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दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान प्रदात्री ममतामयी नारी

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अशोक प्रवृद्ध

भारतीय संस्कृति में नारी को स्नेहमयी माता, मंगलकारिणी अनुजा, प्रेमरसमयी पत्नी, शान्तिरस वर्षक पुत्री के साथ ही उषा के समान प्रकाशवती, राष्ट्र की पूजा योग्य, परिवार और राष्ट्र में सत्यम, शिवम्, सुन्दरम की अरुण कान्तियों को छिटकने वाली, अपने विस्मयकारी सद्गुणगणों के द्वारा अविद्या ग्रस्त जनों को प्रबोध प्रदान करने वाली, जन-जन को सुख देने के लिए अपने जगमग करते हुए रथ पर बैठ कर आने वाली ममतामयी रूप में संज्ञायित किया गया है, वहीं शक्ति, वीरांगना, शेरनी, शत्रु रूप मृगों का मर्दन करनेवाली, देवजनों के हितार्थ अपने अन्दर सामर्थ्य उत्पन्न करने वाली, अविद्यादि दोषों पर शेरनी की तरह टूटने वाली शत्रुसंहारिणी भी कहा गया है। दूसरी ओर उससे दिव्य गुणों के प्रचारार्थ स्वयं को शुद्ध करने, उत्कृष्ट कोटि के हथियारों को चलाने में कुशल होने, उत्तम प्रकार से अपनी तथा दूसरों की रक्षा करने में प्रवीण होने, सम्यक नेतृत्व करने, राष्ट्र को उत्तम कोटि के हथियार चलाने में सिद्धहस्त, अद्भुत एवं वर्षक संतान प्रदान करने और धार्मिक जनों के हितार्थ स्वयं को दिव्य गुणों से अलंकृत करने की भी अपेक्षा की गई है। यही कारण है कि सत्य विद्या के आग्रही जन उससे विद्या बलों से जीवन को पवित्र करने, कर्मनिष्ठ बनकर अपने कर्मों से मानव व्यवहारों को पवित्र करने, अपने श्रेष्ठ ज्ञान एवं कर्मों के द्वारा संतानों एवं शिष्यों में सद्गुणों और सत्कर्मों को बसाने, गृह आश्रमयज्ञ एवं ज्ञानयज्ञ को सुचारू रूप से संचालित करती रहने, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूपी चार पुरुषार्थ- समुद्रों का अवगाहन कराने और अपनी कृपा दृष्टि से कभी न वंचित करने की प्रार्थना करते नहीं थकते हैं।सनातन वैदिक संस्कृति में ही दिव्यगुण, दिव्य भोग और उत्तम संतान प्राप्ति हेतु गृह आश्रम में पुष्टि और फिर प्रेम रस प्रदान करने तथा यम- नियमों का पालन करने वाली नारियों की पूजा, सत्कार किये जाने की महान परिपाटी है, वहीं इस संसार में सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है, केवल सनातन वैदिक धर्म ही एक ऐसा धर्म है, जहाँ नारियों को पुरुष के कार्यों में ऐसी सम सहभागिता प्राप्त है, जो अन्यत्र कहीं नहीं दिखती। भारतीय परम्परा में कोई भी धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक आयोजन अथवा अनुष्ठान स्त्रियों की सहभागिता अर्थात उन्हें साथ लिए बगैर सम्पन्न नहीं होती।

