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यहाँ विकास के नाम पर नहीं जातियों के नाम पर चलती है राजनीति

जातियों के सहारे वोट हड़पने की कोशिश

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अखिलेश अखिल

बिहार में जातियों की जंग फिर से शुरू हो रही है। इसे आप जंग की तो कहेंगे जिसमे जातियों की संख्या दिखाकर सामने वालों को पास करने की कोशिश की जाती है। जातियों के नाम पर राजनीति में उत्त्पात मचाया जाता है और जातियों के नाम पर ही टिकट बांटने का खेल किया जाता है। एक जाति से दूसरी जाति कितनी ताकतवर है, कितनी संख्या बल में ज्यादा है और कितनी प्रभावी है। इसे ही दिखाने के लिए जातियों का सम्मलेन, रैली और महा रैली होती रही है। पहले भी होती थी, आज भी हो रही है और शायद आगे भी होती ही रहेगी। बिहार में जातीय खेल को कोई ख़त्म नहीं कर सकता। वैसे जातीय राजनीति इस देश के मन मिजाज में समाया हुआ है लेकिन बिहार, झारखंड और यूपी में जाति ही सबकुछ है। जाति नहीं तो कुछ भी नहीं। जाति ही राजनीति की दिशा तय करती है और जाति ही किसी नेट को बनाती है और बिगाड़ भी देती है। बिहार की राजनीति आज भी जाति से आगे नहीं निकल पा रही है और सबसे बड़ा सच तो यह है कि जातियों के इस खेल में क्षेत्रीय पार्टियां तो सराबोर है ही बीजेपी जैसी पार्टियां भी जातियों की राजनीति को आगे बढ़ाने से बाज नहीं आती। उसे बिहार में रहना है तो जाति की राजनीति करनी ही होगी। यही वजह है कि आगामी लोकसभा चुनाव के मद्दे नजर बिहार की बीजेपी इकाई जतियों की एक बड़ा सम्मलेन सात तारीख को पटना में आयोजित करने जा रही है।

 

जातियों के सहारे वोट हड़पने की कोशिश

 

कहने वाले कुछ भी कहें लेकिन बिहार में जातियों के सहारे वोट हड़पने की कहानी चल पड़ी है। अब तो जातीय गणना के बाद यह साफ़ हो गया है कि बिहार में किस जाति की कितनी आबादी है और फिर उसके लिए सत्कार ने कितना आरक्षण का खेल शुरू किया है। बीजेपी की कहानी बड़ी विचित्र है। उसे जातीय गणना पर आपत्ति हो सकती है लेकिन जातीय खेल पर कोई आपत्ति नहीं है। नीतीश ने तो जातीय आंकड़ों को ही सामने लाने का काम किया है। इसमें खराबी ही क्या है? अगर किसी परिवार में पांच लोगों की संख्या है तो क्या उसे यह जानकारी नहीं मिलनी मिलनी चाहिए कि समाज के भीतर उनके परिजनों की और भी कितनी आबादी है? यही काम तो नीतीश कुमार ने किया है। लेकिन बदनाम हो गए। और अब जातियों का सम्मलेन बीजेपी करती दिख रही है तो उसमे बीजेपी का कोई अपमान नहीं ? राजनीति का यह दोहरा चरित्र आप शायद ही कही देख सकेंगे ?

 

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तो बिहार में आज सात तारीख को बीजेपी अम्बेडकर समागम का आयोजन कर रही है। बीजेपी वाले कह रहे हैं कि इस समागम में प्रदेश भर के लाखों लोग जुटेंगे। जो सच्चे अम्बेडकरवादी है। वो बीजेपी के इस मंच से जुड़ेंगे और अपनी बात रखेंगे। बीजेपी के प्रवक्ता हैं योगेंद्र पासवान। काफी प्रखर भी है और जानकार भी। वे कहते हैं कि अम्बेडरकर जी के महापरिनिर्वाण दिवस पर यह समागम किया जा रहा है। इसमें सही अर्थो में वही लोग शामिल होने जा रहे हैं जो आंबेडकर के सही लोग है और जो आंबेडकर के मार्ग पर चलते हैं। इस देश में दलितों के नाम पर और आंबेडकर के नाम पर राजनीति खूब होती है लेकिन अब सही अर्थों में अब ही आंबेडकर जी के सपनो को पूरा करने का काम हो रहा है।

