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यह संसार की सबसे बड़ी पार्टी के लिए गंभीर लोकतांत्रिक चेतावनी है..!

राजेश बादल
मुकुल रॉय की भारतीय जनता पार्टी से घर वापसी के अनेक सन्देश हैं। यह सिर्फ तृणमूल कांग्रेस नामके एक प्रादेशिक दल का अंदरूनी घटनाक्रम ही नहीं है बल्कि संसार की सबसे बड़ी पार्टी के लिए गंभीर लोकतांत्रिक चेतावनी है, जो राजनीतिक तीर अपने विरोधियों पर चलाने का प्रयोग केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी करती रही है, वे अब उलट कर उसी पर लगने लगे हैं। दरअसल, इसका अर्थ यह भी है कि उसका अपना घर भी सुरक्षित नहीं है और परिवार में शामिल नए सदस्यों की परवरिश करने का हुनर अब दरकने लगा है। परिवार का आशय पार्टी और गठबंधन दोनों से है। शिवसेना और अकाली दल जैसे बेहद पुराने और भरोसेमंद वैचारिक साथियों का साथ छोड़ना भी इसी श्रेणी में आता है।
विपक्ष को प्राणवायु मिल गई : पिछले दिनों भारतीय सियासत में प्रतिपक्ष का लगातार दुर्बल होना लोकतान्त्रिक सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जा रहा था। बंगाल में विधानसभा चुनाव के बहाने जैसे विपक्ष को प्राणवायु मिल गई। तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने जिस ढंग से भारतीय जनता पार्टी और इसके शिखर पुरुषों का आक्रामक मुक ाबला किया उससे एकबारगी यह धारणा निर्मूल साबित हो गई कि विरोधी दलों से तोड़ कर राजनीतिक कार्यकर्ताओं को लाने और बेहिसाब धन के इस्तेमाल से सत्ता हासिल की जा सकती है। मुकुल रॉय की स्थिति तृणमूल कांग्रेस में नंबर दो की थी। बंगाल का चप्पा-चप्पा उन्होंने छाना है और गली कूचे का कार्यकर्ता तक उन्हें पहचानता है। लेकिन प्रत्याशियों के चयन में उनकी एक नहीं चली। तृणमूल कांग्रेस में रहते हुए वे राष्टÑीय स्तर के नेता थे, मगर बीजेपी ने उन्हें वापस वहीं भेज दिया,जहां से उनका सफ र शुरू हुआ था। उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में भी प्रचारित नहीं किया गया। वे अपने बेटे के साथ विधायक बन कर रह गए। इधर, इसके बाद उनके अनुभव का ख़्याल रखते हुए विपक्ष का नेता भी नहीं बनाया गया। उनसे कनिष्ठ शुभेंदु अधिकारी को इस पद पर आसीन कर दिया गया। पुरानी परंपरा के वाहक मुकुल रॉय से पार्टी अपेक्षा करती थी कि वे ममता की निंदा करते हुए प्रचार करें,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनके बेटे और ममता के भतीजे की मित्रता भी शायद बीजेपी को रास नहीं आई।
केंद्र की ओर हैं निगाहें : बहरहाल, सूत्रों के मुताबिक पराजित बीजेपी को घेरने के लिए ममता बनर्जी अब अपनी पार्टी का विस्तार बंगाल से बाहर बिहार, झारखंड, ओडिशा और उत्तर पूर्व के राज्यों में करेंगीं। मुकुल रॉय को उप मुख्यमंत्री भी बनाया जा सकता है और उन्हें संगठन विस्तार के काम में लगाया जा सकता है। इसके अलावा ममता बनर्जी समान वैचारिक दलों को एक मंच पर लाने का काम कर रही हैं। इनमें राष्टÑवादी कांग्रेस पार्टी, राष्टÑीय जनता दल, ओडिशा में नवीन पटनायक की पार्टी, आम आदमी पार्टी, अकाली दल, समाजवादी पार्टी, तेलंगाना राष्टÑ समिति, तेलुगु देशम और बीजू जनता दल से संवाद करने का जिम्मा मुकुल रॉय को सौंपा जा सकता है। कांग्रेस के साथ ममता की हिचक बरक रार है। उसका कारण वामदल हैं। दरअसल, जब तक कांग्रेस वाम दलों का साथ नहीं छोड़ती, तब तक ममता या उनके नेतृत्व में किसी गठबंधन का कांग्रेस के साथ आना संभव नहीं दिखाई देता। इसके बावजूद प्रतिपक्ष को मजबूत करने वाले हर घटनाक्रम का खैरमक दम किया जाना चाहिए। देश की लोकतान्त्रिक देह को स्वस्थ्य रखेगा।

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