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श्रीलंका के लॉ कॉलेज में सरकार के निर्णय पर किया समर्थन

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श्रीलंका के शिक्षाविद ने वहां के लॉ कॉलेज में अंग्रेजी को शिक्षा का माध्यम बनाने वाले सरकार के निर्णय समर्थन किया है। यह जानकारी आइलैंड समाचारपत्र ने बुधवार को दी।

आइलैंड समाचारपत्र के अनुसार, शिक्षाविद एमए कलील ने कहा है कि निश्चित रूप से अंग्रेजी माध्यम लॉ कॉलेज से पढ़ाई किए हुए वकीलों की गुणवत्ता में सुधार करेगा और उनकी रोजगार क्षमता को भी बढ़ावा देगा।

उन्होंने कहा, “इससे उन्हें उच्च शिक्षा और विदेश में रोजगार प्राप्त करने में मदद मिलेगी। इससे आम लोगों की नजरों में उनकी छवि भी अच्छी होगी। लोग हमेशा ऐसे वकील को कम आंकते हैं जो अंग्रेजी बोलने से हिचकिचाते हैं या अंग्रेजी बिल्कुल भी नहीं बोलते हैं।”

श्री कलील ने कहा कि वर्तमान समय में सिंहली और तमिल में कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों की संख्या अंग्रेजी में पढ़ाई करने वाले छात्रों की तुलना में बहुत ज्यादा है।

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उन्होंने कहा, “कुछ विपक्षी सांसदों की यह दलील कि लॉ कॉलेज में शिक्षा का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी रहने से ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्रों के साथ भेदभाव होगा, तर्कसंगत नहीं है।”

विदेश मंत्री अली साबरी ने उनकी चिंताओं को खारिज करते हुए कहा , “अगर ग्रामीण पृष्ठभूमि के छात्र अंग्रेजी का ‘ओ लेवल’ उत्तीर्ण किए बिना अंग्रेजी माध्यम में चिकित्सा और इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर सकते हैं, तो प्रवेश परीक्षा में अंग्रेजी भाषा का एक पेपर पास कर लॉ कॉलेज में नामांकन कराने वाले छात्र ऐसा क्यों नहीं कर सकते हैं।”

श्री कलील ने कहा कि स्थानीय भाषाओं में कानून की पढ़ाई करने वाले अधिकांश वकील खुद मानते हैं कि उनकी अंग्रेजी बहुत खराब है, वे अंग्रेजी में कानूनी पुस्तकों को उद्घृत नहीं कर सकते हैं और न ही वे अंग्रेजी में कोई मसौदा तैयार कर सकते हैं। उनका मानना है कि ऊपरी अदालतों में उनके लिए कानूनी प्रैक्टिस करना बहुत कठिन हैं और उनके लिए विदेशों में रोजगार प्राप्त करने की संभावनाएं बहुत धूमिल हैं।

1970 के दशक में, श्रीलंका ने तमिल अलगाववाद का बीज बोते हुए पूरे देश पर सिंहली भाषा को थोप दिया था। दशकों बाद, अब देश यह महसूस करने लगा है कि अंग्रेजी का ज्ञान उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि मातृभाषा का।

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