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महाराष्ट्र:वोटों के गणित और कानूनी बाध्यता के बीच फंसा मराठा आरक्षण

महाराष्ट्र में फिलहाल बुझती नहीं दिख रही मराठा आरक्षण की आग

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महाराष्ट्र में चल रहा मराठा आरक्षण आंदोलन सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आई है. कई इलाके आंदोलन से बुरी तरह प्रभावित हैं. मंगलवार को  कई जगहों पर आंदोलन के दौरान हिंसक घटनाएं भी सामने आई . हालांकि राज्य सरकार लगातार आंदोलन को शांत करने की कोशिश कर रही है. परन्तु अबतक कोई फाइनल फॉर्मूला सामने नहीं आया है.  सरकार ने इस मसले पर आज सर्वदलीय बैठक बुलाई है. हालात को नियंत्रण में लाने के लिए सरकार की ओर से कई अहम फैसले लिए गए हैं. मराठा आरक्षण से जुड़ी जस्टिस संदीप शिंदे समिति की पहली रिपोर्ट को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 13,498 ऐसे दस्तावेज मिले हैं जिनसे पता चलता है कि निजाम के दौर में मराठा कुनबी समुदाय में शामिल थे. इसी के आधार पर सरकार अब मराठा समाज को कुनबी सर्टिफिकेट देगी. सरकार ने करीब 7 लाख मराठाओं को इसके लिए योग्य पाया है.कुनबी समुदाय पिछड़ी जाति के तहत आती है.  राज्य की एकनाथ शिंदे सरकार को उम्मीद है कि इस फैसले के बाद आंदोलन शांत हो जाएगा. मंगलवार को एकनाथ शिंदे के फोन करने के बाद अनशन पर बैठे मनोज जरांगे पाटिल ने भी पानी पी ली. इसे आंदोलनकारियों के रुख  में नरमी का संकेत माना जा रहा है. ताजा आंदोलन मनोज जरांगे पाटिल के अनशन शुरू करने के बाद ही शुरू हुआ था.

महाराष्ट्र के कई इलाकों में हिंसक घटनाएं, राजनीतिक लाभ न उठाने की अपील

 

कई जगहों पर आंदोलन के दौरान हिंसक घटनाएं भी हुई हैं. कई नेताओं के घरों और उनके दफ्तरों में तोड़फोड़ की खबर सामने आई है. कुछ जगहों पर आगजनी की भी घटनाएं हुई. सरकार हालात को संभालने की कोशिश कर रही है. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (अजित पवार गुट) के अध्यक्ष सुनील तटकरे ने सभी राजनीतिक दलों से भी सरकार को सहयोग करने की अपील की है. उन्होने राज्य में मौजूदा अशांति का राजनीतिक लाभ नहीं उठाने का आग्रह किया है.राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी अजित गुट नेता
सुनील तटकरे ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि यह राजनीति करने का सही समय नहीं है. उन्होंने बताया कि मराठा समुदाय को आरक्षण मिले इसके लिए राज्य सरकार युद्धस्तर पर विशेष प्रयास कर रही है.
तटकरे ने जोर देकर कहा कि राज्य सरकार मराठों को ऐसा आरक्षण देने के लिए लगातार प्रयास कर रही है जो कानून की कसौटी पर खरा उतर सके. उन्होने मराठा समुदाय के सदस्यों से शांतिपूर्वक विरोध करने और हिंसक तरीकों का सहारा न लेने का अनुरोध भी किया है.

 

महाराष्ट्र विधानसभा ने पास कर दिया था बिल, सुप्रीम कोर्ट में मामला फंसा

 

मराठों को आरक्षण देने से संबंधित बिल विधानसभा में 2018 में ही पास हो चुका है. इसके तहत राज्य की सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थाओं में 16 फीसदी आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था. बॉम्बे हाई कोर्ट ने भी कुछ बदलाव के साथ लागू करने की इजाजत दे दी. परन्तु मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो देश की सबसे उपरी अदालत ने इसे असंवैधानिक ठहराया. इसकी वजह ये थी कि राज्य में आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से ज्यादा हो रही थी जो अधिकतम निर्धारित की गई है.

 

महाराष्ट्र सरकार के सामने बड़ी चुनौती

 

दरअसल सरकार के सामने एक और चुनौती है. कुछ लोग मराठा समुदाय को भी ओबीसी में शामिल करने का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है मराठों के इसमे शामिल किए जाने से ओबीसी कैटेगरी में आने वाले दूसरे समुदायों को मिलने वाला लाभ बंट जाएगा. महाराष्ट्र में मराठा समुदाय आर्थिक रूप से काफी कमजोर माना जाता है. परन्तु राज्य में उनका प्रभाव काफी है. इसकी वजह से ये लोग काफी समय से आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं. खास बात ये है कि कोई भी राजनीतिक दल मराठों की मांग का विरोध नहीं कर रहा है. कोई भी पार्टी मराठा आरक्षण का विरोध कर अपने वोटों के गणित को बिगाड़ना नहीं चाहती है. बहरहाल 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महाराष्ट्र की सत्ताधारी गठबंधन सरकार के सामने दोहरी चुनौती है. मराठा समाज को कैसे मनाया जाए और दूसरे पिछड़े समुदाय को नाराज होने से कैसे रोका जाए.

वार्ता के इनपुट के साथ

 

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