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कोरोना से जंग: ग्रामीण इलाकों में जर्जर स्वास्थ्य ढांचे और डॉक्टरों की कमी के अलावा भी कई चुनौतियां

पहली लहर के विपरीत कोविड की दूसरी लहर से ग्रामीण भारत बुरी तरह प्रभावित हुआ है। चूंकि उत्तर भारत में मानसून आ रहा है, ऐसे में, यह नहीं भूलना चाहिए कि बरसात के मौसम में ग्रामीण इलाके दूसरी कई संक्रामक बीमारियों से भी जूझते रहते हैं। दूसरी लहर से ग्रामीण भारत को हुए कुल नुकसान का हालांकि अभी तक कोई प्रामाणिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन देश भर से आई अनेक फील्ड रिपोर्टें बताती हैं कि स्थिति गंभीर है। शहरी भारत की तुलना में ग्रामीण भारत का कमजोर स्वास्थ्य ढांचा सर्वज्ञात है। आदर्श स्थिति यह है कि ग्रामीण भारत में प्रति 5,000 की आबादी पर एक स्वास्थ्य उप-केंद्र, 30,000 की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) और 1.2 लाख की आबादी पर एक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) हो। लेकिन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने विगत मार्च में ही संसद में यह स्वीकारा है कि दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य उप-केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की क्रमश: 23, 28 और 37 प्रतिशत की कमी है। केंद्र सरकार ने शहरों से घिरे क्षेत्रों तथा ग्रामीण व आदिवासी इलाकों में कोविड का प्रसार रोकने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। ग्रामीण स्तर पर निगरानी रखने के लिए भी दिशा-निर्देश दिए गए हैं। उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की बीमारी और खासकर बुखार पर नजर रखी जा रही है। लेकिन इसके अलावा भी कई जरूरी मुद्दे हैं। दरअसल ग्रामीण इलाकों में जर्जर स्वास्थ्य ढांचे और डॉक्टरों की कमी के अलावा भी कई चुनौतियां हैं। इस संबंध में चित्तौड़गढ़ स्थित प्रयास सेंटर फॉर हेल्थ इक्वि टी की निदेशक छाया पचौली कहती हैं, राजस्थान में काम करते हुए हमने पाया कि अनेक लोग अपनी बीमारी छिपाते हैं। आशा कार्यकर्ताएं और अग्रिम पंक्ति के दूसरे लोग वैसे तो हर दरवाजे पर जाते हैं, पर खासकर ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में लोग इस डर से अपनी बीमारी के बारे में नहीं बताते कि फिर उन्हें आइसोलेशन सेंटर पर ले जाया जाएगा, जहां वे अपने परिजनों और परिचितों से नहीं मिल पाएंगे। प्रकृति के बीच रहने वाले आदिवासी अस्पतालों में भर्ती होने से तो डरते ही हैं, ग्रामीण इलाकों में बहुतों में यह भी धारणा है कि अस्पताल ले जाने पर वे जिंदा नहीं बचेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में कोविड टीकाकरण के प्रति भी झिझक है। जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ आनंद भान का कहना है कि कोविड जांच और टीकाकरण तक गांवों के ज्यादातर लोगों की पहुंच नहीं है। कोविड से ग्रस्त अनेक ग्रामीण इलाज के लिए ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों की शरण में जाते हैं, जो इसका इलाज करने में सक्षम नहीं हैं। आशा कार्यकर्ताएं बेशक हर घर तक पहुंचती हों, लेकिन जर्जर स्वास्थ्य ढांचे के बीच वे गांवों के लोगों को कोविड से कितना बचा पाने में सक्षम होती होंगी, इसमें भी संशय है। यही नहीं, कोविड पर ध्यान एकाग्र कर लेने के कारण गांवों में दूसरी बीमारियों के प्रति ध्यान नहीं है। उनका कहना है कि गांवों के लोगों को कोविड जांच के लिए आगे आने और टीका लगाने के प्रति प्रोत्साहित करना होगा। वह कहते हैं, कोविड से निपटने के लिए केंद्रीकृत औपचारिक संवाद कारगर नहीं होगा। इसके लिए स्थानीय स्तर पर