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एकतरफा सोच से बच्चों को बख्शिए

क्षमा शर्मा
इन दिनों पहली कक्षा में पढ़ाई जाने वाली कविता आम की टोकरी बहुत चर्चा में है :-
छह साल की छोकरी,भरकर लाई टोकरी।
टोकरी में आम हैं,नहीं बताती दाम है।
दिखा-दिखाकर टोकरी, हमें बुलाती छोकरी।
हमको देती आम है,नहीं बुलाती नाम है।
नाम नहीं अब पूछना,हमें आम है चूसना।
यह रामकृष्ण शर्मा ह्यखद्दरह्ण की लिखी कविता है। बताया जाता है कि रामकृष्ण शर्मा ने अपना जीवन छोटे बच्चों के बीच बिताया था। पेशे से शिक्षक थे और बच्चों के लिए एक पत्रिका भी निकालते थे।बहुत से नारीवादी इस कविता में प्रयुक्त शब्द छोकरी और आम चूसना पर आपत्ति उठा रहे हैं। उनका कहना है कि ये दोनों शब्द लड़कियों के लिए लिखा जाना अश्लील है। वे इसे बाल श्रम की कविता भी बता रहे हैं।कई बार सोचती हूं कि जब विमर्श हर बात में बाल की खाल निकालने लगें तो ऐसा ही होता है। जिन्हें देशज भाषाओं का पता नहीं, जो अंग्रेजी और ज्यादा से ज्यादा खड़ी हिंदी को जानते हैं, ऐसी व्याख्या वे ही कर सकते हैं। दरअसल विमर्शों की समस्या ये है कि वे सिर्फ अपनी कही बात और विचार को सौ फीसदी सही मानते हैं। वे विरोधी विचार को सुनना ही नहीं चाहते। वे अपनी बात तानाशाही के विरोध में शुरू करते हैं, लेकिन अपने विचारों की तानाशाही से ओत-प्रोत होते हैं। मैंने न जाने कितनी बार इस कविता को पढ़ा। लेकिन मुझे इसमें कहीं भी अश्लीलता नजर नहीं आई। जो लोग चोली के पीछे गाने को अश्लील नहीं मानते, जिन्हें औरतों का फिल्मों, धारावाहिकों में अश्लील चित्रण उनकी आजादी लगता है, और वे उसे अश्लील बताने वाले को नजर या देखने वाले का दोष कहते हैं, वे कैसे इस कविता को अश्लील मान रहे हैं, पता नहीं।पहली बात जिस पर विरोध है, वह है— छोकरी शब्द। आप जानते होंगे कि महाराष्ट्र में छोकरा-छोकरी शब्द आम बोलचाल का है। इसी तरह ब्रज प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश आदि में प्यार से लड़की को छोरी और लड़कों को छोरा पुकारा जाता है। दूसरी बात है, चूसना शब्द पर आपत्ति। लड़की के संदर्भ में इसे उसके अंग विशेष से जोड़ा जा रहा है और सैक्सुअल व्याख्या की जा रही है। विरोध करने वालों को नहीं पता कि आम की तो एक प्रजाति ही होती है—चौसा। जिसे चूसकर खाया जाता है। यही नहीं, आम जब खरीदकर लाए जाते हैं तो पता होता है किन आमों को चूसकर खाना है और किन्हें काटकर। तीसरी बात है बालश्रम की कि बच्ची टोकरी में आम लेकर उन्हें बेचने जा रही है। ऐसे दृश्य गांवों में आम होते हैं। हां, अंग्रेजी व्याख्याकारों को नहीं पता।