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विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार और उससे आगे! 

राजेंद्र शर्मा

बहरहाल, यह परवर्ती धु्रवीकरण बहुत नहीं चल सकता। इसकी वजह यह है कि ये दोनों ध्रुव, मेहनतकशों के हितों के मामले में वास्तव में एक ही धु्रव बन जाते हैं। इसलिए, फिलहाल विधानसभा में न भी सही, मेहनतकशों की आवाज का धु्रव तो हमेशा ही रहेगा। चुनाव के बाद वामपंथ व संयुक्त मोर्चा के घटकों पर तृणमूल कांग्रेस के शारीरिक हमलों ने, इसकी पुष्टिद्द भी कर दी है।निस्संदेह, विधानसभाई चुनावों के हालिया चक्र की सबसे बड़ी स्टोरी, प. बंगाल को जीतने के मोदी-शाह की भाजपा के अभियान का बुरी तरह से विफल हो जाना है। लेकिन, इस महाभियान की विफलता पर हम जरा बाद में आएंगे। फिलहाल तो सिर्फ इतना याद दिला दें कि चुनाव के इस चक्र में आए दो और ही नतीजे हैं, जो शब्दश: ऐतिहासिक कहलाने के हकदार हैं। और दोनों वामपंथ के संबंध में हैं और उसके भविष्य को लेकर एकदम विरोधी संकेत देते हैं, वास्तव में देश की राजनीति के भविष्य की भी जटिलता की ओर इशारा करता है।इनमें पहला ऐतिहासिक नतीजा तो, केरल की जनता द्वारा सीपीएम के नेतृत्ववाले एलडीएफ को लगातार दूसरी बार सत्ता सौंपा जाना ही है। बेशक, हमारे देश के चुनावी इतिहास में, किसी सत्ताधारी पार्टी या गठबंधन के दोबारा चुनकर आने को, किसी भी तरह से अनोखा नहीं कहा जा सकता है। उल्टे विधानसभाई चुनाव के मौजूदा चक्र में ही, कुल पांच में से तीन विधानसभाओं में पिछली बार के सत्तापक्ष को ही दोबारा जनता का विश्वास हासिल हुआ है। यहां तक कि भाजपा ने इसी में, चुनाव के इस चक्र में मोदी-शाह की जोड़ी का जादू फेल होने और सबसे बढ़कर बंगाल में सब कुछ झोंकने के बाद भी उसकी मुहिम के विफल होने पर, मुंह छुपाने का बहाना ढूंढ़ लिया है। और यह बहाना क्या है? बहाना जिसे केरल के ही वरिष्ठद्द भाजपा नेता और केंद्रीय गृहराज्य मंत्री ने स्वर दिया, यह है कि इस समय ‘सत्तारूढ़ों के पक्ष में आम राष्टद्द्रीय रुझान’ ही है! उसके ऊपर से, ‘ऐसा लगता है कि कोविड की स्थिति ने लोगों को डरा दिया और उन्होंने आम तौर पर सत्ताधारी के बने रहने का पक्ष लिया है।’ यह दूसरी बात है कि बगल में, तमिलनाडु की जनता ने चुनाव के इस चक्र का सबसे बड़ा उलटफेर कर के दिखाया है। हां! भाजपा नेता इस सच्चाई को नहीं देखना चाहेंगे क्योंकि उन्होंने इस चक्र में जिस उलट-फेर के लिए अपने सारे हरबे-हथियार झोंक दिए थे, उसे तो जनता ने जोरदार तरीके से खारिज कर दिया।बहरहाल, केरल में बने इतिहास पर लौटें। जहां देश के अन्य अनेक राज्यों में चुनाव में सत्ता का उलट-फेर, कभी-कभार ही देखने को मिलता है, केरल की जनता का जनतंत्र का आइडिया इससे काफी अलग ही लगता है। पूरी आधी सदी से चले आते, हर विधानसभाई चुनाव में सत्तापक्ष के बदल जाने के सिलसिले के बाद, जिसे एक तरह से पांच साल में सत्ता बदल का अनुल्लंघनीय नियम ही माना जाने लगा था, एलडीएफ ने लगातार दूसरे चुनाव में राज्य की जनता का विश्वास जीत कर दिखाया है। यह सचमुच इतिहास बनाने मामला है।