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वसंतोत्सव पर विशेष: राधारमण मन्दिर में बहने लगी होली की वासंती बयार

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मथुरा :उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी वृन्दावन के सप्त देवालयों में अति प्राचीन राधारमण मन्दिर में ठंड के बावजूद होली की वासंती बयार बहने लगी है।
राजभोग दर्शन के बाद मन्दिर का प्रांगण होली के रंग में ऐसा रंग जाता है कि जो भी भक्त उस समय मन्दिर में दर्शन के लिए आता है, उसे श्यामा श्याम की कृपा की अनुभूति होती है। गत वर्ष 11 दिसंबर को समाप्त हुए वासंतोत्सव के प्रथम चरण में दोपहर राजभोग आरती से जहां वातावरण श्रद्धा और भक्ति से परिपूर्ण हो गया वहीं आरती के बाद आए ठाकुर के चरणामृत के छीटों ने श्रद्धालुओं को ऐसा आनन्द दिया, जिसका अनुभव उनके चेहरे के भाव को पढ़कर ही किया जा सकता है।
मन्दिर के गर्भ गृह में श्यामा श्याम की होली के बाद श्याम सुन्दर ने मन्दिर के सेवायत आचार्य दिनेश चन्द्र गोस्वामी को आदेश दिया कि गर्भ गृह का प्रसादी गुलाल वे भक्तों पर डालें। कुछ ही क्षणों में मन्दिर का प्रांगण होली के रंग मे रंग गया। गायन, वादन और नृत्य की त्रिवेणी बह चली। एक ओर मन्दिर के जगमोहन से पीले गुलाल की वर्षा हो रही थी तो दूसरी ओर रसिया के स्वर ढाप पर गूंज रहे थे।
आज बिरज में होरी रे रसिया होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया आज बिरज में होरी रे रसिया।
रसिया के इन्हीं स्वरों के बीच गोपियां भाव विभोर होकर नृत्य करने लगीं तो उन्हें नृत्य करता देख एक विदेशी कृष्ण भक्त भी थिरकने लगा। इसके बाद तो नृत्य करने की होड़ सी लग गई।
‘‘उड़त गुलाल पीरे भये बादर’’ की धुन पर मन्दिर के जगमोहन से बचा गुलाल जब भक्तों पर डाला गया तो कुछ समय बाद ही होली की त्रिवेणी का प्रवाह रुका और एक बार फिर मन्दिर के पट बन्द होने के पहले लोग अपलक ठाकुर जी को निहार रहे थे। पट बन्द होते ही समूचा मन्दिर ’राधारमण लाल की जै’’ से गूंज उठा।
राधारमण मन्दिर के सेवायत आचार्य गोस्वामी ने बताया कि ब्रज की होली श्यामा श्याम की अनूठी होली है।यहां श्याम सुन्दर को राधा रानी की सखियां ‘नर ते नारि’ बनाने का प्रयास करती हैं तो श्याम सुन्दर भी सखाओं के साथ गोपियों पर उनकी नई चूनर मे रंग डालने से पीछे नही हटते भले ही सखियां राधा रानी से शिकायत करते हुए कहती हैं कि ‘ ऐसो चटक रंग डारयो श्याम, मेरी चूनर में लग गयों दाग री । ’ उन्होंने बताया कि श्याम सुन्दर पहले राधारानी और उनकी सखियों के संग होली खेलते हैं तथा बाद में वे ब्रजवासियों से होली खेलते हैं क्योंकि ब्रज और ब्रजवासी उन्हें अत्यन्त प्रिय हैं तभी तो वे कहते है .. ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं।
उन्होने कहा कि इसी भाव में भर कर वे ब्रजवासियों से भी राजभोग के समय होली खेलते हैं और गाते हैं..
राधारमण खेलैं होरी।
इत नदनन्दन रसिक सांवरो
उत वृषभान सुता गोरी।
सेवायत गोस्वामी के अनुसार खेतों में पकी सरसों के फूलों का ठाकुर जी के श्रंगार में विशेष उपयोग होता है। जबकि उनके खानपान में केशर का प्रयोग होता है।
मन्दिर की सबसे बडी विशेषता यह है कि ठाकुर जी के होली खेलने के बावजूद मन्दिर के वातावरण की दिव्यता राधारमण महाराज के भक्तों को ऐसा सुख देती है जिसका अनुभव इस स्वयं प्राकट्य विगृह के दर्शन करने के बाद ही किया जा सकता है। मन्दिर में जो साख्य, यशोदा अथवा देव भाव से दर्शन करने आता है उसे जब उसी भाव के दर्शन मिलते हैं तो वह झूम जाता है तभी तो कहा गया है कि लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल।
लाली देखन मै चली मैं भी हो गयी लाल।
कुल मिलाकर वर्तमान में राधारमण मन्दिर में गुलाल की फुहारों के बीच श्रद्धा, भक्ति और संगीत की, भक्तिभाव से मदहोशा कर देने वाली त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है।
ठाकुर जी के दर्शन बन्द होने के बाद भक्तों ने मन्दिर की रसोई के क्षेत्र में प्रसाद गृहण कर जहां स्वयं को धन्य किया वहीं, उन्होंने मन्दिर के अन्दर उस स्थल पर पहुंचकर श्रद्धा व्यक्त की जहां पौने पांच सौ वर्ष से निरन्तर अग्नि प्रज्वलित हो रही है।

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