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गुरु गोविंद सिंह को समर्पित की थी पण्डित टोडरमल जैन ने विश्व की सबसे महंगी जमीन

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-डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर
विश्व की सबसे महंगी जमीन सरहिंद फतेहगढ़ साहिब पंजाब में है। इस स्थान पर गुरु गोबिन्द सिंह जी के दोनों छोटे साहिबजादों और माता गुजरी जी का अंतिम संस्कार हुया था। दीवान टोडरमल जैन वैश्य व्यापारी ने सिर्फ 4 वर्ग मीटर स्थान 78000 हजार सोने के सिक्के जमीन पर खडे कर, गुरु गोबिन्द सिंह जी के छोटे सुपुत्रों जोरावर सिंह 6 वर्ष और फतेह सिंह 9 वर्ष तथा उनकी माता गुजर कौर के अंतिम संस्कार के लिए ये जगह मुगल सल्तनत से खरीदी थी।

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1705 में मुगलों ने श्री गुरु गोबिंद सिंह के छोटे साहिबजादे 9 साल के बाबा जोरावर सिंह और 7 साल के बाबा फतेह सिंह के साथ माता गुजरी को गांव सहेड़ी के पास पकड़ कर उन्हें फतेहगढ़ साहिब ले जाया गया और वहां इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया, लेकिन साहिबजादों ने मना कर दिया। इस पर माता गुजरी और दोनों साहिबजादों को मुगलों ने यातना देने के लिए तीन दिन और दो रातें ठंडे बुर्ज में रखा था।
सरहिंद में गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों पुत्रों को दीवार में चिनवाने के बाद उनके व दादी मां के पार्थिव शरीरों को अंतिम संस्कार के लिए नवाब जगह नहीं दे रहा था, उसने शर्त रखी कि अंतिम संस्कार के लिए जितनी जगह चाहिए उतनी जगह पर स्वर्ण मुहरें बिछा दो, तब जगह और पार्थिव शरीर दूँगा। टोडरमल जैन ने राष्ट्र और धर्म के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकारते हुए जमीन पर स्वर्ण मुद्राएँ बिछा दीं, यह देख कर नवाब का लालच बढ़ गया और फिर उसने कहा कि स्वर्ण मुद्राएँ खड़ी करके बिछाओ, टोडरमल जी ने शर्त मान ली और खड़ी स्वर्ण मोहरें बिछा दीं और अंतिम संस्कार हेतु जगह ली। उन्होंने नवाब से सोने की मोहरों के बदले भूमि लेकर उन तीनों महान विभूतियों का स्वयं अंतिम संस्कार किया। सामाना में जन्मे व माता चक्रेश्वरी देवी के उपासक टोडरमल जैन जमीनी मामलों के जानकार होने के कारण सरहिंद के नवाब वजीर खां के दरबार में दीवान के पद पर असीन थे। उसी स्थान पर फतेहगढ़ साहिब में गुरुद्वारा श्री ज्योति स्वरूप बना हुआ है, जिसके बेसमैंट का नाम स्मृति स्वरूप दीवान टोडरमल जैन हॉल रखा गया है।

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पंकज चौहान ने इसका जिक्र करते हुए कहा है कि इस महान सत्य घटनाक्रम से यह पता चलता है कि भारतीय संस्कृति में रचे बसे समाज हिन्दू धर्म और अन्य धर्म के प्रति कितनी उदार दृष्टि रखते आये हैं, भारतीय संस्कृति और इतिहास में इस प्रकार की धार्मिक सहिष्णुता की हजारों सत्य घटनाक्रम हैं। आज आवश्यकता है उनके इन सार्वजनिक सार्वभौमिक कार्यों को उजागर करने की, क्योंकि उदारता की परिभाषा अपने दान को उजागर करने की कभी नहीं रही है, शायद इसलिए इस प्रकार के उदाहरण दुनिया के सामने नहीं आ पाते। आज साम्प्रदायिक द्वेष के काँटों भरे पेड़ों को ज्यादा सींचने के दुर्भाग्यपूर्ण माहौल के बीच इस प्रकार के उदाहरणों को प्रेरणा एवं सामाजिक सौहार्द के लिए सामने रखना ज्यादा आवश्यक हो गया है।
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