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बांकेबिहारी की जनसेवा के अटल भी थे मुरीद


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मथुरा:भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संस्थापक सदस्यों में शुमार बांके बिहारी माहेश्वरी की जनसेवा की भावना के जनसंघ के अध्यक्ष रहे पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राम मंदिर आंदोलन के प्रणेता कल्याण ंिसह भी कायल थे।
भाजपा के बुजुर्ग नेता ने गुरूवार को यहां 94 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली। बांकेजी के नाम से ब्रज की धरती पर मशहूर रहे बांके बिहारी की बेदाग चाल चरित्र और ईमानदार छवि से ‘अटल’ और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण ंिसह ताउम्र खासे प्रभावित रहे। अटल और कल्याण जब भी मथुरा आते थे, वह बांकेजी के स्वामीघाट वाले मकान में ही रूकते थे। भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी की नजरों में उनका सम्मान इस कदर था कि बांके जी ने कभी अपने लिए उनसे तब भी नही मांगा जब वे उपप्रधानमंत्री थे।
‘अटलजी’ ने जब मथुरा से लोकसभा का चुनाव लड़ा तो उनके चुनाव प्रचार की बागडोर दीनदयाल उपाध्याय ने संभाली थी। उस समय दीनदयाल उपाध्याय को संग्रहणी की बीमारी थी इसलिए बांकेजी के लिए उनका निर्देश था कि रस्सी और बाल्टी साथ में लेकर चलेंगे जिससे यदि दीनदयाल जी को कहीं शौच जाने की अचानक आवश्यकता पड़ जाये तो पानी आसानी से उपलब्ध हो जाय। उनकी आज्ञानुसार बांकेजी अपनी साइकिल में रस्सी और बाल्टी लेकर दीनदयाल उपाध्याय के साथ साथ चलते थे। उस समय एक बार तो एक दिन में दीनदयाल उपाध्याय की 11 सभाएं हुई थीं और उनके साथ बाल्टी और डोर लिए बांकेजी बराबर चल रहे थे।
बांकेजी भारतीय जनसंघ और भाजपा की नीव के पत्थर थे मगर जिस प्रकार नींव के पत्थर इमारत को अपने ऊपर खड़ी रखने का कभी श्रेय लेने की कोशिश नही करते उसी प्रकार ब्रज में भारतीय जनसंध एवं भाजपा को आगे बढ़ाने में उन्होंने लाठियां खाईं थी, इमरजेंसी एवं आरएसएस पर लगे प्रतिबंध के विरोध में तो वे जेल गए लेकिन अटलजी एवं कल्याण ंिसह से उन्होंने कभी नही कहा कि उन्हें राज्यसभा या विधान परिषद का सदस्य बना दिया जाय अन्यथा उक्त नेता जिस प्रकार से बांकेजी का सम्मान करते थे वे बड़ी सरलता से राज्यसभा के सदस्य अथवा किसी प्रांत के राज्यपाल बन सकते थे।
उन्होंने भारतीय जनसंघ की ओर से मथुरा विधान सभा का चुनाव 1967, 1969 और 1974 में उस समय लड़ा था जब कांग्रेस की तूती बोलती थी और कोई कांग्रेस प्रत्याशी के सामने चुनाव लड़ने की हिम्मत नही जुटा पाता था। उस समय जब लोगों ने उनसे चुनाव लड़ने का कारण पूछा था तो वे सहज भाव से कहते थे कि वे चुनाव व्यवस्था परिवर्तन के लिए लड़ते हैं क्योंकि आजादी के लगभग दो दशक बीतने के बाद भी सरकारें ऐसे चल रही हैं,जैसे अंग्रेजों की हकूमत अब भी कायम हो। अंग्रेजी शासनकाल की तरह उस समय नगरपालिका के कई कार्यों का शासन ब्यूरोक्रेसी चलाती थी जो जन समस्याओं से अनभिज्ञ थी।उस समय बिजली, पानी और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं जनता को उस प्रकार नही मिलती थीं जैसी आजाद भारत में मिलना चाहिए था।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्मभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में समिति के उपाध्यक्ष के रूप में उन्होंने एक कार्यकर्ता की तरह काम किया तथा अटलजी के निधन के बाद समिति के संरक्षक के रूप में उन्होंने समिति के सेवाभावी कार्यो को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
