साथ ही झारखंड के गांव घर टुसु के कर्णप्रिय लोकगितों और ढोल धमसा माँदर के सुमधुर थाप से गुंजायमान होने लगते हैं। सांस्कृतिक विविधताओं का प्रदेश झारखंड, जो प्राकृतिक परबों यथा हालपुनहा, सिझानअ, सारहुल, रोहिन, मासंत/रजअसला, चितउ, गोमहा, करम, जितिआ, जिल्हुड़, बांदना/सोहराय इत्यादि के रूप में कई आदि विशिष्ट संस्कृति को समेटे हुए है। पूर्णतया कृषि एवं प्रकृति पर ही आधारित इन्हीं परबों में से एक मुख्य परब है – ‘टुसु परब’. पूस माह में होने के कारण इसे ‘पूस परब’ एवं पुस/मकर संक्रांति तक चलने के कारण कहीं-कहीं ‘मकर परब’ भी कहते हैं। यह परब छोटानागपुर अंचल (वृहत् झारखंड क्षेत्र) के सभी देशज हड़ समुदाय के लोग धूमधाम से मनाते हैं, जिनमें कुड़मि आदिबासि (जनजाति) समुदाय मुख्य रूप से मनाते हैं। यह परब फसल (धान) कटनी के उपरांत अगहन/डिनि सांकराइत की रात को ‘टुसु थापना’ से लेकर पुस/मकर सांकराइत को ‘टुसु भासान’ तक पूरे एक माह पर्यंत मनाया जाता है, जो कुड़मालि गितों के माध्यम से जाना जा सकता है-
“टुसु रहलि ससुर घारें, बेसेइ खेतें पाथअरें।

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साजि सँपड़ि लहअसले आउलि, अगहनअ सांकराइते।।”
“अगहनअ सांकराइते टुसु, संगअति सभे हांसाउले।
पुसअ सांकराइते टुसु, संगअति सभे कांदाउले।।”
संरक्षण एवं संवर्धन की विशेष आवश्यकता
कालांतर में बाह्य धार्मिक एवं सांस्कृतिक अतिक्रमणों के फलस्वरूप एवं काल्पनिक कहानियों के दिग्भ्रम से इन परबों के मूल स्वरूप में कहीं-कहीं कुछेक परिवर्तन हुए हैं, मगर इनका असल स्वरूप अब भी बरकरार है, जिसे संरक्षण एवं संवर्धन की विशेष आवश्यकता है। अनादिकाल से चले आ रहे ‘टुसु परब’ का उचरन शिकारी युग के उपरांत कृषि युग (मुख्यतः धान की खेती) के आरंभकाल से ही हुई, जब इस क्षेत्र मेंं एनिमिस्टों (प्रकृति पूजकों) का ही आदिकाल से वसोवास था, किसी अन्य धर्म या सम्प्रदाय का प्रवेश भी नहीं हुआ था, जो स्वतः ही समयांतराल मेंं इससे जोड़े गये सभी किंवदंतियों एवं दंतकथाओं का खंडन करती है। नेगाचार के हिसाब से अगहन सांकराइत की रात खेत के सभी धान काटने से पूर्व छोड़े गये नौ-गाछि ‘धान सिंस’ को, जिसे सभी काटे गये धान को खलिहान तक लाने तक ढेलका-पाथर कांटा-झांटा से अच्छी तरह ढँककर/छिपाकर रखा गया रहता है, घर-आंगन साफ-सुथरा कर विधिनुसार फूल, चंदन, गुंड़ि (चुनि), गुड़, सिंदुर, आरुआ चावल आदि सामग्री लेकर प्रत्येक किसान उसे लाने घर से खेत जाते हैं। घर का मुख्य आदमी उस धान सिंस की विधिवत आराधना कर मिट्टी सहित उठाकर