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महामारी का दुश्चक्र तोड़ने की हो साझा पहल

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दिनेश सी. शर्मा
बीता साल पिछले बारह महीनों में हुए घटनाक्रम का पुनरावलोकन करने का मौका देता है, साथ ही यह अवसर अगले बारह मासों का अंदाजा लगाने का भी होता है। किंतु आज भी जारी कोविड-19 महामारी ने इस कवायद को मुश्किल बना दिया है। पिछले साल का आगाज एक नए वेरियंट ह्यअल्फाह्ण पैदा होने के डर से हुआ था। इसके प्रभाव से बने केसों की शिनाख्त दिसंबर, 2020 में जीनोम सिक्वेंसिंग के जरिए हुई थी। वक्त बीतने के साथ इसका अगला रूप ह्यडेल्टाह्ण उभरा, जो भारत में महामारी की अत्यंत मारक दूसरी लहर का जिम्मेवार था, इसके शिखर पर, 3 मई को देश में 27 लाख से अधिक संक्रमित थे।

इस डेल्टा वेरिएंट ने कई देशों में करोड़ों लोगों को संक्रमित किया था और दुनियाभर में यह कोरोना का सिरमौर घातक रूपांतर रहा। वर्ष 2021 का अंत आते-आते हम इसके नए वेरिएंट ओमीक्रोन के साये से घिरने लगे हैं। फिलवक्त दक्षिण अफ्रीका में यह महामारी का मुख्य वाहक है और तेजी से अन्य जगहों पर फैल रहा है। आलम यह है कि नए रूपांतर आना, जीनोम सिक्वेंसिंग, ट्रैवल एडवाइजरी, अल्प लॉकडाउन और आर्थिकी के पहिए थमना जैसा घटनाक्रम मानो एक चक्र बन गया है। वर्ष 2022 की चुनौतियों में एक होगा, इस दुश्चक्र को तोड़ने की राह निकलना।
हालांकि घटनाक्रम का सिलसिला, जो अब दिख रहा है, वह पिछले साल जैसा लगता है, किंतु इस बार फर्क है। सबसे बड़ा अंतर यह कि अब दुनिया में विभिन्न वैक्सीन और संभावित गोली के रूप में हथियार हैं। 8 दिसंबर, 2020 को यूके की मारग्रेट कीनन विश्व में कोविड-19 की वैक्सीन खोजने वाली पहली साइंसदान बनीं। तब से लेकर कोविड-19 की विभिन्न वैक्सीन के लगभग 900 करोड़ टीके संसार भर में लग चुके हैं। इसमें लगभग 145 करोड़ अकेले भारत में लगे हैं। वैश्विक मेडिकल इतिहास में कोविड वैक्सीनेशन सबसे बड़ी रोग-प्रतिरोधात्मक मुहिम है। बृहद तौर पर यह आंकड़े भले ही काफी प्रभावशाली लगते हैं लेकिन विश्व में व्याप्त असमानता को भी ढांपे हुए हैं। अमीर मुल्कों ने वैक्सीन की सबसे बड़ी मात्रा अपनी ओर खींच रखी है, जहां उनके नागरिकों को बूस्टर के तौर पर तीसरी खुराक मिल रही है वहीं गरीब देशों में वैक्सीन अभियान की गति सोचनीय है। इसी ह्यप्रलयंकारी नैतिक असफलताह्ण का डर विश्व स्वास्थ्य संगठन के अध्यक्ष डॉ. टेडरॉस घेब्रेइसस जताते आए हैं। भारत में, जिन लोगों को वैक्सीन का एक टीका लग चुका है, 26 दिसंबर 2021 तक उनका हिस्सा 60 प्रतिशत था, तो दोनों खुराक पाने वालों की संख्या 41.8 प्रतिशत था। समाज के विभिन्न आय वर्गों में वैक्सीन लगने में कितना फर्क है, इसका डाटा सार्वजनिक डोमेन पर उपलब्ध नहीं है।

