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साहित्य के सांस्कृतिक आयाम: एक प्रासंगिक दृष्टिकोण 

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डॉ. राजकुमार शर्मा
डीन स्टूडेंट वेलफेयर
राँची विश्वविद्यालय , रांची
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किसी भी राष्ट्र का साहित्य उसके वैभव के प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति का एक  सशक्त माध्यम होता है। हमारा इतिहास प्रारंभ से ही इस बात का साक्षी रहा है कि साहित्यिक समृद्धि सामान्यतया राष्ट्रीय समृद्धि के समानांतर चलती है। भारत, मिश्र, ग्रीस  या रोम की विकसित सभ्यताएँ साहित्यिक रूप से भी काफी समृद्ध थीं।

 

“परहित सरिस धर्म नहिं भाई, 
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई” 
इन पंक्तियों का भाव रचनाकार के उदात्त चिंतन को अभिव्यक्त करता है जिसके आधार में उसके व्यक्तित्व पर उस संस्कृति का प्रभाव होगा जिसमें वह पला एवं बढ़ा है।
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भारत-भूमि का यही विराट सांस्कृतिक आयाम पूरे मानव समाज के लिए शाश्वत मूल्यों के प्रतिस्थापन में बहुमूल्य योगदान देकर उन्हें अपना ऋणी बनाया है। यहाँ तुलसीदास ने धर्म को रूढ़िवादि सोच से उपर उठाकर इसे ऐसे पायदान पर स्थापित किया है जहाँ यह समस्त मानवहित का रक्षक हो जाता है। ऐसे उत्तम विचार उसी संस्कृति में जनित होते हैं जो उत्कृष्ट साहित्यिक चिंतन की पराकाष्ठा को प्राप्त किए रहता है। यही चिंतन की परम्परा मानव जीवन के गुणात्मक समृद्धि का जीवंत आधार बनता है जिसके सहारे हम अपने सार्थक जीवन के सपने को साकार करते हैं। भू- मंडलीकरण के इस दौड़ में बहुसंस्कृतिवाद की जड़ें गहरी हो रही हैं। ऐसी स्थिति में उदात्त चिंतन से फलित भावों का आत्मसात्करण ही स्वस्थ मानव समाज की रचना तथा इसके भविष्य को सुनिश्चित कर सकता है। भारतीय साहित्य से निः सृत ज्ञान इस दृष्टिकोण से काफी प्रासंगिक हैं। तप, त्याग तथा तादात्म्य की सांस्कृतिक विशिष्टता भारत की पहचान रही है जिसके चाशनी में सना साहित्य मानव समाज को आदिकाल से आलोकित कर जीवन को धन्य किया है। साहित्य और संस्कृति के ये अनोखे रिश्ते हमारे सनातन चिंतन परम्परा के कालजयी स्रोत हैं।
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