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सनसनी नहीं, सटीक खबर

राज्यों व निजी अस्पतालों की जवाबदेही तय हो

अनूप भटनागर
प्राणवायु यानी आॅक्सीजन, संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के मौलिक अधिकार का प्रमुख हिस्सा है। कोरोना काल में इसके लिये देश में जमकर राजनीति हो रही है। कार्यपालिका ने इसमें न्यायपालिका को भी घसीट लिया है। आज न्यायपालिका फैसला कर रही है कि दिल्ली हो या कर्नाटक उसे कितने मीट्रिक टन मेडिकल आॅक्सीजन की रोजाना आवश्यकता है और फिर वह केन्द्र को उतनी ही मात्रा में आक्सीजन आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दे रही है। कर्नाटक को 1200 मीट्रिक टन से ज्यादा आक्सीजन मिल गयी है। दिल्ली को 700 टन मिली, लेकिन अब उसकी मांग 976 मीट्रिक टन पहुंच रही है। गुजरात भी 1600 मीट्रिक टन चाहता है।इस बीच, आॅक्सीजन के आवंटन के मसले की पेचीदगी को देखते हुए शीर्ष अदालत ने राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को वैज्ञानिक, तर्कसंगत और समानता के आधार पर चिकित्सकीय आॅक्सीजन के आवेदन की आवश्यकता महसूस करते हुए 12 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यबल गठित किया है। कार्यबल में विभिन्न प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के चिकित्सकों को शामिल किया गया है। यह कार्यबल देश में आॅक्सीजन की आवश्यकता के आधार पर आॅक्सीजन की उपलब्धता और वितरण की स्थिति का आकलन करके अपनी सिफारिश देगा। कार्यबल राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों को वैज्ञानिक, तर्कसंगत और समता के आधार पर आॅक्सीजन के आवंटन का तरीका खोजेगा। यही नहीं, कार्यबल का लक्ष्य प्रत्येक राज्य को आॅक्सीजन की आपूर्ति के उपयोग के संबंध में आॅडिट करके जवाबदेही के बारे में सिफारिश करना है।विडंबना है कि किसी भी मंच पर राज्यों से यह सवाल नहीं किया जा रहा कि आखिर कोरोना संक्रमण के पहले दौर के बाद उन्होंने अपने यहां स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार और आॅक्सीजन आपूर्ति के लिये क्या कदम उठाये? क्या उन्होंने आॅक्सीजन की आपूर्ति के लिये अनुमानित आवश्यकता के अनुसार टैंकरों की व्यवस्था की थी? यह सही है कि आॅक्सीजन संकट पैदा होते ही केन्द्र सरकार और कुछ औद्योगिक प्रतिष्ठानों ने इसका उत्पादन बढ़ाने के लिये कमर कसी। विदेशों से क्रॉयोजेनिक टैंकरों को वायुसेना के विमानों से मंगाया गया लेकिन इस संकटकाल में राज्यों ने क्या किया?एक सवाल और है कि क्या आॅक्सीजन संकट और बिस्तरों तथा दवाओं की कमी के मामले में राज्य सरकारें और निजी अस्पताल अपनी जवाबदेही से बच सकते हैं। राज्यों और निजी अस्पतालों, जो मरीजों से मोटी रकम लेते हैं, से सवाल किया जाना जरूरी है कि आखिर उन्होंने अपने यहां आॅक्सीजन संयंत्र अभी तक क्यों नहीं लगाये। यह पता लगाना भी जरूरी है कि आखिर देश के कितने अस्पतालों के पास अपने आॅक्सीजन संयंत्र हैं। राज्यों ने निजी क्षेत्र के अस्पतालों को रियायती दरों पर भूमि आवंटित की लेकिन उन्हें अपने यहां आॅक्सीजन संयंत्र लगाने के लिये बाध्य नहीं किया। केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों के अस्पतालों मे भी आॅक्सीजन संयंत्रों की स्थिति कमोबेश ऐसी ही रही और अब पीएम केयर्स फण्ड से एम्स सहित कई अस्पतालों में करीब 550 आॅक्सीजन संयंत्र डीआरडीओ की मदद से लगाये जा रहे हैं।हां, पिछले सप्ताह बंबई उच्च न्यायालय ने जरूर स्थिति की गंभीरता को देखते हुए महाराष्ट्र की उद्धव ठाकरे सरकार से जानना चाहा कि अगर सांगली जैसे शहर में एक अस्पताल अपने यहां आॅक्सीजन संयंत्र लगा सकता है तो प्रदेश के अन्य अस्पताल ऐसा क्यों नहीं कर सकते? उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से यह संयंत्र लगाने पर आने वाले खर्च के बारे में जानकारी मांगी है जो निश्चित ही आॅक्सीजन संकट से उबरने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है और दूसरे राज्यों को भी इससे सीख लेने की आवश्यकता है।कोरोना महामारी की दूसरी भयावह लहर आने से पहले देश में आॅक्सीजन का इतना बड़ा संकट कभी पैदा नहीं हुआ था। इस संकट को देखने के बाद ही जनता को पता चला कि सरकारी अस्पतालों से लेकर बड़े-बड़े निजी अस्पतालों में आॅक्सीजन संयंत्र हैं ही नहीं और जीवनदायिनी प्राणवायु की आवश्यकता पड़ने पर अस्पतालों में भर्ती मरीजों की जीवन डोर निजी आॅक्सीजन आपूर्तिकतार्ओं की आपूर्ति पर टिकी हुई है।एक ओर अस्पतालों में आॅक्सीजन की कमी की वजह से मरीज दम तोड़ रहे हैं और घरों में आॅक्सीजन के सिलेंडर के सहारे जीवित व्यक्तियों के परिजन उन्हें भरवाने के लिये दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर आॅक्सीजन के सिलेंडर की जमाखोरी भी हो रही है।केन्द्र सरकार की सक्रियता और विदेशी सहायता के बाद देश में आॅक्सीजन की स्थिति में सुधार हो रहा है। केन्द्र ने उच्चतम न्यायालय को भी बताया है कि इस समय उसका उत्पादन नौ हजार मीट्रिक टन से ज्यादा है जबकि इसकी मांग करीब छह हजार मीट्रिक टन है। मतलब मांग के मुकाबले गैस की उपलब्धता पर्याप्त है। दिक्कत सिर्फ उसकी ढुलाई में आ रही है। आॅक्सीजन के उपयोग के आॅडिट का सवाल जब पिछले सप्ताह शीर्ष अदालत में उठा तो सबसे पहले दिल्ली सरकार ने इस विचार का विरोध किया था। इस विरोध की वजह समझ से परे थी।उम्मीद की जानी चाहिए कि न्यायपालिका देश में चिकित्सकीय आॅक्सीजन के संकट से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिये अस्पतालों को अपने यहां आॅक्सीजन संयंत्र स्थापित करने का न्यायिक आदेश देगी। देश में उपलब्ध आॅक्सीजन का राज्यों को आवंटन और इसके उपयोग का आॅडिट कराने का न्यायालय का प्रयास निश्चित ही सराहनीय है क्योंकि इससे यह पता लगाया जा सकेगा कि क्या वास्तव में देश में आॅक्सीजन का संकट हो गया था या कुछ राज्यों ने जानबूझकर इस संकट को पैदा किया था।

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