जाहिर है कि केरल में इतिहास भी उसके खास अंदाज में ही बना है। सभी जानते हैं कि केरल के जनमत का बहुत बड़ा हिस्सा, दो मुख्य राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों—सीपीएम के नेतृत्ववाले एलडीएफ तथा कांग्रेस के नेतृत्ववाले यूडीएफ—के बीच काफी स्थायी तरीके से बंटा हुआ है। जनमत का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा ही है, जो चुनावों में इधर से उधर होता है और यह तय करता है कि सत्ता किसे मिलेगी। इसीलिए, लगभग हरेक चुनाव में सत्ता का उलटफेर होने के बावजूद, दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के बीच कुल वोट का फासला कुख्यात तरीके से छोटा ही रहता आया है। लेकिन, इस चुनाव में इसमें भी कुछ बदलाव हुआ है। विधानसभा की कुल 140 में 99 सीटों पर जीत दर्ज कराने वाले एलडीएफ को इस चुनाव में कुल 45.2 फीसद वोट मिले हैं, जबकि यूडीएफ 39.04 फीसद वोट पर ही रह गया है। दोनों मोर्चों में 6 फीसद से ज्यादा वोट का अंतर, केरल के हिसाब से काफी बड़ा अंतर है।इससे भी ज्यादा दिलचस्प तथ्य यह है कि जहां पिछले विधानसभाई चुनाव के मुकाबले में इन दोनों ही मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के मत फीसद में बढ़ोतरी हुई है, वहीं तीसरा ध्रुव बनने के लिए अपनी पूरी ताकत लगाने और मोदी-शाह के सारे प्रचार के बावजूद, भाजपा का मत फीसद और नीचे चला गया है। जहां 2016 के विधानसभाई चुनाव में भाजपा को 15.01 फीसद वोट मिले थे, इस बार के चुनाव में उसका वोट 12.4 फीसद ही रह गया है। इतना ही नहीं, दो विधानसभाई चुनावों के बीच भाजपा को मिला कुल वोट भी 30.20 लाख से गिरकर 25.42 लाख पर आ गया है यानी पिछले विधानसभाई चुनाव में भाजपा को वोट डालने वाले मलयालियों में से, पूरे 4 लाख 78 हजार ने इस बार भाजपा का साथ छोड़ दिया। अचरज की बात नहीं है कि इस चुनाव में भाजपा ने, पिछले चुनाव में मिली अपनी इकलौती सीट भी गंवा दी है। केरल, संभवत: आंध्र के बाद, ऐसा अकेला राज्य है, जहां विधानसभा में भाजपा का खाता खुलने के बाद, फिर से बंद हो गया है। दूसरी ओर, एलडीएफ का वोट, पिछले चुनाव के 43 फीसद से बढ़कर 45.2 फीसद हो गया, जबकि कांग्रेस का 38.79 फीसद से जरा सा बढ़कर, 39.04 फीसद पर पहुंचा है।केरल की जनता के इस ऐतिहासिक जनादेश और दोनों मुख्य प्रतिद्वंद्वियों के जनसमर्थन में बढ़ते अंतर से, ऐसा लगता है कि केरल की जनता ने भाजपा की सांप्रदायिक राजनीतिक को तो बाहर का दरवाजा दिखाया ही है, इसके साथ ही पिनराई विजयन के नेतृत्व में एलडीएफ की सरकार के जनहितकारी काम-काज पर खासतौर पर और वामपंथी राजनीति पर आम तौर पर, अपना भरोसा जताया है। कहने की जरूरत नहीं है कि विजयन सरकार ने जिस तरह पहले राज्य में लगातार दो साल आई बाढ़ की आपदाओं और पिछले एक साल से ज्यादा से जारी कोविड-19 महामारी की चुनौती के सामने, समूची जनता को जनतांत्रिक तरीके से साथ लेकर और कमजोर तबकों का खासतौर पर ध्यान रखते हुए, राज्य के प्रशासनिक-राजनीतिक नेतृत्व का जो मॉडल कायम किया है, उसे केरल की जनतांत्रिक जनता ने स्पष्टद्द रूप से पसंद किया है। यह केरल के राजनीतिक संतुलन को निश्चित रूप से वामपंथ के पक्ष में और झुकाएगा।