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जैसे कप्तानी ली थी, वैसे ही छोड़ी कोहली ने

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मनोज चतुर्वेदी
विराट कोहली ने सात साल पहले जिस तरह से टेस्ट कप्तानी की जिम्मेदारी संभाली थी, कुछ उसी अंदाज में उन्होंने इसे छोड़ने का फैसला किया है। 2014-15 के आॅस्ट्रेलियाई दौरे के बीच ही महेंद्र सिंह धोनी ने जब अचानक टेस्ट कप्तानी छोड़ दी तो विराट कोहली को टीम इंडिया की कमान सौंपी गई थी। इस बार दक्षिण अफ्रीकी दौरे पर रवाना होने से पहले कोहली वनडे कप्तानी से हटाए जाने के ढंग से आहत थे। दौरे से पहले किए गए संवाददाता सम्मेलन में उनके खुलासे से बीसीसीआई अध्यक्ष सौरव गांगुली की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लग गया था। इन सबके बावजूद दक्षिण अफ्रीका टेस्ट सीरीज जीतने में असफल रहने पर भी किसी ने विराट से टेस्ट कप्तानी से इस्तीफा देने की अपेक्षा नहीं की थी।
दिल से लिया गया फैसला : विराट कोहली को हमेशा दिल से फैसला लेने वाले व्यक्ति के तौर पर जाना गया है। टेस्ट कप्तानी छोड़ना भी दिल से लिया गया फैसला ही लगता है। वह वनडे कप्तानी लेने के ढंग से तो निराश थे ही, रवि शास्त्री के कोच पद छोड़ने से उन्होंने ड्रेसिंग रूम में एक मजबूत समर्थक भी खो दिया था। पिछले सात सालों में वह कप्तान के तौर पर जिस तरह से अपनी मर्जी के मुताबिक फैसले करते रहे थे, वह स्थिति आगे रहने की संभावना कम थी और उनके इस्तीफे के पीछे इस तथ्य की भी भूमिका हो सकती है। उन्होंने जिस तरह सोशल मीडिया पर वक्तव्य जारी करके इस्तीफा दिया, उससे भी यह समझा जा सकता है कि उनके बीसीसीआई से संबंध कैसे चल रहे थे। कहा जा रहा है कि केपटाउन के न्यूलैंड्स में तीसरा टेस्ट और सीरीज हारने के बाद ही उन्होंने ड्रेसिंग रूम में टीम के साथियों को अपने इस फैसले की जानकारी दे दी थी और उनसे इस बात को ड्रेसिंग रूम से बाहर न जाने देने का आग्रह किया था। विराट कोहली को वनडे कप्तानी से हटाने के साथ ही रोहित शर्मा को वनडे का कप्तान और टेस्ट टीम का उपकप्तान बनाए जाने से यह साफ हो गया था, अब बीसीसीआई के लिए विराट के मुकाबले रोहित ज्यादा अहम हो गए हैं। संभवत: इसे समझते हुए ही विराट ने समय रहते टेस्ट कप्तानी छोड़ने का फैसला किया। कोहली को टीम इंडिया का हुलिया बदल देने वाले कप्तान के तौर याद किया जाएगा। वह खुद तो पूरी तरह फिट रहते ही हैं, अपने इस विश्वास को समूची टीम की सोच का हिस्सा बनाकर उन्होंने टीम के फिटनेस कल्चर को ही बदल दिया। वह टीम में चार पेस गेंदबाजों का इस्तेमाल करने वाले पहले भारतीय कप्तान बने। उन्होंने टीम के पेस अटैक को किसी भी परिस्थिति में 20 विकेट लेने वाला बनाया। इसी का परिणाम था कि भारत पहली बार आॅस्ट्रेलिया टेस्ट सीरीज जीतने में सफल रहा। यही नहीं इंग्लैंड के पिछले दौरे पर पांचवें टेस्ट के कोरोना के प्रकोप