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मजहब (हिन्दू-मुस्लिम) की कुछ ऐसी तकनीक जो दिला सकती है कोरोना से मुक्ति…….डाक्टरी इलाज के साथ ही ये काम आपके लिए है फायदेमंद

अंजनी कुमार कश्यप, भागलपूर

चीन के वुहान की सीमाओं को पार कर पूरी दुनिया में तबाही मचाने वाले कोरोना वायरस (Coronavirus) को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने महामारी घोषित कर दिया है। वहीं देश भर में कोरोनाकाल के बीच तमाम लोग संक्रमण से दो – दो हाथ कर रहे हैं| इस दौरान हर कोई आपस में सभी भेदभाव को भूलाकर एक दुसरे की मदद कर रहे हैं। किसी को ऑक्सीजन की आवश्यकता हो या खून कि या फिर अन्य प्रकार की दवाई और खानपान की| इस विपदा में एक आम इंसान ही पीड़ितों कि मदद करने के लिए फरिश्ता बनकर आता है। इस दौरान कोई जाती या धर्म बीच में अड़चन नहीं बनता। क्योंकि कोई भी “मजहब ये नहीं सिखाता आपस में बैर करना” यानी कि मजहब तो एक दूसरे कि मदद करना ही सिखाता है। वहीं अगर हम ये कहें कि मजहब हमें सिखाता है इस विपदा से लड़ना। तो यह भी शायद गलत नहीं होगा| क्योंकि महामारी का रूप ले चुके इस कोरोना वायरस को शिकस्त देने के लिए हम मजहब भी प्रेरित करता है। वहीं अगर हम जब बात करते हैं मजहब की तो इसमें सभी धर्मों में शारीरिक शक्ति को दुरुस्त रखने के लिए और विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति दिलाने के उपाय है। अगर हम सनातन धर्म की बात करेंगे तो इसमें पूजन विधि बेहद ही जरूरी है। इस दौरान एक शांत स्थान पर बैठकर अपना आसन ग्रहण करने के पश्चात पूजा आरंभ करने का नियम है। इसमें सबसे बड़ी खास बात ये है कि पूजा भीड़ वाले स्थान पर वर्जित है| जिससे समाजिक दूरी भी बनी रहती है| वहीं पूजा में शंख भी बेहद जरूरी होता है। किसी भी प्रकार का पूजन बिना शंख बजाए अगर संपन्न हुआ हो तो वह अधूरा ही माना जाता है। क्योंकि कहा जाता है कि भारतीय संस्कृति में शंख को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। समुद्र मंथन से प्राप्त चौदह रत्नों में से एक शंख भी था। अथर्ववेद के अनुसार शंख से राक्षसों का नाश होता है- शंखेन हत्वारक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। शंख में ओ३म ध्वनि प्रतिध्वनित होती है। ओ३म से ही वेद बने और वेद से ज्ञान का प्रसार हुआ। पुराणों और शास्त्रों में शंख ध्वनि को कल्याणकारी कहा गया है। इसकी ध्वनि विजय का मार्ग प्रशस्त करती है। लेकिन वहीं दूसरी ओर वैज्ञानिकों की मानें तो शंख बजाने के कई शारीरिक लाभ भी हैं। शंख की मधुर ध्वनि से सूर्य की हानिकारक किरणें बाधित होती हैं। इसलिए सुबह और शाम में शंख ध्वनि करने का विधान सार्थक है। इसकी ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक व्याप्त बीमारियों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। इससे पर्यावरण शुद्ध हो जाता है।

शंख बजाने से हृदय रोग में होता है फायदा

वैज्ञानिकों के अनुसार शंख बजाने के पहले लंबा सांस खींचने के साथ ही इसे रोकते हुए शरीर की पूरी ताकत के साथ पुनः इस रोके गए सांस को तेजी से शंख में छोड़ना होता है। जिसके बाद ही शंख से मधुर ध्वनि निकलती है। जिससे आसपास का वातावरण शांत और पूर्ण रूप से पवित्र हो जाता है। वहीं इस दौरान फेफड़ों की अच्छी एक्सरसाइज भी हो जाती है। पूजा पाठ के दौरान नियमित तौर पर शंख बजाने वाले लोगों को गले और फेफड़ों का कोई रोग नहीं होता है। ऐसा माना जाता है कि शंख फूंकने से दिमाग स्वस्थ्य रहता है।

