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जालौन: यंत्र रूप में विराजमान है सिद्धपीठ पर अक्षरा देवी

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उरई : उत्तर प्रदेश के जनपद जालौन में अक्षरा देवी के अलौकिक शक्ति पीठ में मां अपने यंत्र स्वरूप में विराजमान हैं और नवरात्रि के समय किसी समस्या के समाधान की अर्जी लगाने वाले और समस्या के समाधान के बाद मां के दर्शनों के लिए देश भर के दूर दराज इलाकों से यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं।
शक्तिपीठ के मंदिर परिसर में बना प्राकृतिक जल अक्षय कुण्ड जो कभी सूखता नहीं और लोगों का मानना है कि इस कुंड में स्रान करने वालों की त्वचा संबंधी बीमारियां जड़ से समाप्त हो जाती है। मंदिर में देवी के समक्ष केवल हवन चंदन, धूप, आदि लकड़ी की औषधियों को गाय के घी और शक्कर में मिलाकर हवन होता है। आमतौर पर देवी मंदिरों में मां आदिशक्ति प्रतिमा या पिण्डी रूप में विराजती हैं परन्तु श्री अक्षरा देवी मंदिर के गर्भगृह में मां किसी प्रतिमा की बजाय प्रस्तर खण्ड पर प्रणवाक्षर की साढ़े तीन मात्राओं के एक यंत्र के रूप में विराजमान हैं। त्रिकोण के तीन कोनों पर अक्षरा देवी, रक्त दंतिका देवी एवं छिन्नमस्ता देवी का स्थान है। मान्यता है कि अक्षरा माता ही संसार का सृजन करतीं हैं इसलिए संसार की समस्त वस्तुएं मां के पुत्रों एवं पुत्रियों के लिए ही रहें।
अक्षरादेवी सिद्ध पीठ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें न बलि चढ़ती है। यदि किसी को देवी के सम्मुख हवन करना ही हो तो चन्दन, धूप, आदि लकड़ी की औषधियों को गाय के घृत एवं शक्कर में मिला कर सकते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर तामसी पदार्थ एवं राजसी संकल्प को लेकर देवी की आराधना नहीं की जा सकती। मां अक्षरा प्रत्येक रजोगुणी, तमोगुणी व्यक्ति की भावनाओं को शुद्ध कर देतीं हैं। मां कभी अपनी संतान से बलिदान नहीं चाहतीं इसलिए उस स्थान पर नारियल, मद्य, तिल, जवा का हवन निषिद्ध है। मंदिर के अंदर तेल का दीपक नहीं जलता और न ही नारियल की बलि दी जाती है। मां के सामने तिल और जवा का हवन नहीं किया जाता है। मंदिर के पीछे दूर पहाड़ पर नारियल को बलि के रूप में तोड़कर प्रसाद ले सकते हैं। इसके साथ ही तिल और जवा का हवन भी पीछे बनी वेदी पर किया जा सकता है।
जालौन जिले में वैसे तो कई सिद्ध स्थल हैं परन्तु शक्ति सिद्ध पीठ के रूप ग्राम सैदनगर में अक्षरा पीठ का महत्व सर्वश्रेष्ठ है। इस स्थान की प्राचीनता का सही सही अनुमान लगाना तो संभव नहीं है किन्तु उपलब्ध शिलापट्ट के अनुसार इसके एक हजार वर्ष से भी अधिक पुराना होने का पता चलता है। अंग्रेजों के समय लिखे गए कई शोधग्रंथों के अनुसार यहां ईसा पूर्व चेदिवंश का शासन रहा। पुराने इतिहास की वजह से यहां जगह-जगह आध्यात्मिक पौराणिक व ऐतिहासिक धरोहरें बिखरी पड़ी हैं, लेकिन कालचक्र की उथल-पुथल में इनका इतिहास विलुप्त हो चुका है। अक्षरादेवी सिद्ध पीठ भी ऐसी ही धरोहरों में एक है।
यह स्थान सौम्यता के साथ-साथ मोक्ष की साधना अथवा भक्ति की साधना हेतु सर्वोपरि है। निर्दोष होने पर भी मुकदमों में मिथ्या फंसे लोगों को लाभ पहुंचते देखा गया है। परन्तु सत्यता नहीं होने पर कोई मनन ंिचतन करे तो भी लेश मात्र भी सफलता नहीं मिलती। नवरात्र पर यहां विशेष आराधना के लिए श्रद्धालु पूरे नौ दिन प्रवास करते हैं। चैत्र नवरात्र के बाद पड़ने वाली एकादशी के दिन यहां विशेष मेला लगता है, जिसमें कई जनपदों के श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कुछ वर्ष पहले तक वेत्रवती प्रतिवर्ष बरसात में बाढ़ के रूप में आकर अपने जल से मां के चरण पखारने राजमंदिर में प्रवेश करतीं रहीं हैं। किन्तु हाल ही में मौसम की अनियमितता के कारण अब यह क्रम टूट सा गया है। आज यह मंदिर कानपुर-झांसी रेलमार्ग पर एट जंक्शन से करीब 10 किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में कोटरा रोड पर ग्राम कुरकुरू से एक लिंक मार्ग से जुड़ा है। मंदिर तक पक्की सड़क बनी हुई है। यहां किसी भी वाहन से आसानी से पहुंचा जा सकता है। यह जिले का सर्वोत्तम आध्यात्मिक-प्राकृतिक पर्यटन स्थान है।

 

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