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सनसनी नहीं, सटीक खबर

मोदी-योगी छोड़ देश की सोचे भाजपा

राजनीति में कोई किसी का नहीं होता, इस यथार्थ को अब सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं। भारत ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में राजनीति सिद्धांतहीनता का शिकार हो चुकी है। फि लहाल बात भारतीय राजनीति के ताजा हालात की, जिसमें प्रमुख रूप से चर्चा देश के सत्ताधारी दल भाजपा में चल रहे अंदरूनी मतभेद और अंतर्कलह की है। खबरें आ रही है कि भाजपा में भूतपूर्व अटल-आडवाणी गुट की तरह अब मोदी-योगी गुट का प्रारंभ हो चुका है। हालांकि पहले की तरह ना मोदी गुट अटल गुट के जितना नरम है और ना ही योगी गुट आडवाणी जितना गरम। दोनों ही पहले के गुट से कहीं ज्यादा गरम और ज्यादा तेवर वाले हैं, जो एक शुभ संकेत है, क्योंकि वर्तमान समय में अधिकांश देशवासियों के विचार तथा लक्ष्य के आधार पर बने हालात अब किसी भी स्थिति में दशकों से चली आ रही तुष्टिकरण की राजनीति और देश तथा देश की बहुसंख्यक जनता के विरुद्ध षड्यंत्र करने वालों को स्वीकार करने की अनुमति नहीं देते। बावजूद इसके भाजपा में आपसी मतभेद और विवाद है, तो इसके कारण और निराकरण पर समय रहते सोचने समझने और कुछ करने की जरूरत है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि यह जरूरत जितनी भाजपा की है, उससे कहीं ज्यादा देश की है और यह बात कम से कम भाजपा के उन प्रमुख नेताओं, कार्यकर्ताओें को तो तुरंत समझ लेना चाहिए, जिनके विचार और राजनीति का मुख्य आधार राष्टÑहित सर्वोपरि और सबसे पहले देश है। देश की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था और प्रभावशाली नेताओं पर एक गैर राजनीतिक बुद्धिजीवी व्यक्ति या फिर आम जागरूक आदमी की दृष्टि से देखें समझे तो यह बिल्कुल स्पष्ट है कि जनता की दृष्टि में आज की तारीख में यदि कोई सर्वाधिक लोकप्रिय जननेता है तो वह मोदी और योगी ही हैं। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इन दोनों में भी यदि किसी को पहले और दूसरे स्थान पर रखने की बात हुई या फिर 2024 लोकसभा चुनाव के बाद इन दोनों में से किसी एक को प्रधानमंत्री बनाने की बात हुई तो बहुमत योगी के पक्ष में ही होगा। यह बात लगभग पूरी भाजपा भी जानती है। इसलिए ये गुटबाजी शुरू हुई है, जो गलत है। वास्तव में योगी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में जो एक कठोर शासक की अपनी छवि बनाई है, वह नि:संदेह सुशासन और आतंक तथा गुंडाराज से मुक्त शासन चाहने वाली आम जनता के अनुरूप है। योगी का देशहित और किसी भी स्थिति में अपराधी को नहीं बख्शने वाला व्यक्तित्व अब उत्तर प्रदेश के साथ लगभग पूरे देश की पहली पसंद बन चुका है। मोदी महान और वैश्विक नेता बनने के चक्कर में इस दौड़ में योगी से पीछे रह गए हैं। ऐसे में योगी के इस बढ़ते कद से मोदी के करीब रहते कुछ महत्वाकांक्षी नेताओं का अंदरूनी तौर पर योगी का विरोधी होना स्वाभाविक है। वे जानते हैं कि यह काम मोदी की योगी से दूरी बढ़ाकर ही की जा सकती है। दूरी बढ़ाने का सबसे सरल तरीका या फिर एकमात्र तरीका यही है कि वे मोदी को बताएं कि जनता में कम होती उनकी लोकप्रियता का मुख्य कारण उसमें योगी के प्रति बढ़ती लोकप्रियता है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो उनकी महानता, ख्याति और उपलब्धियों के महत्व के कम होने में बहुत ज्यादा समय नहीं लगेगा। अत: अब मोदी को यह चाहिए कि वह योगी की वास्तविक समीक्षा सिर्फ और सिर्फ देशहित को लेकर करें। स्वहित या अपने कुछ खास लोगों के हित की दृष्टि से नहीं। यदि वे अभी यह गलती करते हैं तो शायद यह उनके जीवन की सबसे बड़ी गलती होगी। गौरतलब है कि योगी जिस नीति और नीयत के साथ फिलहाल उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और मुख्य भारतीय राज्य का नेतृत्व कर रहे हैं, वह देश के वर्तमान और भविष्य के लिए बेहद सुखद और प्रशंसनीय है। योगी ना सिर्फ राज्य के विकास कार्य को लेकर एक ईमानदार और कुशल शासक सिद्ध हुए हैं बल्कि इससे कहीं ज्यादा उन्होंने अपराध और गुंडाराज के खिलाफ मुखर होकर काम करने और उसका बहुत हद तक खात्मा करने से भी अपनी विशेष छवि बनाई है। सच्चे मायने में देखें तो यह भाजपा और संघ दोनों के लक्ष्य, नीति और नीयत के अनुकूल है, पर कुछ स्वार्थी और अहंकारी नेता इसे अपने प्रतिकूल समझ रहे हैं, जिनकी हकीकत बिना देर किए भाजपा सहित मोदी को भी समझने की जरूरत है। समझें, यही इसके लिए बेहतर होगा। अब मोदी-योगी मतभेद की समीक्षा एक अलग दृष्टि से। इस मतभेद के समाचार का आधार यह बताया जा रहा है कि बंगाल हार के बाद फिलहाल भाजपा और संघ ने अंदरुनी तौर पर यह निश्चय कर लिया है कि भाजपा आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव मोदी की बजाय योगी को मुख्य चेहरा बनाकर लड़ेगी। भाजपा के इस निश्चय के कई कारण संभव हैं। पहला यह कि वह ऐसा कर 2024 लोकसभा चुनाव के पूर्व योगी की वास्तविक क्षमता और लोकप्रियता को परखना चाहती है। दूसरा यह कि उसे लगता है कि उत्तर प्रदेश चुनाव में भी बंगाल की तरह हिंदू-मुस्लिम मतों का घोर ध्रुवीकरण होगा और उस दौरान उसे मोदी के राष्टÑीय चेहरे की निष्पक्षता को बचाए रखने की जरूरत होगी। तीसरा यह कि ऐसा कर भाजपा का एक गुट सचमुच योगी का कद छोटा करना चाहता है। कारण और भी हो सकते हैं, पर ऐसा कुछ भी करना होगा गलत ही। भाजपा की वास्तविक जरूरत अब अपने आपको राष्टÑवाद के अपने मूल सिद्धांतों, लक्ष्यों और कार्यों के प्रति ज्यादा ईमानदार और जवाबदेह बनाने और उनके प्रति खुद को सही सिद्ध करने की है। जो समय भाजपा व्यर्थ की अंदरूनी कलह, गुटबाजी और कूटनीति पर नष्ट कर रही है, उसे उसका सदुपयोग देशहित के बड़े काम करने पर करना चाहिए। भाजपा को किसी राज्य के पंचायती या विधानसभा चुनाव और राष्टÑीय चुनाव के प्रति मतदाता की दृष्टि और उसके मत के भेद की समझ के अंतर का आंतरिक विश्लेषण करना चाहिए । रही बात योगी के प्रति मोदी या फिर मोदी गुट के काम करने की, तो स्पष्ट है कि कोरोना संक्रमण काल की दूसरी वर्तमान लहर में भी जब मोदी देश के राज्यों को लॉकडाउन से हर संभव बचने की हिदायत दे रहे थे, योगी ने आंशिक लॉकडाउन लगाना प्रारंभ कर दिया था । इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर में हुई राष्टÑीय त्रासदी का सबसे बड़ा गुनाहगार राष्टÑीय नेतृत्व ही रहा है। यह आभास पुख्ता तौर पर उसे भी है। हाल में दिया गया उनका असमय राष्टÑीय संबोधन, उसमें उनकी लड़खड़ाती आवाज और बिगड़ा बॉडी लैंग्वेज इसका ही प्रमाण था। बहरहाल तेजी से की गई भूल सुधार और वैश्विक महामारी का यह काल केंद्रीय सत्ता पर कोई दूरगामी असर नहीं डालेगा। हां, भविष्य में ऐसी गलती से बचने की जरूरत जरूर होगी। दूसरी लहर के इस पूरे दौर में भी योगी मोदी से बेहतर सिद्ध हुए हैं। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मोदी-योगी मतभेद की खबर में चाहे जितना सच या झूठ हो, भाजपा को समय रहते इसे सुधारने की जरूरत है। बात यदि आगामी उत्तर प्रदेश या फिर राष्टÑीय चुनाव की करें, तो उसके लिए भाजपा को अपने मूल एजेंडे पर काम करते रहने की जरूरत है। इसके लिए सिर्फ राजनीतिक भ्रष्टाचार पर यदि वह फिलहाल कोई बड़ा काम कर पाए तो बेहतर होगा। अंत में एक बार फिर अंतिम बात उत्तर प्रदेश चुनाव में प्रमुख चेहरे की करें तो योगी को वहां किसी और बड़े चेहरे की जरूरत भी नहीं है। योगी ने अपने काम से वह मुकाम हासिल कर लिया है। नि:संदेह योगी आज देश की भी पहली पसंद बन चुके हैं।

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