उल्लेखनीय है कि भारत में वैदिक काल से लेकर उपनिषदादि ग्रन्थों के रचना काल तक स्त्रियों को वेदाध्ययन, यज्ञोपवीत धारण, यज्ञ करने आदि के सभी अधिकार प्राप्त होने के वैदिक, पौराणिक व ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध हैं। सभी प्रमाण चीख -चीखकर कहते हैं कि वे ब्रह्मा के पद को सुशोभित करती थीं, उच्च शिक्षा प्राप्त करके मन्त्रद्रष्ट्री ऋषिकाएं बनती थीं। वेद मन्त्रों में घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, उपनिषद्, निषद्, ब्रह्मजाया (जुहू) अगस्त्यभगिनी, अदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा, नदी, यमी, शाश्वती, श्री, वाक्, श्रद्धा, मेधा, दक्षिणा, रात्रि, सूर्या, सावित्री, अदिति आदि विदुषी नारियों के नाम मन्त्रद्रष्टी ऋषिकाओं के रूप में अंकित हैं, जिन्होंने अपनी तपश्चर्या द्वारा स्वयं वेद मन्त्रों के रहस्यों का साक्षात्कार करके लोकमंगल की भावना से दूसरों के लिए वेद मन्त्रों का व्याख्यान एवं प्रकाशन किया, और श्रुत ऋषि की संज्ञा से अभिभूत हुई।अपने पूर्व ऋषियों से वेद के रहस्यार्थ का बोध, सूक्तों एवं मन्त्रों के रूप में करने के कारण प्रसिद्ध हुई।बृहद्देवता 2/ 82 -84 से भी इस बात की पुष्टि ही होती है। बृहदारण्यक उपनिषद 3-6-2 और 3-8-1 में ब्रह्मविद्या की ज्ञाता गार्गी वाचक्नवी नामक विदुषी का ब्रह्मविद्या के सर्वोच्च ज्ञाता ऋषि याज्ञवल्क्य से संवाद उल्लेख है। वृहदारण्यक उपनिषद 2-4-2 और4-5-2 के अनुसार याज्ञवल्क्य की पत्नी मैत्रेयी भी ब्रह्मवादिनी थी।महाभारत शान्ति पर्व 320-82,उद्योगपर्व 109.18,शल्यपर्व 54-6,उद्योगपर्व 133 आदि में गार्गी, सुलभा, शिवा, सिद्धा, श्रुतावली, विदुला आदि सहित एक दर्जन से अधिक विदुषियों का वर्णन आता है। आचार्य पाणिनि के द्वारा अष्टाध्यायी 4-1-10 में विदुषियों की अनेक उपाधियों का उल्लेख किये जाने से इस बात की पुष्टि करती है कि उस काल में अनेक स्तर की विदुषियां होती थीं। वे वेदादिशास्त्रों का गभीर अध्ययन करके ही ब्रह्मवादिनी बनती थीं।यह स्थिति बहुत बाद तक चली आई है। लगभग अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व आदि शंकराचार्य से मंडन मिश्र की पत्नी भारती के द्वारा शास्त्रार्थ किये जाने की ऐतिहासिक घटना इस बात की पुष्टि करती है कि स्त्रियों के अध्ययन की परम्परा बहुत अर्वाचीन काल तक चली है। राजशेखर की पत्नी अवंतीसुन्दरी, कौमुदी महोत्सवनाटक की रचयिता कर्नाटक प्रदेश की राजकुमारी बिज्जिका वैदर्भी काव्यरीति की प्रसिद्ध विदुषी मानी गयी है। पांचाली काव्यरीति की विदुषी भट्टारिका तथा लाटी काव्यरीति के लिए देवी नामक विदुषी का नाम प्रसिद्ध है।