बिजली की किल्लत को दूर करने के लिए उनके नेतृत्व में मथुरा में एक बड़ा आंदोलन उस समय चला था जब गोपबन्धु पटनायक मथुरा के जिलाधिकारी थे। उस आंदोलन में जनता ने तत्कालीन बिजली विभाग के इंजीनियर जयंिसह को छत्ता बाजार में बैठा लिया था और कहा था कि बिजली की कमी का उन्हें भी एहसास होना चाहिए। इस आंदोलन को फेल करने के लिए तत्कालीन सीओ सिटी रामेन्द्र विक्रम ंिसह ने खुद आंदोलनकारियों पर लाठी बरसाई थीं तथा लाठी खाने वालों में बांकेजी, पूर्व मंत्री रविकांत गर्ग एवं नगरपालिका मथुरा के पूर्व अध्यक्ष वीरेन्द्र अग्रवाल प्रमुख थे।
मथुरावासियों की पीने के पानी की किल्लत को देखकर वे बहुत दु:खी थे तथा उनके नेतृत्व में पानी के लिए चले आंदोलन उस समय की सरकार पर प्रभाव नही डाल पा रहे थे इसलिए उन्होंने 1989 में नगरपालिका मथुरा के अध्यक्ष का चुनाव लड़ा था। उस समय राजेश गौतम कांग्रेस के प्रत्याशी थे। नगरपालिका सदस्यों के खरीद फरोख्त का चलन उस समय चल रहा था इसलिए उस समय के भाजपा के निर्वाचित सदस्यों को बिकने से बचाने के लिए अटलजी के निर्देश पर सभी सदस्य हरियाणा में रखे गए थे।
हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला ने अपनी सरकार के सुरक्षाबलों के साथ सभी सदस्यो को नगर पालिका अध्यक्ष के पद के निर्वाचन के समय मथुरा भेजा था और उसमें बांके बिहारी माहेश्वरी तब भी विजयी हुए थे जबकि उस समय मथुरा का कांग्रेस का सांसद और कांग्रेस का विधायक था। उस समय की सरकारें नगरपालिका को बहुत कम अनुदान देती थीं तथा अधिकांश कार्य लखनऊ में बैठे अफसरों द्वारा ही किये जाते थे।
बांकेजी ने धनाभाव के बावजूद अपने संपर्कों का प्रयोग कर मोहल्लों में सबमर्सिबल लगवाई और पीने के पानी की किल्लत को दूर कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके ही कार्यकाल में होलीगेट के अन्दर की पत्थर की ऊबड़ खाबड़ सड़क का कायाकल्प हुआ और उसकी जगह सीमेन्ट और टाइल्स की सड़क बनी। विषम आर्थिक परिस्थितियों में भी उन्होंने मथुरा नगरपालिका क्षेत्र की ड्रेनेज की समस्या , गांधी पार्क और भगत ंिसह पार्क का सौदर्यीकरण करने जैसे कार्यों को हल करने का प्रयास दलगत राजनीति से ऊपर उठकर बिना जाति, धर्म देखे हुए किया तथा बाद में तत्कालीन नगरपालिका अध्यक्ष वीरेन्द्र अग्रवाल ने उनके द्वारा प्रारंभ की गई योजनाओं को न केवल गति दी बल्कि पूरा भी कराया।
बांके जी को पद्मभूषण से अलंकृत करना वास्तव में उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी क्योकि घट घट में भगवान के दर्शन करनेवाले ऐसे महापुरूषों के लिए कहा गया है कि कबीरा जब पैदा भये, जग हांसे तू रोय।
ऐसी करनी कर चले, तू हांसे जग रोय।।

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