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2022 के लिए कुछ आर्थिक प्राथमिकताएं

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अजीत रानाडे

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भारत सबसे बड़ी असमान अर्थव्यवस्था में से एक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उच्च बहुआयामी गरीबी दरों की भी पुष्टि करती है। वास्तव में नीति आयोग के मानदंडों में आय शामिल नहीं है और यह शिशु मृत्यु दर, परिसंपत्तियों के स्वामित्व और शिक्षा जैसे मानदंडों पर निर्भर करता है। नया साल जल्द ही आ रहा है। नव वर्ष के एक महीने के भीतर ही वित्त मंत्री बजट पेश करेंगे जिसमें अप्रैल 2022 में शुरू होने वाले अगले वित्त वर्ष के लिए उनकी खर्च प्राथमिकताओं को रेखांकित किया जाएगा। आर्थिक सर्वेक्षण के माध्यम से देश के आर्थिक प्रदर्शन पर हमें एक रिपोर्ट कार्ड भी मिलेगा। वास्तव में विभिन्न माध्यमों से हर पखवाड़े व महीने हमें आर्थिक स्थिति की जानकारी मिलती रहती है जिससे पता चलता है कि आर्थिक क्षेत्र में हम क्या और कैसे कुछ कर रहे हैं; और हमें वास्तव में साल के अंत में रिपोर्ट कार्ड के लिए इंतजार करने की जरूरत नहीं होती। इस लेख का उद्देश्य बजट पूर्व इच्छा सूची के बारे में लिखना नहीं है बल्कि आगामी वर्ष के लिए प्राथमिकताओं की पहचान करना है। नूतन साल के स्वागत के समय हमारी आर्थिक पृष्ठभूमि क्या है, इसके सकारात्मक पक्ष पर विचार करें तो विश्व अर्थव्यवस्था व्यावहारिक रूप से फल-फूल रही है। दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं यानी अमेरिका और चीन दोनों ही 5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही हैं। अमेरिका में उच्च विकास के कारण कुछ ओवरहीटिंग हो रही है। अर्थव्यवस्था में ओवरहीटिंग के हालात तब बनते हैं जब वह मौजूदा संसाधनों से लगभग पूरी क्षमता के साथ तरक्की कर रही होती है लेकिन उसकी वृद्धि दर मांग पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं होती। मुद्रास्फीति की दर लगभग 7 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है जो पिछले चार दशकों में सबसे अधिक है। यह धन की अतिरिक्त आपूर्ति और अब श्रम व कौशल की कमी से बढ़ा है। विश्व अर्थव्यवस्था में उच्च वृद्धि के कारण भारत जैसे विकासशील देशों के लिए निर्यात के अवसर बढ़ने चाहिए। दरअसल भारत का माल निर्यात इस साल 400 अरब डॉलर को छू सकता है जो पिछले साल के मुकाबले करीब 40 फीसदी की छलांग है। अन्य सकारात्मक संकेतक अच्छा कर संग्रह है जो पिछले साल के बजट में निर्धारित लक्ष्य से बहुत आगे है, शेयर बाजार की उछाल, कंपनियों का उच्च मूल्यांकन, कॉर्पोरेट क्षेत्र में अच्छा मुनाफा (कम से कम बड़े कॉर्पोरेट में) एवं बैंकों की बैलेंस शीट में शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (यानी खराब ऋण- एनपीए) के कम अनुपात के रूप में हैं। नकारात्मक पक्ष में सबसे पहले ओमिक्रान के बारे में चिंता है। तीसरी लहर कितनी बड़ी होगी? क्या यह शक्तिशाली होगी? क्या इसके आने पर फिर लॉकडाउन करना पड़ेगा? इस डर को आंशिक रूप से कम किया जा सकता है क्योंकि इस समय स्वास्थ्य क्षेत्र में बेहतर तैयारी है जिसमें आॅक्सीजन व बिस्तरों सहित टीका लगाए गए लोगों का एक बड़ा और बढ़ता हिस्सा है। सामूहिक प्रतिरक्षा का एक मिश्रित व उच्च स्तर है, मास्किंग जैसे प्रोटोकॉल का बेहतर अमल है, लॉकडाउन प्रतिबंधों के माइक्रो-मैनेजिंग की बेहतर समझ और अंत में शायद यह अनिच्छापूर्ण स्वीकृति है कि जीवन चलता ही जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त यह अनुमान है कि (शायद) कोविड-19 का यह वेरिएंट अत्यधिक संक्रामक है लेकिन उतना घातक नहीं है। बेशक इन तर्कों का मतलब यह नहीं है कि हम लापरवाही बरतें। अन्य नकारात्मक पहलू अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में, विशेष रूप से गहन संपर्क क्षेत्रों (जैसे सड़क किनारे विक्रेताओं, किराना दुकानों, मॉल श्रमिकों) में संकट हैं। जैसा कि राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत काम की बढ़ी हुई मांग से प्रकट होता है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी काफी दबाव में है। अपेक्षित बंपर फसल के बावजूद अनाज के दाम कम हैं इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ाने की मांग की जा रही है। इधर मुख्य रूप से खाद्य तेलों (मोटे तौर पर आयातित), दूध और पोल्ट्री जैसे प्रोटीन आइटम के कारण खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ रही है। ग्रामीण बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है इसलिए राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना(एनआरईजीएस) के तहत रोजगार की मांग की जा रही है। उधर ग्रामीण मजदूरी में ठहराव आ रहा है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के आंकड़े बताते हैं कि भारत की श्रम भागीदारी दर (एलपीआर) एशिया में सबसे कम, केवल 40 प्रतिशत है। यह 18 से 60 वर्ष आयु वर्ग के बीच के लोगों का अनुपात है जिनके पास नौकरी है या जो नौकरी की मांग कर रहे हैं। यहां तक कि बांग्लादेश में यह 53, पाकिस्तान में 48 और नेपाल में 74 फीसदी है। क्या भारत का कम अनुपात इस बात को उजागर कर रहा है कि श्रमिकों ने हतोत्साहित होकर नौकरी पाने की उम्मीदें भी छोड़ दी हैं? समकक्ष देशों की तुलना में भारत की महिला श्रम भागीदारी दर 20 प्रतिशत है जो पहले से ही सबसे कम है और काफी समय से चिंता का कारण बनी हुई है। असमानता में वृद्धि में मुद्रास्फीति तथा बेरोजगारी (और कम एलपीआर) का भी योगदान है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 से पता चलता है कि शीर्ष 10 फीसदी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57 प्रतिशत हिस्सा है। इस शीर्ष में 1 प्रतिशत के पास राष्ट्रीय आय का 22 फीसदी हिस्सा है जबकि नीचे के आधे लोगों के पास सिर्फ 13 प्रतिशत हिस्सा है। इस वजह से भारत सबसे बड़ी असमान अर्थव्यवस्था में से एक है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बिहार, झारखंड तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में उच्च बहुआयामी गरीबी दरों की भी पुष्टि करती है। वास्तव में नीति आयोग के मानदंडों में आय शामिल नहीं है और यह शिशु मृत्यु दर, परिसंपत्तियों के स्वामित्व और शिक्षा जैसे मानदंडों पर निर्भर करता है। ओमिक्रान के अलावा मुद्रास्फीति, बेरोजगारी, गरीबी एवं असमानता सहित बैंकों से ऋणों के उठाव की धीमी गति, निजी क्षेत्र से आने वाली बड़ी निवेश परियोजनाओं में भागीदारी के कम साक्ष्य और स्कूलों से छात्रों की निरंतर अनुपस्थिति जैसे चिंता के अन्य कारण हैं। स्कूली शिक्षा में दो साल के इस अंतराल का भारत के मानव पूंजी विकास पर दीर्घकालिक हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। सो, अगले साल की प्राथमिकताएं स्वयं ही स्पष्ट दिख रही हैं। सबसे पहले कठोर लॉकडाउन का उपयोग किए बिना या जनता को धोखे में रखे बिना ओमिक्रॉन के लिए तैयार होना है। टीकाकरण की प्रगति को कायम रखते हुए इसे और तेज किया जाना चाहिए। दूसरा, स्कूलों में रोटेशन के साथ कम से कम 50 प्रतिशत छात्रों की उपस्थिति निश्चित करना। राष्ट्रव्यापी पोर्टेबल प्रशिक्षु योजना सहित कौशल व प्रशिक्षण को सरकार समर्थित मान्यता के साथ तत्काल शुरू किया जाना चाहिए।
यदि कॉरपोरेट क्षेत्र को प्रशिक्षुओं को स्थायी रूप से काम पर रखने के बोझ से मुक्त किया जाए तो वे उन्हें आसानी से रोजगार देंगे। तीसरा, राष्ट्रीय आधारभूत संरचना की परियोजनाओं का निष्पादन शीघ्र शुरू हो। इन पर काम शुरू होगा तो सालाना 20 लाख करोड़ के करीब खर्च होगा जिसका नौकरियों के साथ-साथ सहायक और विक्रेता उद्योगों पर गुणक प्रभाव पड़ सकता है। चौथा, निरंतर निर्यात वृद्धि के लिए समर्थन सुनिश्चित करना। जीएसटी की जीरो रेटिंग वांछनीय है। कृषि निर्यात पर प्रतिबंध न लगाया जाए। वर्तमान में 13 क्षेत्रों पर लागू उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना की सफलता सुनिश्चित करने के साथ उसका निर्यात सहायता के साथ सामंजस्य भी स्थापित करना चाहिए। भारत को बांग्लादेश से सीखना चाहिए जो एक दशक से अधिक समय से वस्त्र और कपड़ों के निर्यात पर लगातार ध्यान देने के साथ प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत से आगे निकल गया है। पांचवा, टैक्स के बोझ को तर्कसंगत बनाना है। जीएसटी जैसे अप्रत्यक्ष करों से अमीरों से कहीं ज्यादा गरीब प्रभावित होते हैं। कुल करों में प्रत्यक्ष करों का हिस्सा घटने के कारण हम पिछड़ गए हैं। इसे उलटना होगा, यानी करों में प्रत्यक्ष करों की हिस्सेदारी बढ़ानी होगी। ऐसा करने से बढ़ती असमानता पर भी रोक लगेगी। उम्मीद है कि हम अगले साल अर्थव्यवस्था को बढ़ता हुआ देखेंगे। एक बार व्यापार और उपभोक्ता का भरोसा मिलने पर निजी निवेश में वृद्धि होगी ही। इसके लिए उपरोक्त नीतिगत आवश्यकताओं में से कुछ को लागू करना होगा और इसके लिए केन्द्र और राज्य सरकारों दोनों की ओर से कार्रवाई की आवश्यकता है। हम सभी पाठकों को एक सुरक्षित, स्वस्थ और समृद्ध 2022 की बधाई दे रहे हैं।

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