श्रद्धापूर्वक सिर पर ढोकर खलिहान में लाकर मुख्य धान-गादा के समक्ष चउकपुरा किये स्थान पर स्थापित करता है. ये धान सिंस, जिसे डिनि ठाकराइन भी कहते हैं, वास्तव में यही ‘डिनिमाञ’, ‘टुसुमाञ’ का असल प्रतीक है. प्रचलित लोकोक्ति “खेते धानि खरइए डिनि पाड़अने डिमनि, जेञ डिनि अञ टुसुमिनि” से यह सुस्पष्ट होता है. टुसु थापना के दिन घर-घर में खापरा पिठा बनाये जाने की परंपरा है एवं इस दिन के बाद से टुसु भासान तक खापरा पिठा बनाना निषेध रहता है। रात को लड़कियां टुसु-थापना या टुसु पाता अनुष्ठान करती हैं। मिट्टी के सारुआ (बर्तन) मेंं गुंड़ि व गोबर ढुला, आरुआ धान, दुब घास, फूल (बाड़ि का) रखके टुस्यमाता-डिनिमाञ को टुसुधनि/टुसुमनि कहकर आह्वान करते हैं-
“हामरा जे माञ टुसु थापिअ, अगहनअ सांकराइते गअ।
अबला बाछुरेक गबर, लगन चाउरेक गुंड़ि गअ।।
आरुआ चाउरे थापिअ टुसु, गुलाँच फुले पुजिअ गअ।
बछर बछर आइहा टुसु, एहे काँगालेक घारें गअ।।”
फिर रात भर टुसु गीतों के माध्यम से जागरन किया जाता है। इसे बंगाल डिस्ट्रिक्ट गैजेटियर, मानभूम (एच. कूपलैंड, 1910-11, पृष्ठ संख्या 95-96) में उद्धृत पंक्तियों से भी समझा जा सकता है –
पौष (दिसंबर-जनवरी) – पौष में, पूरे महीने अविवाहित लड़कियों द्वारा टुसु परब का अवलोकन किया (मनाया) जाता है। छोटी छोटी गोबर की गेंदें (गोबर ढुला) तैयार की जाती हैं और उन्हें एक मिट्टी के बर्तन (सारुआ) में संग्रहित किया जाता है, जो कि बाहर से चावल के गुँड़ि (चुनि) के घोल से रंगी होती है। कुछ भी खाने से पहले हर सुबह गेंदों पर धान छिड़का जाता है और शाम को सरसों और मूली के फूलों से धन की देवी को पूजा अर्पित की जाती है। धान्य देवी के प्रेरक में गित भी गाये जाते हैं एवं धन और अच्छा पति प्रदान करने के लिए उनका आह्वान किया जाता है। महीने के आखिरी दिन, लड़कियां स्नान करती हैं, गोबर की गेंदों पर आग लगाती हैं और सामान्य पीठा (या केक) परब में शामिल होती हैं। यह पूरे गांव द्वारा भोर सुबह में अधिमानतः किसी बड़ी नदी (या तालाब) में बहुत ही स्पष्ट रूप से स्नान करके मनाया जाता है और उनके लौटने पर एक या दो दिन पहले नए चावल के गुँड़ि और नारियल या नारियल और गुड़ के पेस्ट से भरकर तैयार किए गए पिठा (गुड़/आरसा पिठा) खाते हैं।
(झारखंड, बंगाल, ओड़िशा के तमाम गैजेटियर्स और सेन्सस रिपोर्ट्स में टुसु के संबद्ध ऐसे ही तथ्यात्मक बातों का उल्लेख किया गया है।)
डाॅ. तुषार चट्टोपाध्याय (1961 सेन्सस रिपोर्ट) के अनुसार – “‘टुसु परब मूल रूप से कृषि समाज का फसल कटाई के बाद का एक लोक परब है.”
