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प्राकृतिक जलस्रोतों के आस्तित्व ख़तरे में, बचाने के नहीं हो रहे इमानदार पहल

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कुडू और कैरो के मकरा-हूददू पहाड़ी के बीच से निकले झरने का पानी वर्षो से होता रहा है बर्बाद
शाहिर रज़ा खान
कुडू-लोहरदगा: लोहरदगा जिले के पठारी इलाके भले ही प्राकृतिक जल स्रोतों व संसाधनों से परिपूर्ण हो, लेकिन कभी भी इनके संरक्षण की इमानदार पहल नहीं हुई है। शासन-प्रशासन और नेता मंचों से प्राकृतिक जल स्रोतों को बचाने के दावे जरूर करते हैं, लेकिन दावों की हकीकत सिफर ही रही है। जिले के कई इलाके भले ही जल संकट से जूझ रहे हों, लेकिन ऊपर वाले की मेहरबानी है कि आज भी जिले में अनेक ऐसे प्राकृतिक जल स्रोत हैं, जो न सिर्फ भीषण गर्मी में लोगों की प्यास बुझाते हैं, बल्कि प्रकृति की मनोहर छटा भी बिखेरते हैं।
यहां के अद्भुत प्राकृतिक छटाओं के साथ-साथ नयनाभिराम दृश्य भी देखने लायक है। लेकिन सरंक्षण के आभाव और सिस्टम की बेरुखी से इनके आस्तित्व पर ही खतरा मंडरा रहा है। ऐसे ही जंगल और पहाड़ों से घिरे इलाकों में सुमार कुडू और कैरो प्रखंड के सिमाने पर स्थित मकरा और हुददू गाँव है। यह इलाक़ा खूबसूरती की भी मिशाल है। यहां दो पहाड़ों और जंगलों से रिसकर सैंकड़ो फीट ऊंचाई से झरना गिरता है। लेकिन रोक नहीं होने के कारण फर्राटे की गति से निकलता पानी पहाड़ी और मैदान के बीच अपनी जगह बनाते हुए अंत में कोयल नदी में समा जाता है और इसका उपयोग नहीं हो पाता।
परंतु आज तक इसे संरक्षित करने का कभी इमानदार प्रयास नहीं किया गया। अन्य जगहों की तरह यहां भी जैसे-जैसे गर्मी बढ़ती है, पानी की समस्या आन खड़ी होती है। बल्कि यह कहें कि प्रतिवर्ष यह समस्या पहले के मुकाबले और बढ़ जाती है। लेकिन इसे सहेजने और संरक्षित करने के ज़िम्मेवार हमेशा यही सोचते हैं, बस जैसे तैसे गर्मी का सीजन निकाल जाये बारिश आते ही पानी की समस्या दूर हो जायेगी। शायद यही सोचकर झरने के जल को संरक्षित करने के प्रति बेरुखी बन जाते हैं। एक ओर जहां भूमिगत जल का स्तर तेजी से गिरता जा रहा है, ऐसी स्तिथि में पानी की कमी की पूर्ति करने के लिये आज जल संरक्षण की नितान्त आवश्यकता है।
वहीं दूसरी ओर पानी इस तरह बर्बाद भी हो रहे है। गांव के देवनाथ उरांव, विशाल उरांव, हरी उरांव, बिरसा उरांव बुधुआ उरांव, सुरजु मुंडा, मोहन उरांव आदि किसानो का कहना है कि इस झरने के बहते पानी को सहेज कर इस जगह पर चेक डैम के बन जाने से जहां बहता हुआ पानी बर्बाद होने से बचेगा, आसपास के तान, हुद्दु, मकरा आदि गांव की असिचित उपजाऊ भूमि की सिचाई के लिए पानी उपलब्ध होगा वहीं क्षेत्र का जलस्तर में भी इजाफा होगा। यहां भरे पानी में गर्मी में जानवरों को पीने का पानी भी मिल जायेगा।
सरकार की पहल सार्थक हुई तो बदलेगी तस्वीर
हालांकि बीते वर्ष 2020 में मौजूदा झारखण्ड सरकार ने बारिश के पानी को बचाने तथा जल संरक्षण के लिए कवायद तेज करते हुए इसके तहत छोटी नदियों, झरनों, नालों तथा ढालू जमीनों पर चेकडैम जैसी संरचना बनाने की योजना बनाई है, जिससे बारिश के पानी को संरक्षित किया जा सके और भूजल स्तर को ऊपर उठाने में मदद मिल सके। सरकार ने राज्य में वन क्षेत्रों में 390 नए चेक डैम बनाने की तैयारी की है। वन विभाग के इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने मंजूरी दे दी है। कैंपा योजना के तहत प्रस्तावित इस योजना को मंजूरी के लिए भारत सरकार को भी भेज दिया गया है।
गौरतलब है कि वन क्षेत्र में निर्माण और कैंपा योजना के तहत खर्च के लिए केंद्रीय वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है। मिली जानकारी के अनुसार अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक कैंपा झारखंड के पत्रांक10M(05)CAMPAIGN (2020-21) दिनांक 16-3-2021के माध्यम सेवित्तीय वर्ष 2020-21 में कार्यान्वित की जाने वाली विभिन्न कार्ययोजनाओं के सम्पादन हेतु राशि आवंटन की सुचना सभी वन प्रमंडलों को दी गयी है। उम्मीद की जारही है कि वन क्षेत्र में चेक डैम बनने के सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। चेक डैम न सिर्फ वर्षा जल संरक्षण के लिए उपयोगी साबित होगा, बल्कि वन्य जीव और वन क्षेत्र में रहने वाले लोगों के भी काम  आएगा।
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