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लैस और कुरकुरे से ज्यादा स्वादिष्ट है आदिवासियों मे प्रचलित उफिया

सूखे चावल के साथ भुंज के खाया जाता है उफिया

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राज आनंद सिन्हा

सिमडेगा : झारखण्ड के आदिवासियों की संस्कृति मनमोहक रही है। पर्व त्यौहार मे सरहुल, नाच मे झूमर, गीत मे करम गीत, चित्रकला मे सोहराई से लेकर गांव के गवाठ की पूजा तक अपने मे खास है। हर चीजों का अपना कुछ विशेष महत्व दर्शाया गया है और हर एक चीज एक विशेष आनन्द देता है। पूजा पाठ से ले कर पर्व त्यौहार तक सब साथ मिल कर मनाते हैं,खुशियाँ मनाते हैं और खुशियाँ बाँटते हैं।

 

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झारखण्ड के आदिवासियों मे बहुत सी चीजे प्रचलित है जो अपने मे विशेष दर्जा रखती हैं जैसे हड़िया, तपावन, गुडा, तीतयर, झूमर, गोतिया, अलग अलग तरह के विवाह,गीत आदि।

 

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आज मैं आपका ध्यान ऐसे ही एक विशेष चीज की ओर ले जाना चाहता हूँ जो कल्पना से भी विचित्र है परन्तु झारखण्ड मे प्रचलित है। तपती गर्मी के बाद जब बारिश की बुँदे झारखण्ड की जमीं पर बरसती हैं तो झारखण्ड की माटी से सोंधी सोंधी खुशबू अति मनमोहक और लुभावना होता है।उसी माटी से एक विचित्र प्रकार का कीट निकलता है जो झारखण्ड मे उफिया के नाम से प्रचलित है। कुरकुरे,लैस,मूंगदाल,चौमिन और मोमोस से भी ज्यादा स्वादिष्ट है यह उफिया झारखण्ड के आदिवासियों के लिए।सुहावने मौसम मे एक साथ यह उफिया उड़ता हुआ नज़र आता है। रसोई के बर्तन मे पानी रख कर खुले मैदान मे रख दिया ज्यादा है जहाँ उफिया उड़ रहा हो। उफिया उस पानी मे आ कार बैठता है और वही रह जाता है। फिर उसे अच्छे से धो कर सूखे चावल के साथ भुंज दिया जाता है और फुर्सत के वक़्त पूरा परिवार साथ बैठ के इसका आनन्द लेते हैं।आदिवासियों मे यह प्रचलित है की उफिया खाने से पेट की बिमारियों से निजात मिलता है यही कारण है की बस बारिश शुरू होने का इन्तजार रहता है और बारिश आते ही उफिया घर घर का स्नेक्स बन जाता है।

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