की वजह से स्थगित होने तक भारतीय टीम ने 2-1 की बढ़त बना ली थी। इसमें कोई दो राय नहीं कि विराट की सात सालों की कड़ी मेहनत का ही परिणाम है कि अब टीम कैसे भी हालात में जीतने की सोच रखती है। सही मायनों में विराट ने टीम के सोच को नई आक्रमकता प्रदान की है। इसी का परिणाम है कि हमारे युवा पेस गेंदबाज भी अब विदेश में खेलने के दौरान गेंदबाजी करते समय बल्लेबाज को खा जाने वाली निगाह से घूरने का माद्दा रखते हैं। विराट ने जब 2014-15 में टीम की कमान संभाली थी, तब भारत टेस्ट रैंकिंग में सातवें स्थान पर था। वह टीम को पहली रैंकिंग पर ले ही नहीं गए, उसे पहली पायदान पर पांच सालों तक बनाए भी रखा। पर विराट कोहली को पहली विश्व टेस्ट चैंपियनशिप में भारत को फाइनल तक पहुंचाकर चैंपियन नहीं बना पाने का दर्द हमेशा सालता रहेगा। यही नहीं उन्हें तीनों प्रारूपों में टीम इंडिया का कप्तान रहते हुए कोई आईसीसी ट्रॉफी नहीं दिला पाने का भी मलाल रहेगा। जिस कप्तान ने टीम की सोच को ऐसी धार दी, उसे आक्रामकता प्रदान की, वह यदि बदलाव के दौर से गुजरने वाली दक्षिण अफ्रीकी टीम के खिलाफ सीरीज नहीं जीत पाता है तो उसका मायूस होना स्वाभाविक है। विराट ने माना भी कि बल्लेबाजों के नहीं चल पाने की वजह से भारत यह सीरीज हारा। विराट के कप्तानी से हटने के फैसले के बाद बहुत संभव है कि श्रीलंका के साथ होने वाली घरेलू सीरीज में कई बदलाव देखने को मिलें। इसमें अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा की छुट्टी भी संभव है। वैसे भी टीम के कोच के रूप में राहुल द्रविड़ आ ही चुके हैं और टेस्ट कप्तान के तौर पर रोहित के आने की पूरी संभावना है। इस स्थिति में टीम में बदलाव हो ही सकता है। विराट कोहली को हमेशा देश के सफलतम टेस्ट कप्तान के तौर पर याद किया जाएगा। उन्होंने 68 टेस्ट में भारत की कप्तानी करके 40 टेस्ट में भारत को जीत दिलाई। सफलता के मामले में देश में उनका कोई सानी नहीं है। वह दुनिया के चौथे सबसे सफल कप्तान हैं। उनसे आगे सिर्फ ग्रेम स्मिथ (101 टेस्ट में 53 जीत), रिकी पोंटिंग (77 टेस्ट में 48 जीत) और स्टीव वॉ (57 टेस्ट में 41 जीत) ही हैं।
विश्वास का संकट : इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि देश के सफलतम टेस्ट कप्तान को सीरीज हारकर और विवादास्पद माहौल में जाना पड़ा। अगर विराट और बीसीसीआई के बीच संबंध मधुर होते तो उन्हें श्रीलंका के साथ होने वाली अगली घरेलू सीरीज तक कप्तानी छोड़ने से रोका जा सकता था। इस स्थिति में देश के सफलतम टेस्ट कप्तान की इस जिम्मेदारी से मुक्ति जीत के साथ हो सकती थी। लेकिन जब किसी कप्तान और बीसीसीआई अध्यक्ष के बीच विश्वास का संकट पैदा हो जाए, तो फिर उस स्थिति को लंबा खींचने की वकालत नहीं की जा सकती। इसलिए मौजूदा हालात में नए कप्तान का आना टीम के लिए अच्छा ही है।

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