संवाद करने की जरूरत है, जिसमें स्थानीय संस्कृति का भी पुट हो। ग्रामीणों की झिझक तोड़ने के लिए पंचायतों, विभिन्न सामुदायिक समूहों और धार्मिक नेताओं को अभियान में जोड़ना और शामिल करना होगा। स्थानीय वास्तविकता की पहचान इस दिशा में पहला कदम हो सकती है। फौरी तौर पर यह एक बड़ी चुनौती लग सकती है। लेकिन अगर गौर करें, तो यह इस तरह की कोई पहली चुनौती नहीं है। हमें इस संदर्भ में पोलियो और एचआईवी व एड्स के खिलाफ अपनी मुहिम की याद करनी चाहिए। जब अतीत में हम कठिन से कठिन चुनौतियों का सामना कर चुके हैं, तो अब भी कर लेंगे। हां, इसके लिए स्पष्ट नजरिया और कायर्योजना आवश्यक है। पश्चिम बंगाल में हालिया विधानसभा चुनावों के दौरान दोनों प्रबल प्रतिद्वंद्वी पक्षों के बीच दिखी कड़वाहट चुनावों के बाद धीरे-धीरे खत्म होने के बजाय अप्रत्याशित ढंग से खिंचती चली जा रही है। चुनाव नतीजों के ठीक बाद यह हिंसा की घटनाओं के रूप में सामने आई। फिर राज्यपाल और मुख्यमंत्री के रिश्तों में तनाव भरने लगी। केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच राज्य के मुख्य सचिव के डेप्युटेशन को लेकर बना ताजा टकराव भी इसी कड़वाहट के लगातार विस्तार का नतीजा है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस हालिया टकराव के केंद्र में वह बैठक है, जो यास तूफान से राज्य में हुई तबाही के मद्देनजर पीड़ितों को राहत पहुंचाने के उपायों पर विचार करने के लिए बुलाई गई थी। प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई उस बैठक में बीजेपी विधायक शुभेंदु अधिकारी को आमंत्रित करने के पक्ष और विपक्ष में दी जा रही दलीलें अपनी जगह हैं, पर इस तथ्य से कोई कैसे इनकार कर सकता है कि वह नंदीग्राम से बीजेपी के टिकट पर जीत कर आए हैं। बीजेपी उन्हें नेता प्रतिपक्ष का पद दे रही है तो विधानसभा के इस पूरे कार्यकाल के दौरान वह सदन के अंदर और बाहर इस भूमिका में बने रहेंगे। ममता बनर्जी की लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार उनकी मौजूदगी पर कहां-कहां आपत्ति करेगी। बेहतर होता, तृणमूल कांग्रेस की सरकार किसी खास व्यक्ति की मौजूदगी को अपने मान-अपमान से जोड़ने के बजाय राज्य के तूफान पीड़ितों के हितों को तरजीह देते हुए पूरी गंभीरता से उस बैठक में शामिल होती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और केंद्र सरकार के सामने राज्य के तूफान पीड़ितों का पक्ष ढंग से रखने का एक मौका हाथ से चला गया। लेकिन इसके बाद केंद्र सरकार ने इस मामले पर जिस तरह से रिएक्ट किया, उसे भी परिपक्व तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। किसी राज्य के मुख्य सचिव को केंद्र में डेप्युटेशन पर बुलाने के इस तरीके के कानूनी पहलू अपनी जगह हैं, प्रशासनिक और राजनीतिक लिहाज से भी यह कोई अच्छा कदम नहीं कहा जाएगा। मुख्य सचिव किसी राज्य के पूरे प्रशासनिक तंत्र का अगुआ होता है। उसके साथ अपमानजनक व्यवहार न केवल आईएएस अधिकारियों के बल्कि पूरे प्रशासन तंत्र के मनोबल पर असर डाल सकता है। फिर कहना होगा कि यह सब ऐसे समय हो रहा है, जब राज्य का प्रशासन कोरोना और तूफान की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। इन्हीं चुनौतियों के मद्देनजर मुख्य सचिव को तीन महीने का सेवा विस्तार इन्हीं सरकारों ने चंद दिनों पहले दिया है। साफ है कि केंद्र और राज्य की निर्वाचित सरकारें इस संकट काल में जिस तरह का रुख दिखा रही हैं, उससे कहीं बेहतर आचरण की उनसे उम्मीद की जाती है। और निश्चित रूप से वे आम देशवासियों की इस उम्मीद पर खरा उतरने की काबिलियत रखती हैं।

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