पुस माह के पहले दिन को डिनि जिरान के रूप में मनाते हैं एवं इस दिन खलिहान में कोई काम नहीं होता है। इस दिन से एक माह पर्यंत हर शाम डिनिमाञ को धूप-धूना-दीया (साँइझ बाति) दिखाकर एवं एक फुल (बाड़ि में उपलब्धत: मूली, सरसों, लाउआ, सिम आदि या नियमतः गुलाँच फुल या साल पेड़ का बांदु फुल) चढ़ाकर आराधना किया जाता है. आठ दिन बाद-बाद हर नौेवीं रात जागरन किया जाता है। पूस महीने के अंतिम दिन मकर संक्रांति के तीन दिन पहले तक आंउड़ि, चांउड़ि व बांउड़ि मनाया जाता है. आंउड़ि व चांउड़ि, जिसे चारभिजा व चारधउआ भी कहते हैं के दिन घर-आंगन साफ-सुथरा कर जिस चावल से पीठा बनाना होता है, उसे भिंगोकर व धोकर ढेंकी से उसका गुंड़ि कूटा जाता है. इसके अगले दिन “बांउड़ि” का विशेष महत्व होता है। इस दिन दान-दक्षिणा देना निषेध रहता है। कूटे गये गुंड़ि से नाना प्रकार का पिठा बनाया जाता है, जिसमें उंधि (ढुमु) पिठा, गुड़ (आरसा) पिठा व मसला पिठा प्रमुख होता है. उंधि पिठा बनाने का रीत बांउड़ि से सिझानअ परब (माघ शुक्ल या बसंत पंचमी) तक ही हैै, इसके बाद बनाना वर्जित रहता है। इस दिन बांउड़ि बिठाने व धान-चावल का बिंटा बांधने का विशेष नेग होता है. परिवार का मुखिया सुबह नहा धोकर भीतर घर में धान या चावल की पुटली बनाकर बड़ (पुआल रस्सा) से लपेटकर डिनिमाञ एवं बुड़हा-बुड़हि (पूर्वजों) का स्मरण कर माचान ऊपर में रख देते हैं।

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बांउड़ि के अगले दिन पूस सांकराइत (मकर संक्रांति) को ‘टुसु भासान’ किया जाता है. भोर सुबह में पास के जलाशय मेंं स्नानोपरांत अघरा तापने का चलन है. इसके बाद सभी नये वस्त्र पहनकर भुतपिंढ़ा व बड़े-बुजुर्गों को जहाइर कर उनका आशीष लेते हैं एवं तिल, गुड़ पिठा व गुड़-चुड़ा का सेवन करते हैं। इस दिन मांस भात एवं मांस पिठा खाने का चलन है। भासान करने हेतु डिनि (टुसु) माञ एवं आराधना मेंं प्रयुक्त सामग्रियों को ‘चउड़ल’ रूपी पालकी में रखकर टुसु गीत –
“एक सड़पें दुइ सड़पें तिन सड़पें लक चलेइ,
हामर टुसु माझें चलेइ बिन बातासें गात डलेइ।”
इत्यादि गाते-नाचते पास के नदी, जोड़िया या बांध में ले जाकर अगले साल पुनः घर लाने की कामना करते हुए डिनि-टुसुमिनि को विदाई दिया जाता है. इस मौके पर सम्बन्धित स्थल मेंं ‘टुसु मेला’ भी लगता है।
“तिरिस दिन जे राखलँ टुसु, तिरिस टा फुल देइएँ गअ।
आरअ कि माञ राखे पारम, हेलेइक मकर बासि गअ।।”
“पानिञ हेलिस पानिञ खेलिस, पानिञ आहउ कन जे तर।
मनगुमाने भाभि देखा, ससुर घार जे पानिञ मर।।”
