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भारतीय ज्ञान और अध्यात्म के प्रणेता, युवाओं के शक्तिपुंज स्वामी विवेकानंद

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भारत जब ब्रिटिश सरकार के पराधीन था, तब स्वामी विवेकानंद ने कहा था उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त ना हो जाए। ऐसा संदेश देने वाले स्वामी विवेकानंद जिनके बचपन का नाम नरेंद्र नाथ दत्ता था,ने ऐसा संदेश देकर देशवासियों की की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया। अपने ज्ञान तथा अध्यात्म का परचम सारी दुनिया में फैलाने वाले महान महापुरुष स्वामी विवेकानंद भारतीय ज्ञान तथा अध्यात्म के प्रणेता तथा युवाओं की प्रेरणा के शक्तिपुंज माने जाते हैं। ऐसे महान स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 18 63 मैं कोलकाता के सिमुलिया नामक स्थान में हुआ था। सन्यास ग्रहण करने के बाद जब वह एक परिव्राजक के रूप में भारत भ्रमण पर थे, तब खेतड़ी के महाराज ने उन्हें विवेकानंद नाम दिया। वर्ष 1893 में जब संयुक्त राज्य अमेरिका में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन हुआ तो खेतड़ी के महाराज ने उन्हें भारत के प्रतिनिधि के रूप में उसमें शामिल होने के लिए भेजा। 11 सितंबर 1893 में इस सभा के स्वागत भाषण में स्वामी जी ने श्रोताओं को संबोधित करते हुए जैसे ही कहा प्रिय बहनों और भाइयों उन्होंने यह बात अंग्रेजी में कहीं डियर सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ अमेरिका, वैसे ही तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा सदन गूंज उठा । सारे के सारे लोग आश्चर्यचकित थे, पृथ्वी के दूसरे छोर से आए एक व्यक्ति ने पराए देश के लोगों को अपना बहन, भाई मानकर संबोधित किया और अपने संबोधन में स्त्रियों को प्रथम स्थान प्रदान किया, और इसके तत्काल बाद उन्होंने जब हिंदू धर्म और अध्यात्म की बात करनी शुरू की, तो अमेरिका ही नहीं दुनियाभर के विद्वानों का बड़ा समूह उन्हें लगातार ध्यान से सुनता रहा। यह सम्मेलन 27 सितंबर तक चलता रहा। इन 17 दिनों में उनका व्याख्यान सुनने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि होती रही ।उन्होंने न सिर्फ साहित्यिक, सामाजिक बल्कि वैज्ञानिक जगत से जुड़ी हुई बातों के पहलुओं पर भी ज्ञान का प्रकाश डाला। संयुक्त राज्य अमेरिका में उनके व्याख्यान के सुनने वाले विद्वान, चिंतक, प्राध्यापक, साहित्यकार, इंजीनियर, डॉक्टर तथा वैज्ञानिक भी शामिल थे। विश्व धर्म सम्मेलन की यह घटना उन दिनों की है ,जब भारत ब्रिटिश सरकार के पराधीन था। पश्चिम जगत के लोग भारतीयों को हेय दृष्टि से देखते थे उनकी यह अवधारणा थी कि भारत में विद्वानों ,चिंतकों की नितांत कमी है, एवं यह देश सभी मामलों में पिछड़ा हुआ है। स्वामी विवेकानंद भारत के वे पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने पश्चिम जगत के लोगों को इस भ्रम को दूर कर भारतवर्ष के ज्ञान, अध्यात्म, संस्कृति की विद्वता का डंका सारी दुनिया में बजाया। विश्व धर्म सम्मेलन के समापन के बाद स्वामी जी ने विश्व के अनेक देशों की यात्रा की जिस देश में भी गए वहां लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। वर्ष 1894 में वेदांत समिति की स्थापना की। वर्ष 1897 को उन्होंने कोलकाता में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। 9 दिसंबर 1898 को उन्होंने कोलकाता के निकट हुगली नदी के किनारे वेल्लोर में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की जिसमें उन्हें सिस्टर निवेदिता का महत्वपूर्ण सहयोग प्राप्त हुआ। वर्तमान में इस संस्था की शाखाएं विश्व के अनेक देशों में यह संस्था शिक्षा एवं समाज सेवा तथा आध्यात्मिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए विश्व भर में विख्यात है। विवेकानंद के व्याख्यानों एवं संदेशों ने पश्चिम के विशिष्ट बौद्धिक, चिंतक लोगों जैसे विलियम जेम्स, निकोलस टेस्ला, नेलसन रॉकफेलर, लिओ टॉलस्टॉय, रोम्या रोला,इत्यादि को बहुत प्रभावित किया। इतिहासकार ए,ल,बाशम ने स्वामी विवेकानंद को वह पहला व्यक्ति बताया जिसने पूर्व की आध्यात्मिक संस्कृति के मित्रता पूर्ण प्रत्युत्तर का आरंभ किया, उन्हें आधुनिक विश्व को आकार देने वाला भी घोषित किया। भारत में अरविंदो घोष, सुभाष चंद्र बोस, सर जमशेदजी टाटा,रविंद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी जैसे महान व्यक्तियों ने स्वामी विवेकानंद को भारत की आत्मा को जागृत करने वाला महान भारतीय राष्ट्रवाद के प्रणेता के रूप में देखा। स्वामी विवेकानंद वह पहले अंतरराष्ट्रीय नेता थे जिन्होंने लीग ऑफ नेशंस के जन्म से भी पहले 1897 में अंतरराष्ट्रीय संगठनों गठबंधनों और कानूनों का आह्वान किया था, जिससे राष्ट्रों के बीच समन्वय स्थापित किया जा सके। स्वामी जी ने अपने जीवन काल में विश्व के अनेक स्थानों पर आध्यात्म भारतीय सनातन धर्म योग आदि विषयों पर वृहद व्याख्यान दिए। उनके व्याख्यानों तथा उपदेशों को रामकृष्ण मिशन ने अनेक पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किया। स्वामी विवेकानंद ने अनेक पुस्तकों का प्रकाशन भी किया जिनमें राजयोग, कर्मयोग,ज्ञानयोग, भक्तियोग प्रमुख मानी जाती हैं। उनका मानना था कि किसी भी देश की प्रगति तभी संभव है जब वहां की नारी और शिक्षित हो एवं उनको यथा योग्य सम्मान दिया जाए। उन्होंने नारियों की दशा सुधारने के लिए अनेक कार्य किए। नारियों के महत्व को दर्शाने के लिए उन्हें कन्या पूजन की परंपरा की शुरुआत की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 1985 में अंतरराष्ट्रीय वर्ष के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ ने युवा वर्ष मनाने की घोषणा की तब भारत सरकार ने उनके जन्मदिवस पर 12 जनवरी को “राष्ट्रीय युवा दिवस” के रूप में मनाने की घोषणा की। स्वामी विवेकानंद जी का दर्शन ,उनका जीवन, उनके आदर्श सदैव भारतीय युवाओं की प्रेरणा ऊर्जा के महान स्रोत रहे हैं। उन्हें हम सब भारत वासियों की तरफ से नमन प्रणाम।

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