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झूठे आश्वासनों से दम तोड़ती उम्मीदें

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लक्ष्मीकांता चावला
कैप्टन अमरिंदर के नेतृत्व में वर्ष 2002 से लेकर 2007 तक पंजाब में कांग्रेस की सरकार बनी। ठेके पर कर्मचारियों को रखने की बीमारी उसी काल में शुरू हुई। उस समय अकाली-भाजपा के मंच से हम यही कहते थे कि कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सब कुछ ठेके पर दे दिया। अब पुलिस बची है उसे भी ठेके पर दे दीजिए। मगर अकाली-भाजपा सरकार आने के बाद भी हम ठेके की नौकरी की प्रथा से पंजाब को मुक्त नहीं कर सके। आज देश की जवानी का शोषण करने का सरकारी हथियार बन गई। अकाली-भाजपा सरकार के दस वर्ष के कार्यकाल में तो नब्बे प्रतिशत कर्मचारी ठेके पर ही भर्ती किए गए। उन सभी कर्मचारियों को भरोसा दिया गया कि तीन वर्ष पश्चात उन्हें नियमित कर दिया जाएगा। संभवत: 2 प्रतिशत ही कर्मचारी इतने भाग्यशाली रहे कि उन्हें पांच-दस वर्ष बाद नियमित किया गया। शेष जो बेरोजगारी के मारे ठेके की नौकरी की चक्की में पिसने को तैयार हो गए वे प्रौढ़ावस्था में पहुंच रहे हैं, पर उनका वही वेतन, वही अवकाश की शर्तें हैं और काम का बहुत ज्यादा बोझ है। उन्हें कोई भी राहत नहीं मिली। क्या कोई यह अनुमान करेगा कि उन युवाओं को न विवाह के दिन कोई छुट्टी मिली, न पिता या माता बनने पर अवकाश मिला और न बीमारी के लिए कोई सरकारी राहत मिली। जो थोड़ा-बहुत वेतन मिलता था वही उन्होंने उसे किस्मत स्वीकार कर लिया, पर एक आशा रही कि शायद सरकार कभी उन्हें नियमित कर देगी।
शिक्षित जवानी का जितना शोषण सरकारों ने किया, वास्तव में वह राष्ट्रीय अपराध है। इसी कारण देश के बहुत से युवक-युवतियां विदेश के रास्ते पर चल पड़े। इसी सप्ताह प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस ओर देश के युवक चलते हैं उसी ओर देश चलता है। पर आज के युवा तो पासपोर्ट और वीजा दफ्तरों के बाहर खड़े होकर विदेशों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए किसी भी कीमत पर जाने को तैयार हैं। क्या समझा जाए कि हमारा देश भी वहीं किस्मत आजमाएगा?
पिछली सरकारों ने तो पुलिस कर्मचारियों को भी 3 वर्ष केवल दस हजार रुपये वेतन पर रखा। पीसीएस और पीपीएस अधिकारी भी पंद्रह हजार रुपये पर भर्ती किए गए। एक अच्छा घरेलू सहायक भी इतने वेतन में नहीं मिलता। इसके साथ ही पांच वर्ष पहले की दीवाली पर बादल सरकार ने बड़े-बड़े समाचार छपवाए, पंजाब के ठेके पर काम करते कर्मचारियों की नौकरी पक्की की जा रही है। चन्नी सरकार की तरह ही उस सरकार ने भी एक दिन का विधानसभा सत्र बुलाकर वहां यह प्रस्ताव पास किया कि तीस हजार ठेका कर्मचारियों को नियमित करना है, पर परिणाम वही ढाक के तीन पात।
सरकार बदली और चुनावों से पहले कांग्रेस सरकार ने भी इन बेचारों को आशादीप दिखाया, वोट दीजिए नौकरी पक्की हो जाएगी। वोट दे दिया, पर वे ठेके पर ही रहे। नियमित कर्मचारियों का महंगाई भत्ता पिछले वर्षों में कई बार बढ़ा। नए वेतन आयोग की ओर भी सबकी निगाहें हैं। सांसदों, विधायकों का वेतन, भत्ता बढ़ता ही रहता है। बड़े-बड़े बंगलों में रहने वाले जनता का दर्द महसूस ही नहीं करते। वर्तमान चन्नी सरकार ने भी दस साल से ज्यादा समय से ठेके की नौकरी कर रहे 36 हजार कर्मचारियों को नियमित करने की घोषणा कर दी। इस भुलेखे के साथ कि एक बार फिर वही दीवाली कर्मचारियों के घरों में आ गई, जो पांच साल पहले बादलों ने दी थी, पर आशंका यह थी कि इस छत्तीस हजार में किसका नाम रहेगा या कटेगा। लंबी प्रतीक्षा के बाद जानकारी मिली कि राजभवन में ही 40 दिन से वह फाइल बंद है जो विधानसभा सत्र के बाद राज्यपाल को हस्ताक्षर के लिए भेजी गई। अब फिर तड़प रहे हैं पंजाब के वे कर्मचारी जो प्रौढ़ावस्था को पहुंच रहे हैं। बहुत पहले मैंने पंजाब कांग्रेस के प्रधान सुनील जाखड़ और खजाना मंत्री मनप्रीत बादल से यह कहा था कि थोड़ी-सी राहत इन ठेका कर्मचारियों को दे दें।
कौन नहीं जानता कि सुप्रीम कोर्ट का निर्देश है, समान काम के लिए समान वेतन। कम से कम मेडिकल और मेडिकल खर्च अवश्य दें। कर्मचारी के घर संतान पैदा होती है तो उसे छुट्टी दें और इनकी आकस्मिक छुट्टियां बढ़ा दें। एक अच्छे राजनेता की तरह दोनों ने स्वीकार किया। वित्त मंत्री ने तो सात दिन में ही यह सब कर देने का वचन दिया और उसके बाद फोन वचन भी नहीं सुनाई दिए।
ऐसा लगता है कि अब विरोधी पार्टियां सरकार पर आरोप लगाएंगी कि वे कर्मचारियों को नियमित नहीं कर रहे और सरकार राज्यपाल पर। वास्तव में ये सभी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं। बेकारी, बेरोजगारी, शोषण, भ्रष्टाचार से बचाने की कोई इच्छा इन सरकारों में नहीं। मतदाताओं को इनकी चालें समझनी होंगी। रोजगार देने की जगह मुख्यमंत्री ने नई पीढ़ी को विदेश भेजने की सुविधा देने की घोषणा करते हुए यह कह दिया कि अब आइलेट्स की शिक्षा परीक्षा मुफ्त कर दी जाएगी। सीधी बात कि विदेश में जाकर रोटी कमाओ, सरकार से कोई आशा न रखे।

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