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सिमडेगा : स्कूल बैग के वजन को कम करना नितांत जरूरी

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किसी भी देश की नींव उस देश के नौनिहालों से गहराई के जुड़ी होती है। परिवार और स्कूल, किसी भी नौनिहाल के व्यक्तित्व के निर्माण की अहम कड़ी होते हैं। परिवार को मनुष्य जीवन की प्रथम पाठशाला कहा जाता है, जहां नौनिहाल परिवार के सदस्यों के बीच अनुशासन, समर्पण, आदर, संस्कार आदि गुणों को सीखते हैं तथा कालांतर में जब वे स्कूल के प्रांगण में पहली बार कदम रखते हैं तो वे स्कूल के नए परिवेश से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ते हैं। एक ओर उसके परिवार की पृष्ठभूमि तथा दूसरी ओर स्कूल के नए परिवेश और इनके बीच का संघर्ष, उनकी शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को काफी प्रभावित करते हैं। जहाँ तक शारीरिक स्वास्थ्य का सवाल है तो लंबी अवधि से स्वयंसेवी संगठनों, स्वायत्त संस्थाओं, न्यायालयों, केंद्र एवं राज्य सरकारों तथा अभिभावकों की तरफ से स्कूल बैग के वजन को लेकर चिंता जाहिर की जाती रही है। प्रश्न उठता है कि स्कूल बैग के वजन को कम करने के लिए 1993 में यशपाल समिति की सिफारिश, 2006 में बॉम्बे हाईकोर्ट के निर्देश, 2016 में सीबीएसई द्वारा स्कूलों को दिए गए निर्देश, 2018 मद्रास हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले तथा नई स्कूल बैग नीति, 2020 के बावजूद देश के नौनिहालों के बैग का वजन कम क्यों नहीं हो पा रहा है? आज इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।

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जब कभी इस बात पर चर्चा होने लगती है कि स्कूल बैग का वजन कम होना चाहिए तो हम सरकारी व निजी संस्थाओं की कार्यशैली, सरकारी तंत्र की अक्षमता व विफलता पर शोर मचाना शुरू कर देते हैं। जाहिर है कि नियम बनाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी उसका पालन करना भी है। आखिर किसी न किसी स्तर पर चूक तो हो रही है, जिसकी वजह से देश के नौनिहालों के स्कूली बैग का वजन कम होता नहीं दिख रहा है। सच्चाई है कि आज हम नौनिहालों को यंत्रीकरण की आंधी में झोंक, उनके स्वास्थ्य की मंगल कामना कर रहे हैं। हमें तो बस, इस बात की परवाह है कि हमारे बच्चे अन्य बच्चों की तुलना में कहीं पिछड़ न जाएं। उनकी पीठ पर बढ़ रहे बोझ के प्रति हमारी संवेदनशीलता, बच्चों पर सामर्थ्य से ज्यादा लादने की हमारी होड़ के सामने दम तोड़ रही है। ऐसे में स्कूली बैग के वजन को कम करने की चाह, बेमानी है। बहरहाल, नौनिहालों के सामर्थ्य व उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए ही अभिभावकों तथा स्कूल प्रबंधन को आगे की रणनीति पर विचार करना ज्यादा उचित होगा। (ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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डॉ. सुमन कुमार सिंह
जवाहर नवोदय विद्यालय,
कोलेबिरा, सिमडेगा (झा.)

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