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सनसनी नहीं, सटीक खबर

बीमार होने पर खटिया पर ले जाते हैं मरीज को, चुआं काटकर लाते हैं पानी, न सड़क और न चापाकल

संदीप कुमार
डोमचांच (कोडरमा)। प्रखंड मुख्यालय से महज दस किलोमीटर दूरी पर बसा आदिवासी बाहुल्य गांव सखुआटांड़ व पीपराटांड़ आज भी अपनी बदकिस्मती पर आंसू बहा रहा है। लगभग 200 आदिवासी परिवार आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते नजर आ रहे हैं। शासन-प्रशासन गांव में आकर इनकी दु:ख और पीड़ा को तो जरूर देखा मगर मरहम के नाम पर प्रशासन महज ढकोसला साबित हुई और समस्याएं जस के तस बनी हुई है। लोग आज भी जैसे-तैसे जीवन काटने को मजबूर हैं।
जहां एक ओर गांव के लोगों को शुद्ध पेयजल नसीब नहीं तो दूसरी ओर सड़क अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। पीपराटांड़ में दो चापानल है, लेकिन एक चापानल पिछले कई महीनों से खराब पड़ा है और एक का जलस्तर नीचे चला गया है। पानी की गंभीर समस्या को देखते हुए लोगों ने खुद मेहनत कर एक चुआं का निर्माण किया और इसी से बर्तन धोने व स्नान करने के लिये पानी को उपयोग में लाया जाता है। स्थानीय महिला मुंद्रिका देवी, छोटू सोरेन, सानिया टुड्डू आदि ने बताया कि वर्ष 2006 से यहां रह रहे हैं। अगर हम लोगों के यहां कोई बीमार पड़ जाता है, तो सड़क नहीं होने के कारण मजबूरन 3 किलोमीटर तक मरीज को खटिया पर ले जाने को मजबूर होते हैं। वहीं उन्होंने कहा कि इस कोरोना महामारी में हमलोगों को कोई सहयोग नहीं मिला। हमलोगों के समक्ष आर्थिक संकट आ गया है।
गर्भवती महिला को खाट पर लेटा कर अस्पताल ले जाया गया।
मसनोडीह पंचायत क्षेत्र अंतर्गत सखुवाटांड़ गांव की एक गर्भवती महिला सरिता देवी पति विशुन मुर्मू की तबियत शुक्रवार की रात्रि लगभग 9 बजे खराब हो जाने पर अस्पताल ले जाने के लिए उसे ग्रामीणों के द्वारा खाट पर लिटाकर 2 किमी जंगल-झाड़ होते हुए बेलभरणी चौक लाया गया। वहां से गाड़ी से डोमचांच के निजी क्लीनिक लाया गया। ऐसी स्थिति बताती है कि 21वीं सदी के भारत का ​एक​ हिस्सा अभी भी एक सदी पीछे है। वहीं गांवों के लोगों को आने जाने की सड़क न होने के कारण ग्रामीणों में काफी रोष है। सखुवाटांड़ निवासी अनिल टुड्डू ने बताया कि सड़क, पानी, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे तरह-तरह की जन-समस्याएं हैं। जिसका सुध लेने वाला कोई प्रशासन और कोई जन-प्रतिनिधि नही है। उन्होंने बताया कि चार पहिया जाने के लिए कोई सड़क नहीं है। पैदल आने-जाने वाले रोड में भी वन विभाग के द्वारा ट्रेंच काट दिया गया जिससे हमलोगों की समस्याएं और बढ़ गई है।
समस्या को लेकर ग्रामीणों ने कई बार आवेदन उपायुक्त कोडरमा और कई जन-प्रतिनिधि को भी दे चुके हैं। लेकिन सिर्फ आश्वासन ही मिला। इन समस्याओं पर आज तक रत्ती भर भी पहल नही हुई। सड़क नही होने के कारण कई बार तो कुछ मरीज गंभीर अवस्था में खाट पर लाते समय रोड में ही दम तोड़ देते हैं।
पिछले साल पहुंची थी प्रशासनिक टीम, आश्वासन आज तक नहीं हुआ पूरा।
प्रखंड के आदिवासी बाहुल्य इन गांवों की समस्या को सन्मार्ग समाचार पत्र ने प्रमुखता से छापा था, जिसको लेकर फरवरी 2020 में डीसी रमेश घोलप के निर्देश पर 18 फरवरी को प्रशासनिक टीम गांव पहुंची थी। अधिकारियों ने जल्द ही शिविर लगाकार समस्याओं के समाधान को लेकर कदम उठाने का आश्वासन दिया था। दुर्भाग्य है कि यह आश्वासन आज तक पूरा नहीं हो पाया और न ही गांवों की तस्वीर बदल पायी।

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