मुड़कर बचपन की तरफ देखती हूं। जिस सरकारी स्कूल में पढ़ती थी, वह गांव में था। अब बहुत से बच्चे मौसम के दिनों में अपने-अपने बस्तों में सामान लाते थे। जिसके खेत में ककड़ी उग रही है, वे ककड़ी, जिसके यहां खरबूज तो खरबूज, किसी के पास कचरी तो किसी के पास भुट्टा तो किसी के पास कच्चे आम। अब एक तरीका तो यह होता था कि जो खीरा लाया है, वह दूसरे से उसके बदले ककड़ी ले रहा है, जो अमिया लाया, वह खरबूजा और इस तरह बच्चे चीजों के आदान-प्रदान से सभी फल, सब्जियों का आनंद लेते थे। इनमें बहुत-से बच्चे ऐसे होते थे, जिनके खेत थे ही नहीं। वे अपने घर से दो-चार पैसे लाते थे और उनके बदले इन चीजों को खाते थे। अब आप चाहें तो इन सब बातों को भी बाल श्रम के खाते में डाल सकते हैं। कोई विचार किस तरह से स्टीरियो टाइप बनाता है, उसे इस कविता में बाल श्रम थोपने वालों के नजरिए से समझा जा सकता है। वैसे भी बाल श्रम के मामले में अपने यहां तो फिर भी कुछ कायदे-कानून हैं। जिस चीन को सिर पर बिठाए रखते हो, वह तो किसी कानून को नहीं मानता। बड़ी संख्या में बच्चे खतरनाक उद्योगों में काम करते हैं, मगर चीन के उत्पाद खरीदने में हमें कभी बाल श्रम की याद नहीं आती। इसके अलावा परिवारों में यदि बच्चे घर के कामों में हाथ बंटाते हैं तो यह उनके चहुंमुखी विकास और आत्मनिर्भरता के लिए बेहद जरूरी होता है। बहुत से अतिवादी इसे भी बाल श्रम के खाते में डालते हैं। वे बच्चों को ऐसा देवता बनाना चाहते हैं, जहां उन्हें अपने हाथ भी न हिलाने पड़ें। बाकी के परिवार के लोग उनकी सेवा करते रहें। जबकि डाक्टर्स कहते हैं कि बच्चों को तमाम गम्भीर बीमारियों से बचाना है तो उन्हें बचपन से ही श्रम करने की आदत डालनी चाहिए। जो लोग इस कविता के विरोध में कह रहे हैं कि ऐसी ही कविताएं लड़कियों को सेक्स आब्जेक्ट‍्स की तरह दिखाकर, उनके प्रति यौन अपराध बढ़ाती हैं, क्या उन्होंने कभी उन पोर्न साइट‍्स का विरोध किया है, जो छोटी बच्चियों के प्रति न केवल बच्चों बल्कि वयस्कों को भी अपराधों के लिए प्रेरित करती हैं। इन दिनों तो ऐसी वेबसाइट‍्स भी बड़ी संख्या में मौजूद हैं, जो लोगों को बच्चों के साथ यौन हिंसा के तौर-तरीके बताती हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इन पर कोई रोक भी नहीं लगाई जाती। जबकि अरसे से बच्चों के लिए काम करने वाली संस्थाएं कह रही हैं कि बच्चों के प्रति यौन अपराध बढ़ाने में इस तरह की पोर्न साइट‍्स का मोबाइल, कम्प्यूटर पर फ्री में मिलना, एक बहुत बड़ा कारण है। लेकिन इन साइट‍्स का बंद होना तो दूर, इनकी संख्या बढ़ती ही जाती है।आम की टोकरी कविता एनसीईआरटी की पहली कक्षा की किताब में है। अब इतने छोटे बच्चों को आप प्रसाद की कामायनी या दिनकर का कुरुक्षेत्र नहीं पढ़ाएंगे। ज्यादा से ज्यादा उन्हें अक्षरों और मात्राओं का ज्ञान कराएंगे।कविता-कहानियों के जरिए इन बच्चों को जिन्हें नया-नया अक्षर ज्ञान हुआ है, उन्हें अपने परिवार, पर्यावरण, फसलों, पशु-पक्षियों आदि के बारे में खेल-खेल में ही जानकारी दी जाती है। इस कविता का ढांचा भी बच्चों के आपसी खेल का ही है। फिर टोकरी से छोकरी की तुक भी मिलाई गई है। ऐसी अनेक कविताएं बच्चे रोज खेल-खेल में रचते हैं।

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