 

याद रहे अभी कुछ दिन पहले ही उसी पटना में भीम संसद का आयोजन जदयू ने किया था। यह जदयू का जातीय खेल था। इस भीम संसद में लाखों लोगों के पहुँचने की बात कही गई। नीतीश कुमार समेत कई नेता इस मंच से बहुत कुछ कह गए। बिहार के लिए विशेष राज्य की मांग भी केंद्र से की, लेकिन सब कुछ फिर से खो ही गया। भीम संसद में आये लोग बड़े ही अरमान लिए हुए थे। उन्हें लग रहा था कि सरकार उनके लिए कोई बड़ा ऐलान कर सकती है लेकिन सरकार ने कुछ भी नहीं किया। आरक्षण का गणित समझाया और और फिर आगे बढ़ो और जदयू को सत्ता में लाओ वाली बात समझकर विदा कर दिया। जानकार भी मानते हैं कि जदयू बड़े स्तर पर दलित समाज में पीठ बढ़ा रही है और यह सब अगले लोकसभा चुनाव के लिए हो रहा है। यह चुनाव ऐसा होगा जहाँ एक जाति दूसरी जाती से टकराएगी और लोकतंत्र घायल भी होगा लेकिन राजनीति को इससे क्या मतलब ! उसे तो जीत -हार से मतलब है।

 

बीजेपी का आंबेडकर समागम कितना सफल होता है यह देखने की बात होगी। लेकिन जदयू फिर से एक नया जातीय खेल लेकर प्रस्तुत होने को तैयार है। जनवरी महीने में जदयू अति पिछड़ों की महारैली करने जा रही है। पटना में इसकी तैयारी चल रही है। गाँधी मैदान को पाटने की बात है। ऐसी रैली जिसकी कल्पना किसी नहीं की थी। लाखों -करोडो के खर्च से आयोजित होने वाली यह रैली आगामी लोकसभा चुनाव के लिए दस्तक के समान होगी और बीजेपी को डरानेवाली भी होगी। जदयू के लोग भी कहते हैं कि अति पिछड़ों की होने वाली रैली से ही पता चल जायेगा कि बिहार का मिजाज क्या है और बीजेपी की हालत क्या होने वाली है। कह सकते हैं कि जातियों के नाम पर ताकत दिखाने की यह गाथा इस बिहार में पुरातन काल से ही चली आती है। बता दें कि जनवरी में जननायक कर्पूरी ठाकुर की जयंती है और उसी जयंती के अवसर पर अति पिछड़ों की यह रैली होगी।

 

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि बीजेपी और जदयू के बीच जहाँ दलित और अति पिछडो से लेकर पिछड़ों की राजनीति को साधने की होड़ लगी हुई है वही राजद भी यादव और मुसलमानो को साधने के लिए तैयार है। जानकारी के मुताबिक राजद भी जनवरी महीने में ही कई जातीय सम्मलेन करने की तैयारी में जुटी है। उधर चिराग की अपनी तैयारी है और जीतनराम माझी की अपनी तैयारी। इसके साथ ही मल्लाहो और कूटो की राजनीति साधने वाले वीआईपी नेता मुकेश साहनी की राजनीति है जो बड़े पैमाने पर महलों का सम्मलेन करने को आतुर है उस सम्मलेन में देश भर के मलाह समुदाय को बुलाने की बात है।

 

बिहार क्या करेगा यह तो कोई नहीं जानता लेकिन बिहार के लोग जिस तरह से जातियों में बांटकर बिहार को ख़त्म कर रहे हैं इस पर अब कोई रोक भी नहीं लगा सकता। समाज की खराबी को राजनीति  के जरिये ख़त्म की जाती है और जब राजनीति ही इस दिशा को और आगे बढ़ा रही है तो फिर इन्साफ की पुकार किससे की जा सकती है।

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