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अपनी कमियों के बावजूद कोविड की मौजूदा वैक्सीन नए-नए रूपांतरों के विरुद्ध सबसे कारगर हथियार है। इसलिए ध्यान का केंद्र दोनों टीके लगे लोगों की संख्या तेजी से बढ़ाने के साथ-साथ बूस्टर डोज लगाने पर बनाए रखना होगा। हालांकि पाया गया है कि ओमीक्रोन वैक्सीन की दोनों खुराक पाए लोगों को भी निशाना बनाने में सक्षम है, लेकिन अनुमान है कि ऐसे लोगों में संक्रमण की तीव्रता कम रहेगी। पूरा डाटा आने और अध्ययन के बाद ही दृश्यावली पूरी तरह साफ हो पाएगी। अतएव कोविड के नित नए रूपांतरों के खिलाफ लड़ाई में वैक्सीन अभियान को मुख्य हथियार बनाए रखना जारी रहेगा। भारत में इसको विस्तार देते हुए तरुणों, फ्रंटलाइन वर्करों और अतिरिक्त रोग-ग्रस्त बुजुर्गों को बूस्टर डोज लगाने का काम महत्वपूर्ण बन जाता है। ठीक इसी समय, जिन्होंने एक भी टीका नहीं लगवाया, उन तक पहुंचना बहुत जरूरी है। देखने में आया है कि जिन देशों में अधिसंख्या पूरी वैक्सीन लगवा चुके लोगों की है, वहां चंद बचे लोगों को जरिया बनाकर वायरस नई लहर बना रहा है।

ओमीक्रोन पिछले डेल्टा वेरियंट की तरह तबाहकुन न बनने पाए, इसकी रोकथाम हेतु एक उपाय है कोविड संबंधी आचार-संहिता का पालन करना। वर्ष 2021 के आरंभ में, जब अल्फा की शिनाख्त हुई थी और डेल्टा भारत में कहीं अभी अपने पैर जमा रहा था, उस वक्त लोगों ने ढिलाई बरतनी शुरू कर दी थी। भारतीय वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर आश्वस्तता का भाव था और राजनीतिक नेतृत्व ने तो वायरस पर विजय पाने का समय-पूर्व दावा तक कर डाला था। चुनाव आयोग ने केरल, असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी में विधानसभा चुनाव करवाने की घोषणा कर दी थी। इस प्रक्रिया के तहत बहु-चरणीय चुनावी तिथियों के कारण प्रचार लंबे समय तक खिंचा। सुरक्षित दूरी बनाने और मास्क लगाने की अनिवार्यता के बिना विशाल चुनावी रैलियां हुईं। 27 मार्च से 29 अप्रैल के बीच कई चरणों में मतदान हुआ, चंद दिनों में ही डेल्टा वेरिएंट सारे देश में अपनी पूरी ताब के साथ फैल गया।

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वर्ष 2022 के आरंभ में हम फिर वैसी स्थिति में है, जहां एक ओर नए कोविड रूपांतर ने भारत में अपनी आमद दर्ज करवा दी है वहीं पांच राज्योंझ्रउत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में चुनाव होने जा रहे हैं। लगता है वैक्सीन की ऊंची दर ने ढिलाई वाला व्यवहार बना दिया है, जैसा कि हालिया त्योहारों और छुट्टियों के दौरान देखने को मिला। चुनाव आयोग की घोषणा से पहले ही राजनीतिक दलों ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विशाल रैलियां-जुलूस आदि आयोजित करने की पूरी तैयारी बांध ली है। चुनाव आयोग ने चुनाव-कार्यक्रम घोषित करने से पहले स्वास्थ्य मंत्रालय और संबंधित विशेषज्ञों से महामारी की स्थिति पर राय ली है। विधानसभा चुनाव को कुछ ऐसे तरीके से करवाया जाए ताकि ओमीक्रोन की भावी लहर या नया वेरियंट बनाने में सहायक न बने।
महामारी की शुरूआत के बाद विज्ञान ने तेजी से तरक्की की है, जिससे कि हमें वायरस को गहराई से जानने और इसके व्यवहार के बारे में पता चला है, नए तरीकों, टेस्टिंग किटों और वैक्सीन की खोज हुई है। लेकिन फिर भी हमें अनेकानेक बिंदुओं पर भारत- विशेष अध्ययन की जरूरत है। साथ ही, महामारी प्रबंधन को भी मेडिकल अनुसंधान से परे अन्य विषयों पर भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। हमें वैक्सीन के प्रति झिझक, इंसानी व्यवहार में आए बदलावों, मानसिक स्वास्थ्य आदि पर सामाजिक विज्ञान और महामारी-मनोविज्ञान अनुसंधान की जरूरत है। भारतीय मेडिकल एजेंसियों ने पिछले दो सालों में विशाल डाटा इकट्ठा किया है, इसके विश्लेषण से संभावित हल निकालने में मदद मिलेगी। इसके लिए, डाटा सरकारी विभागों से बाहर के अनुसंधानकतार्ओं से साझा करना चाहिए, लेकिन इस तक मुक्त पहुंच बनाने की बार-बार इल्तिजा के बावजूद सरकार डाटा को गोपनीय रखे हुए है। उम्मीद करें कि जब हम वर्ष 2022 में महामारी के तीसरे साल में दाखिल हो रहे हैं, उक्त रुख में बदलाव होगा।

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