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थम नहीं रहा पुलिस जवानो और अधिकारियों की आत्महत्या का मामला


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पुलिस महकमा भी कारणों की तह तक जाने में अबतक है नाकाम
रामप्रसाद सिन्हा
पाकुड़: झारखंड को अपराध मुक्त बनाने, नक्सलियो की खनक और हनक को खत्म करने एवं प्रदेशवासियो को सुरक्षा मुहैया कराने वाले पुलिस महकमा से जुड़े कनीय पुलिस पदाधिकारियो और जवानो की आत्महत्या का मामला अपने राज्य में खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। झारखंड राज्य का संथाल परगना प्रमंडल हो या उतरी एवं दक्षिणी छोटानागपुर के कई जिलो में अलग राज्य बनने के बाद कही पुलिस जवान तो कनीय पदाधिकारी के आत्महत्या कर लिये जाने का मामला सामने आता रहा है लेकिन पुरूषार्थ, सहयोगी और लिप्सारहित मंत्र वाला यह पुलिस महकमा अबतक अपने जवानो और अधिकारियो की आत्महत्या के कारणो की तह तक जाने में और इसे रोकने में नाकाम रहा है। यदि पुलिस महकमा से जुड़े उच्च अधिकारियो का इमानदारी पूर्वक प्रयास होता तो साहेबगंज जिले की रूपा तिर्की, पाकुड़ जिले के रानु कुमार एवं पलामु जिले में पदस्थापित लालजी यादव जैसे अधिकारियो को आत्महत्या के लिए मजबुर नहीं होना पड़ता चाहे कारण जो भी हो। राज्य के पेयजल स्वच्छता मंत्री मिथिलेश ठाकुर ने भले ही राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री से लालजी यादव की आत्महत्या मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की हो लेकिन झारखंड अलग राज्य बनने के बाद से अबतक पुलिस महकमा ने अपने जवानो एवं कनीय अधिकारियो द्वारा की जा रही आत्महत्या मामले को गंभीरता से नहीं लिया। यही वजह है कि न तो इन घटनाओ की तह तक जाया जा सका और न ही इसके वास्तविक कारणो का पता ही लग पाया। आत्महत्या के अधिकांश मामलो में पारिवारिक विवाद, प्रेम प्रसंग आदि से जोड़कर मामले की इतिश्री ही अबतक की गयी है। राज्य के पेयजल स्वच्छता मंत्री द्वारा उच्च जांच की सिफारिश किये जाने के बाद इस चर्चा को बल मिल रहा है कि शायद इस बार जांच का दायरा बढ़ेगा और पुलिस के कनीय पदाधिकारियो और जवानो की आत्महत्या की प्रमुख कारणो का भी पता चल जायेगा। पुलिस विभाग से जुड़े कई अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर जो वजहे बता रहे है वह बेहद गंभीर ही नहीं बल्कि चैकाने वाला भी है। विभाग से जुड़े अधिकारियो के मुताबिक आत्महत्या के प्रमुख कारणो में पोस्टिंग के लिए पैरवी और पैसा, दर्ज मामलो के अनुसंधान के दौरान राजनीतिक दबाव, परेशान करने की नियत से डिपार्टमेंटल कार्रवाई, सिस्टम में व्याप्त भ्रष्टाचार, पुलिस महकमा से जुड़े कुछ पदाधिकारियो में नैतिक मुल्यो का ह्रास, पुलिसिया तंत्र में पारदर्शी एवं आतंरिक लोकतंत्र की कमी और संवेदनहींनता का होना है। हालांकि कुछ पुलिस पदाधिकारी आत्महत्या के पीछे पारिवारिक एवं व्यक्तिगत कारणो को भी मानते है। जिले में पदस्थापित एक पुलिस पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि 80 के दशक में थानों में पोस्टिंग के लिए कनीय पुलिस पदाधिकारियो के बीच होड़ नहीं मचती थी लेकिन हाल के वर्षो में अपने ही संवर्ग के अधिकारी दुसरे अधिकारी की जगह पकड़ने के लिए पैरवी पैसा का बेजा इस्तेमाल कर रहे है जिसके चलते एक दुसरे के बीच न केवल हीन भावना पनप रही बल्कि तनाव भी बढ़ रहा है। इस पुलिस पदाधिकारी ने बताया कि कुछ ऐसी आत्महत्या की घटना घटी है जिसमें तनाव और व्यक्तिगत कारण भी सामने आये है। जवानो एवं कनीय पुलिस अधिकारियो द्वारा की गयी अबतक की आत्महत्याओ की घटनाओ के बाद शायद ही झारखंड का कोई ऐसा जिला होगा जहां ऐसी घटनाओ की पुनरावृति न हो इसके लिए काउंसिलिंग किये गये हो। अधिकांश मामलो में पारिवारिक विवाद, तनाव और प्रेम प्रसंग का हवाला देकर पुलिस के आला अधिकारियो ने मामले की इतिश्री ही की है। कई पुलिस पदाधिकारियो तो यह भी कहना है कि यदि अपने विभाग के बड़े बड़े अधिकारी मानवीय संवेदनशीलता, नैतिकता एवं विभाग में पारदर्शिता की नीति को अमली जामा पहनायेंगे तो आत्महत्या की घटनाए नहीं के बराबर घटेगी। कुछ पुलिस अधिकारियो का यह भी कहना है कि नौकरी में आने के बाद जो मंत्र चाहे जवान हो या अधिकारी उसे अपने मन में पुरी तरह बैठाकर इसका ही सही तरीके से अनुपालन करे तो जवानो और कनीय हो या वरीय पुलिस पदाधिकारी के बीच पारिवारिक माहौल विकसित होगा, काम भी निष्पक्ष और स्वतंत्र होगा एवं महकमा से जुड़े लोग तनाव मुक्त होकर न केवल अपने कर्तव्यों का पालन कर पायेंगे बल्कि लोगो को सुरक्षित रखने के साथ साथ अपने जीवन को भी सुरक्षित रखने के साथ साथ खुशहाल जिंदगी जी सकेंगे।

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