वेद को परम प्रमाण मानने वाले महर्षि मनु महाराज भी वेदानुसार स्त्रियों के सभी धार्मिक तथा उच्च शिक्षा के अधिकारों के समर्थक थे।इसीलिए उन्होंने स्त्रियों के अनुष्ठान मन्त्रपूर्वक करने और धर्मकार्यों का अनुष्ठान स्त्रियों के अधीन रखने की घोषणा मनुस्मृति में की है। अथर्ववेद 3/5/18 में स्पष्ट कहा गया है कि कन्या ब्रह्मचर्यपूर्वक वेद शास्त्रों का अध्ययन कर, विदुषी बनकर अपने सदृश पति का वरण करे- ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।स्पष्ट है कि ऐसी विदुषी पत्नी का परिवार फिर विद्वानों का, सुशिक्षितों का परिवार बनता है। फिर उस परिवार में शिक्षित, सभ्य, उन्नत सन्तान उत्पन्न होती है। मनुस्मृति में अंकित स्त्रियों के धार्मिक एवं शैक्षिक अधिकारों से सम्बन्धित श्लोकों के अध्ययन से प्राचीन भारत में नारियों को प्राप्त शैक्षिक एवं धार्मिक अधिकार का स्वतः संज्ञान हो जाता है। वैदिक परम्परा के प्रवर्तक एवं संवाहक मनु ने स्त्रियों को धर्मानुष्ठान का अधिकार सौंपते हुए घर में आयोजित होने वाले सभी धर्मानुष्ठानों का सम्पूर्ण दायित्व पत्नी को ही दिया है। स्पष्ट है कि उन दायित्वों को विदुषी पत्नी ही सम्पन्न कर सकती है, अशिक्षित पत्नी नहीं। मनुस्मृति 9-28 के अनुसार सन्तानोत्पत्ति और धर्मकार्यों का अनुष्ठान पत्नी के दायित्व के अन्तर्गत आता है। वही इन कार्यों की स्वामिनी है। मनुस्मृति 9-11 के अनुसार घर की सजावट, स्वच्छता, धर्मानुष्ठानों का आयोजन, भोजन-पाक, घर की संभाल-निरीक्षण, इन कार्यों को पत्नी के अधिकार में रखे। 9-96 में साधारण से साधारण कर्त्तव्य और धर्मपालन पत्नी को सहभागी बनाकर करने का आदेश दिया है। पत्नी के बिना धर्मानुष्ठान अधूरा है।

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वेद में अंकित स्त्रियों के लिए शिक्षा व धर्म के अधिकार से सम्बन्धित मन्त्रों को मन में अवगाहन करते हुए मनुस्मृति के इन श्लोकों के अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि मनु महाराज भी वेद को प्रमाण रूप में घोषित करते हुए स्त्रियों को ये अधिकार सौंप रहे हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुस्मृति में वेद का विधान ही मनु द्वारा स्वीकृत विधान है। स्त्रियों की विवाह विधि बिना यज्ञानुष्ठान के सपन्न नहीं मानी जाती। यज्ञ में वेदमन्त्रोच्चारण पूर्वक भागीदारी का होना उनके यज्ञाधिकार का साधक है। मनुस्मृति 3-28 के अनुसार दैवविवाह यज्ञक्रिया पूर्वक ही सम्पन्न होता है। उनके अनुसार बिना यज्ञ और वेदमन्त्र-पाठ के विवाहविधि सपन्न ही नहीं होती। उसके बिना पत्नी पर पति का पतित्व अधिकार नहीं बनता-
मंगलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः।
प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वायकारणम् ।। -मनुस्मृति 5-152
अर्थात -विवाह काल में स्वस्ति परक मन्त्रों का पाठ और वैवाहिक यज्ञ का अनुष्ठान इन स्त्रियों के मंगल के लिए ही किया जाता है। उस यज्ञ में कन्यादान करने पर ही स्त्रियों पर पति का अधिकार बनता है, अन्यथा नहीं।

महर्षि मनु ने मनुस्मृति में स्त्रियों की शिक्षा तथा धार्मिक अनुष्ठान की वैदिक परम्परा का ही वर्णन किया है। वैदिक परम्परा में स्त्रियों के लिए शिक्षा तथा धार्मिक अनुष्ठानों का कहीं कोई निषेध नहीं है। ऐसी स्थिति में स्त्रियों के शिक्षानिषेधपरक विधान मनुस्मृति में अंकित देखकर कुछ लोग इस पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं, परन्तु इन श्लोकों के समीचीन अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्त्रियों के शिक्षानिषेधपरक विधान मनुस्मृति के मौलिक विधान नहीं हो सकते। ऐसे श्लोक पौराणिक काल में प्रक्षिप्त कर अर्थात मिला दिए गए हैं। क्योंकि स्त्रियों की शिक्षा और धार्मिक अधिकारों की परम्परा वैदिक काल से लेकर महाभारत काल के भी बहुत बाद तक मिलती है। पाणिनि के अष्टाध्यायी 4-1-33 में पत्युर्नो यज्ञ संयोगे कहा गया है। इस सूत्र के अनुसार यज्ञानुष्ठान के द्वारा विवाह होने पर ही कोई स्त्री पत्नी कहलाती है। स्पष्ट है कि पाणिनि काल तक वह वैवाहिक यज्ञ के अनुष्ठान में भागीदारी करती रही है। ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार गृहस्थ को पत्नी के साथ मिलकर ही यज्ञ करना चाहिए, अकेले नहीं। गृहस्थ होने के उपरान्त व्यक्ति अकेला यज्ञ करने पर वह यज्ञ पूर्ण नहीं माना जाता। तैत्तिरीय ब्राह्मण 3-3-3-1 में कहा गया है-
अयज्ञियो वैष योऽपत्नीकः।
अर्थात-पत्नी के बिना यज्ञ करने वाला गृहस्थ यज्ञ के अयोग्य है।
तैत्तिरीय संहिता 6-2-1-1 में कहा गया है कि पत्नी यज्ञ में जो अनुष्ठान करती है, वह दोनों अर्थात पति-पत्नी के लिए है।

