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अब तो अमरीका जाना ही पड़ेगा

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रमेश जोशी
हमारे इलाके में पिछले हफ्ते कई जगह तापमान शून्य ने नीचे चला गया था। फतेहपुर शेखावाटी में तो माइनस 3.4 हो गया था। हालांकि इस उम्र में, ऐसी सर्दी में हम अस्सी के आसपास वालों को खतरा ही रहता है। लेकिन जैसे खालिस्तानी और अमीर किसान तीन कृषि कानूनों की वापसी के इंतजार में साल भर दिल्ली की सीमाओं पर बैठे रहे या छोटे किसान अपनी आय दुगुनी होने के इंतजार में आत्महत्या नहीं कर रहे हैं वैसे ही हम इस हाड़ कंपा देने वाली ठण्ड में भी हिम्मत बांधे हुए हैं। अच्छे दिन और 15 लाख के इंतजार में नहीं बल्कि 1 अगस्त 2022 को 20% बढ़ जाने वाली पेंशन की अपनी पास बुक में एंट्री देखने के लिए जिससे कि स्वर्ग में (यदि नसीब हुआ) अन्य स्वर्गीयों के सामने कम लज्जित होना पड़े। कमरे में रजाई में पांव घुसाए कूकड़ी हुए बैठे थे कि तोताराम ने आते ही सूचित किया- मास्टर, अब अमरीका जाना ही पड़ेगा। हमने भी उसके भ्रम को बनाए रखते हुए कहा- क्या जो बाईडन ने तेरे लिए हाउ डी तोता कार्यक्रम आयोजित किया है ? बोला- हालांकि तुझे भी पता है कि अब अमरीका में मेरे मित्र ट्रंप राष्ट्रपति नहीं हैं, जो बाईडन ऐसे फालतू के कार्यक्रम आयोजित नहीं करते और फिर ट्रंप भी कोई अपने खर्चे से कार्यक्रम आयोजित थोड़े ही करते। दोनों तरफ खर्चा तो अपना ही होता जैसे कि हाउ डी मोदी में अमरीका में भी खर्च भारतीयों का हुआ और जब ट्रंप यहां आये तो नमस्ते ट्रंप में भी खर्चा हमारा ही हुआ। लेकिन फायदा क्या हुआ? वहां ट्रंप निबट गए और यहां उसके बाद कोरोना ने गंगा को शव वाहिनी कर दिया। उसके बाद कोरोना ने गुजरात के किसी भाजपा नेता द्वारा सप्लाई किये नकली वेंटीलेटरों ने भद्द पिटवा दी। उसके बाद सूरत से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश होते हुए आये नकली रेमडेसीवेयर ने यश का रायता फैला दिया। और अब रही सही कसर ममता दीदी ने खेला करके पूरी कर दी। ऊपर से अब उत्तर प्रदेश में यह प्रियंका कह रही है- लड़की हूं, लड़ सकती हूं। हमने कहा-भारत की इस राष्ट्रवादी रामायण का कोई अंत नहीं है। तू तो यह बता कि तेरे लिए अमरीका जाने की ऐसी क्या मजबूरी आ गई। तू तो ऐसे कह रहा है जैसे कि तुझे भी नीरव मोदी, माल्या और चौकसे की तरह भारत छोड़ना ही पड़ेगा। बोला- मैं तो इस ठंड के चक्कर में परेशान हूं। सोचता हूं, इस समय अमरीका में मौसम ठीक चल रहा है। हमने कहा-दक्षिण अमरीका का तो पता नहीं लेकिन उत्तरी अमरीका के उत्तरी इलाके में तो बहुत बर्फ पड़ती है। बोला- अब वहां भी हमारे विश्वगुरु बनाने की तरह मेक अमरीका ग्रेट अगेन के राष्ट्रवाद के कारण जलवायु परिवर्तन हो गया है। गरमी आ गई है। हमने पूछा- जलवायु भी क्या कोई राष्ट्रवादी, राष्ट्रविरोधी, दक्षिणपंथी, वामपंथी, हिन्दू मुसलमान होता है ? बोला- ट्रंप ने अपने अनुयायियों में इतना राष्ट्रवादी उत्साह भर दिया कि डंडे, बंदूक लेकर बाईडन को कार्यभार संभालने से रोकने के लिए कैपिटल हिल पहुंच गए थे। अब जब वहां की संस्थाओं ने ट्रंप को घपला करने से रोक दिया तो वह ऊर्जा कहां जायेगी। अब वह ऊर्जा अमरीका का तापमान बढ़ा रही है। कनाडा की सीमा पर स्थित मध्य अमरीका के राज्यों में जहां तापमान महिनों माइनस में रहता था अब वहां बरसात हो रही है। तापमान जीरो से नीचे गया ही नहीं। हमने कहा- यह तो बहुत चिंता की बात है। बोल- क्यों? हमने कहा- जैसे अपने यहां पहले लू में मच्छर मर जाते थे और सर्दी में मक्खियां मर जाती थी। तमिलनाडु में जयललिता और करुणानिधि तथा राजस्थान में गहलोत और वसुंधरा की तरह बारी-बारी आते थे लेकिन अब तो दोनों ही दोनों ऋतुओं में परेशान करते हैं। वैसे ही वहां अमरीका में भी सर्दी में मर जाया करने वाले कीट-पतंगे मर नहीं रहे हैं। ऐसे में वे सर्दी में होने वाली फसलों पर हमला करेंगे। बोला- अपने को क्या है? अपन तो जब यहां सर्दी कम हो जायेगी तब लौट आयेंगे। हमने कहा- यहां तो पता नहीं सर्दी से मरेगा या नहीं लेकिन वहां भी अब ओमिक्रोन फैल रहा है। उसकी चपेट में आगया तो? यहीं रह। यहां जब तक कहीं भी चुनाव हैं तब तक कोरोना का बाप भी कुछ नहीं कर सकता चाहे हजार रैलियां करो। उसके बाद गरमियां आ ही जायेंगी।

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