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राधाप्यारी ने जनम लियो है,कुंवर किशोरी ने जनम लियो है

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मथुरा : प्रेम रस में सराबोर राधारानी की गांव बरसाना और कान्हा की नगरी नन्दगांव समेत समूचे ब्रजमंडल में 14 सितम्बर को राधाष्टमी के अवसर पर मंदिरों में ‘राधाप्यारी ने जनम लियो है,कुंवर किशोरी ने जनम लियों है।’’ के गीत गूजेंगे।होली हो या नन्दोत्सव या अन्य कोई त्योहार बरसाना और नंदगांव के लोग साथ साथ मिलकर पूर्ण सौहार्द्र के साथ मनाते हैं। राधाष्टमी पर दोनों गावों का आपसी सौहार्द्र देखते ही बनता है। लोग मिलकर प्रार्थना करते है , ‘‘मेरी भव बाधा हरो, राधा नागरि सोय। जा तन की झांई पड़े, श्याम हरित दुति होय।’’ लाडली मन्दिर के सेवायत आचार्य रामभरोसी गोस्वामी ने बताया कि नन्दगांव के लोग राधाष्टमी के एक दिन पहले बरसाना आते हैं और वहां पर विधिवत समाज गायन में शामिल होते हैं । वे जब वहां से चलते हैं तो उन्हें लड्डू प्रसाद वितरित किया जाता है।
राधाष्टमी के एक दिन पहले ही बरसाना में तीर्थयात्रियों का हुजूम जुड़ जाता है। राधाष्टमी के दिन तड़के तीन बजे से लाडली मन्दिर के गर्भगृह में मूल शांति 27 कुओं के जल, 27 पेड़ों की पत्ती, 27 मीटर के पीले वस्त्र, 56 जड़ी बूटियों, नीलम, मूंगा, पन्ना, मोती, तांबे के नाग और नागिन एवं कोरे घड़े की सहस्त्रधारा से होती है। इसके बाद लगभग 4 बजे किशोरी जू का अभिषेक सवा कुंतल दूध, दही,शहद, घी, बूरे , औषधियों आदि से किया जाता है जो बाद में भक्तों में वितरित किया जाता है।
मूलशांति के बाद बधाई गायन और राधाजन्म की खुशी में खिलौने, बर्तन, वस्त्र, मिठाई तथा रुपए लुटाने की होड़ सी लग जाती है। उधर स्वर्ण पालने में राधा जी के दर्शन होते हैं। इसके बाद शंकर लीला तथा नन्दगाव और बरसाने के गोसाइयों द्वारा बधाई गायन होता है तथा बाद मे भक्ति संगीत के साथ ही गहवर वन की परिक्रमा होती है।
कीर्ति मन्दिर बरसाना के नितिन ने बताया कि कोविद-19 के नियमों का पालन करते हुए इस बार मन्दिर में राधाष्टमी मनाई जाएगी। राधाष्टमी पर मन्दिर में लगभग आधा घंटे अभिषेक चलता है और फिर चरणामृत का वितरण भक्तों में होता है। राधाष्टमी के एक दिन पहले से एक दिन बाद तक की मन्दिर में की जाने वाली बिजली की रंगबिरंगी रोशनी देखते ही बनती है।
राधाष्टमी पर ब्रज के मंदिरों का दधिकानां देखते ही बनता है । वृन्दावन में राधाष्टमी पर अपरान्ह 1 बजे राधाबल्लभ मंदिर में गोस्वामियों का दधिकाना राधा जन्म पर खुशी का जीवन्त प्रस्तुतीकरण है। एक ओर उन पर हल्दी मिश्रित दही डाला जाता है तो दूसरी ओर मंदिर का वातावरण ‘‘ राधाप्यारी ने जनम लियो है , कुंवर किशोरी ने जनम लियों है ’’ से गूंज उठता है। वृन्दावन के सप्त देवालयों में मशहूर राधा दामोदर मंदिर में इस अवसर पर भक्तों पर हल्दी मिश्रित दही की होली सी हो जाती है ।
वृन्दावन के ही राधा श्यामसुन्दर मंदिर के सेवायत आचार्य कृष्णगोपालानन्ददेव प्रभुपाद ने बताया कि मन्दिर में राधारानी के हृदयकमल से प्रकटित विग्रह का 11 मन दूध, 6 मन दही, 3 मन बूरा, डेढ़ मन घी एवं 30 किलो शहद से भव्य अभिषेक दोपहर 12 बजे होता है। शाम को छप्पन भोग के दर्शन और महाआरती होती है। इस मंदिर में राधारानी के छठी पूजन में 111 साडियां, जेवरात, बर्तन, रुपया और फल लुटाए जाते हैं।
बांके बिहारी मंदिर में वैसे तो बिहारी जी महराज की नित्य निकुंज सेवा में ताली तक बजाना मना है लेकिन वर्ष में एक बार राधाष्टमी के दिन मंदिर की चौक में ’’वैनी गूंथन’’ लीला होती है। शाम को मंदिर से भव्य चाव निकलती है जो शहर से होती हुई निधिवनराज पहुंचती है। इसमें गोस्वामी वर्ग समाज गायन करते चलता है तो कुछ लोग राधाजन्म की खुशी में नृत्य करने लगते हैं।
निधिवनराज में आधी लीला पूरी होती है। आधी लीला के निधिवनराज में पूरी होने के संबंध में बांकेबिहारी मंदिर के सेवायत आचार्य प्रहलाद बल्लभ गोस्वामी ने बताया कि श्री जी का श्रंगार करने के बाद बिहारी जी महराज उन्हें लेकर निकुंज लीला में प्रवेश कर जाते हैं और श्री जी के प्रतिंिबबस्वरूप श्री ललिता जी को प्रकट किया जाता है। इसी भाव को परिलक्षित कराने के लिए आधी बैनी गूंथन लीला निधिवनराज में होती है। इस दिन मथुरा के केशवदेव मंदिर में मुख्य राधारानी का जन्म उनके ननिहाल रावल में होने के कारण वहां पर प्रात: 4 बजे से अभिषेक के साथ बधाई गायन शुरू हो जाता है तथा राधा जन्म की खुशी में लोग नृत्य कर उठते हैं। दोपहर बाद मंदिर के बाहर मेला सा लग जाता है। कुल मिलाकर राधा अष्टमी पर ब्रजमंडल ’’डार डार अरू पात पात में राधे राधे’’की प्रतिध्वनि से गूंज उठता है।

 

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