इन प्रमाणों से प्राचीन काल में पत्नी द्वारा यज्ञ करने का अधिकार स्वतः सिद्ध है। कारण यह है कि विवाह होने के बाद पति-पत्नी एक इकाई बन जाते हैं, उन्हें कोई भी कार्य मिलकर करना चाहिए। एक-दूसरे की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए। तैत्तिरीय ब्राह्मण 3-3-3-5के अनुसारपत्नी पति का आधा भाग है।जैसे शरीर के आधे भाग की उपेक्षा नहीं की जाती, उसी प्रकार पत्नी की भी सर्वत्र बराबर भागीदारी होती है।वैदिक परम्परा में अकेला पति यजमानी नहीं हो सकता। पत्नी के साथ मिलकर ही गृहस्थ यजमान की पूर्णता होती है।जैमिनीय ब्राह्मण 1-86 के अनुसार पत्नी, यजमान पति का आधा भाग है। पूर्ण यजमान पति-पत्नी के संयुक्त रूप में कहाता है।पत्नी के बिना गृहस्थ का कोई भी धर्मानुष्ठान पूर्ण नहीं होता। यज्ञ में पत्नी का महता की पुष्टि इस बात से भी होती है कि शतपथ ब्राह्मण 1-9-2-3 और शतपथ ब्राह्मण 1-3-1-12 में पत्नी को ही यज्ञ का आधा भाग घोषित करते हुए कहा है कि यज्ञ का पूर्व भाग पति है तो उत्तर भाग पत्नी है।यज्ञ न केवल पति-पत्नी का संयुक्त कर्त्तव्य है अपितु वह दोनों के ऐक्य का प्रतीक है।

मनुस्मृति के रचयिता स्वयं मनुपत्नी द्वारा वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान और यज्ञ में सस्वर वेदपाठ करने का प्रमाण देने से सम्बन्धित काठक ब्राह्मण 3-30-1 में अंकित एक ऐतिहासिक प्रसंग के अनुसार सातवें मनु राजर्षि वैवस्वत मनु, जिन्हें मनु श्रद्धादेव भी कहा जाता है,एक बार अपने महल में पहुंचकर देखते हैं कि उनकी पत्नी उच्च स्वर से यजुर्वेद के मन्त्रों का पाठ करते हुए यज्ञानुष्ठान कर रही है। उसकी वाणी आकाश में व्याप्त हो रही थी।यह मनुओं की परम्परा रही थी, जो अठाईसवें चतुर्युगी के इस सातवें मनु तक स्पष्ट शब्दों में प्रचलित रहने के प्रमाण हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रथम मनु स्वायंभुव के समय ऐसी वैदिक परम्पराएँ और भी अत्यधिक सुदृढ़ रूप में रही होंगी। ऐसी वैदिक परम्पराओं के प्रारभकर्त्ता,स्वयं वेदानुयायी और यज्ञप्रवर्तक राजर्षि मनुस्त्रियों के लिए शिक्षा तथा धार्मिक अधिकारों का निषेध कदापि विहित नहीं कर सकते। मनुस्मृति में ऐसे श्लोक पौराणिक काल में धर्मद्वेषियों द्वारा प्रक्षिप्त कर दी गई हैं।

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