इस तरह खेत के पानी (ससुराल) मेंं ही हिलते डुलते खेलते बढ़ते धान्य को घर (मायके) लाने और अगले बरस फिर घर लाने की कामना करते हुए ससुराल रुपी पानी मेंं भासान कर विदाई देने का डिनि-शस्यमाता की आराधना का एकमासिआ टुसु महापर्व हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न होता है। स्थान विशेष पर नियमों मेंं कुछेक फेरबदल हो सकते हैं, मगर इस परब का मूल सार सम्पूर्ण सृष्टि का भरन पोषण करने वाले अन्नशक्ति ‘धान’ मेंं ही समाहित है और बाकि परब भी इस धान-खेती-चक्र और प्रकृति से ही संबद्घ हैं।
अगले दिन पहला माघ को ‘आखाइन जातरा’ के रूप में मनाया जाता है. साल का शुरूआत (नववर्ष) मानकर इस दिन से ही सारे शुभ कार्य शुरू किये जाते हैं। इस दिन से ही खेत में ढाइ पाक पहला हल चलाकर खेती की शुरूआत की जाती है, जिसे ‘हालपुनहा’ या ‘हारपुइनहा’ कहते हैं. कुदाली से ढाइ चट गोबर या मिट्टी काटने का भी रिवाज है। इसके लिये पहले हाल-फाल-जुआल आदि कृषि उपकरणों को धोकर भुतपिंढ़ा के समीप रखा जाता है एवं आराधना किया जाता है। हालपुनहा करने वाला सदस्य नहा-धोकर खेत में जाकर हल जोतता है। निःशब्द घर लौटने पर द्वार पर घर की महिला सदस्य द्वारा उनका चुमान किया जाता है। बैलों के सींग में तेल-सिंदुर लगाया जाता है एवं सूप में धान और दूब घास रखकर उन्हें खिलाया जाता है। हल जोतने वाले को गुड़-चुड़ा खिलाया जाता है। इस दिन आखाइन दाग देने एवं मछली भात खाने का भी रिवाज है।
शोध के अनुसार शुरुआत में टुसु भासान के दिन ही सम्बन्धित स्थल पर ‘टुसु मेला’ लगता था। बांउड़ी, मकर या आखाइन के दिन मनोरंजन के तौर पर पारंपरिक खुखड़ा उड़ान का आयोजन होता था। समयांतराल में बदलाव के साथ मेले का स्वरूप भी बदलने लगा और टुसु भासान के उपरांत भी लोग अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र मेंं सुविधानुसार दिनों का चयन कर विभिन्न स्थलों पर मेला का आयोजन कराने लगे (बंगाल व उड़ीसा के कई क्षेत्रों मेंं अब भी टुसु भासान तक ही सीमित)। पुरस्कार की होड़ ने जहाँ लोगों को प्रोत्साहित किया, वहीं परब के मूल भाव को भी कुछ हद तक प्रभावित किया। चउड़ल, जिसे लड़कियां अपने कंधे या सर मेंं ढोकर उसमें टुसु को नाचते-गाते विदाई देने ले जाते थे, अब मेले मेंं प्रथम पुरस्कार की चाह में ट्रक मेंं लोड कर उंचे-उंचे गगनचुंबी चउड़ल बनाकर लेकर जाते हैं। मेले में खुखड़ा लड़ाई कहीं-कहीं जुए का रुप ले लेता है, जो सामाजिक तौर पर हानिकारक है. इसके स्थान पर अगर झूला लगाना, खेल प्रतियोगिता, पारंंपरिक झुमर व पाटा नाच प्रतियोगिता एवं सामाजिक, सांस्कृतिक व शिक्षापरक क्विज प्रतियोगिता वगैरह का आयोजन किया जाय, तो समाज निश्चित रूप से लाभान्वित होगा। साथ ही परब और मेला के बहाने शराब सेवन की आदत भी त्यागने की जरुरत है, तभी मेले मेंं समाज की महिलाएं-बच्चे भी बेझिझक शिरकत कर सकेंगे और मेला का सभी सपरिवार लुत्फ उठा सकेंगे और मेला की सार्थकता कायम रहेगी।
(लेखक: प्रसेनजीत महतो ‘काछिमा’
केंद्रीय अध्यक्ष, आदिबासि कुड़मि समाज, झारखंड)
 
 
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