इस चुनाव का दूसरा ऐतिहासिक नतीजा, केरल के नतीजे के ठीक उलट वामपंथ के लिए एक जबर्दस्त धक्के का सूचक है; प. बंगाल के चुनाव का दूसरा या उप-नतीजा है। यह नतीजा यह है कि नई गठित होने वाली विधानसभा आजादी के बाद से बल्कि आजादी के भी पहले से, बंगाल की ऐसी विधानसभा होगी, जिसमें वामपंथ का प्रनिनिधित्व ही नहीं होगा। 1977 से लगातार 34 साल प. बंगाल में जनता का विश्वास जीतते रहे वाम मोर्चा का इस चुनाव में शून्य पर सिमट जाना, बेशक एक बहुत भारी उलट-फेर है, जिसका प. बंगाल की राजनीति पर काफी दूर तक असर दिखाई देगा। लेकिन, यह भी वामपंथ के बंगाल में फिर से एक बड़ी ताकत के रूप में उठने के और भी मुश्किल हो जाने का सूचक तो है, लेकिन वामपंथ के लिए राज्य की जनता के दरवाजे बंद होने का सूचक नहीं है।ऐसा इसलिए है कि यह तो स्वत: स्पष्टद्द ही है कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस, बंगाल की सत्ता की लड़ाई को सांप्रदायिक व अन्य धु्रवीकरणों के अपने औजारों से, फिलहाल पूरी तरह से द्विध्रुवीय बनाने में कामयाब हो गए हैं। जैैसा कि अनुमान था, भाजपा-विरोधी जनभावना के चलते, इस धु्रवीकरण का ज्यादा फायदा तृणमूल कांग्रेस को ही मिला है। इसका पता इस तथ्य से भी लगता है कि इस चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने जो 53 नई सीटें जीती हैं, उनमें से 29 सीटें पिछली बार कांग्रेस ने जीती थीं और 22 वाम मोर्चे ने। दूसरी ओर तृणमूल ने पिछले चुनाव में जीतीं अपनी पूरी 48 सीटें, भाजपा के हाथों गंवाई हैं।बहरहाल, यह परवर्ती धु्रवीकरण बहुत नहीं चल सकता। इसकी वजह यह है कि ये दोनों ध्रुव, मेहनतकशों के हितों के मामले में वास्तव में एक ही धु्रव बन जाते हैं। इसलिए, फिलहाल विधानसभा में न भी सही, मेहनतकशों की आवाज का धु्रव तो हमेशा ही रहेगा। चुनाव के बाद वामपंथ व संयुक्त मोर्चा के घटकों पर तृणमूल कांग्रेस के शारीरिक हमलों ने, इसकी पुष्टिद्द भी कर दी है। इसी में इस सवाल का उत्तर भी छुपा हुआ है कि क्या बंगाल की इस जीत ने, ममता बैनर्जी को विपक्षी एकता का स्वाभाविक चेहरा बना दिया है। बेशक, विपक्षी एकता को विधानसभाई चुनाव के इस चक्र के नतीजों से काफी बल मिलेगा। कोरोना की दूसरी लहर में इस सरकार ने जिस तरह जनता को भगवान भरोसे ही छोड़ दिया लगता है, उससे यह प्रक्रिया और तेज होगी। फिर भी विपक्षी एकता का चेहरा तो अपने जनहितकारी विजन से कोई विश्वसनीय विकल्प पेश करने वाली कोई राष्टद्द्रीय पार्टी ही हो सकती है, न कि खुद केंद्र की सत्ताधारी पार्टी की राज्यस्तरीय समकक्ष साबित करने में कामयाब हुई, तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टी।

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