शंख बजाने से वातावरण का परिष्कार

वैज्ञानिकों के अनुसार शंख की आवाज वातावरण के लिए काफी महत्वपूर्ण होती है। शंख की आवाज से वातावरण का परिष्कार होता है। इसके साथ ही हवा में मौजूद कई हानिकारक कीटाणु भी नष्ट हो जाता है।

शंख बजाने से हार्ट प्रॉब्लम की संभावनाएं बेहद कम

वैज्ञानिकों के कई शोधों में यह पता चला है कि शंख बजाने से हार्ट प्रॉब्लम और फेफड़ों की बीमारियों की संभावना कम हो जाती है। इसके साथ जिन लोगों को बोलने में किसी तरह की समस्या आती है उन्हें भी शंख बजाने की सलाह दी जाती है। इसके साथ ही अगर रात में शंख में पानी रखकर सुबह उससे बाल धोया जाय तो इससे बालों की हर समस्या से छुटकारा मिल सकता है। इसके लिए रात को शंख में पानी भरकर रख दें। सुबह इस पानी में गुलाब जल मिलाकर बालों को अच्छे से धोएं| जिन लोगों को उम्र से पहले बाल सफेद होने की समस्या होती है उनके लिए शंख का पानी बेहद लाभकारी माना जाता है। इसके साथ ही शंख आपके चेहरे को खूबसूरत बनाने में काफी मददगार होता है। इसके लिए रात को शंख में पानी भरकर रख दें, फिर सुबह उस पानी से अपने चेहरे की मसाज करें। जिन लोगों को चेहरे पर एलर्जी, सफेद दाग, रैशेज की समस्या होती है उनके लिए शंख का पानी का इस्तेमाल करना काफी लाभदायक माना जाता है। शंख को शास्त्रों में महा औषधि माना जाता है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। जिससे कि इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इस कारण शंख में रखे पानी का सेवन करने से हड्डियां मजबूत होती है। इसके साथ ही यह दांतों को स्वस्थ रखने में भी लाभकारी है। पूजा, यज्ञ एवं अन्य महत्वपूर्ण अवसरों में शंखनाद हमारी परम्परा में रही है। क्योंकि शंख से निकलने वाली ध्वनि तरंगों में हानिकारक वायरस को नष्ट करने की क्षमता काफी अधिक होती है। यही नहीं कहा जाता है कि 1928 में बर्लिन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने शंख ध्वनि पर अनुसंधान करने के बाद इस दावों को प्रमाणित भी किया था। शंखनाद करने के पीछे मूलभावना यही रही थी कि इससे शरीर निरोगी हो जाता है। घर में शंख रखना और उसे बजाना वास्तु दोष को भी समाप्त कर देता है। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम धरोहर है। श्री कृष्ण के पास पार्जन्य, अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंत विजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक शंख था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। वहीं शंखों की शक्ति और चमत्कारों का वर्णन महाभारत और पुराणों में भी मिलता है। शंख को विजय, समृद्धि सुख, शांति, यश, कीर्ति और लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है। वहीं दूसरी ओर प्राकृतिक रूप से शंख भी कई प्रकार के होते हैं। जिसमे दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख और वामावृत्ति शंख ज्यादा प्रमुख हैं।

नमाज़ पड़ने के दौरान भी शरीर में इम्यून सिस्टम मजबूत होता है

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए हमें समय पर भोजन, आराम और व्यायाम की अति आवश्यकता होती है। वहीं अगर हम धार्मिक नियमों के अनुसार चलें तो धर्म चाहे कोई भी हो, लेकिन इसमें पूजन विधि जरूरी है। उदाहरण के लिए हिन्दू धर्म में एक शांत स्थान पर बैठकर पूजा करने का नियम है। इसके अलावा सिख धर्म में यह जरूरी है कि जब भी आप गुरुद्वारा जाएं या पाठ करें तो आपका सिर ढका होना चाहिए। वहीं आज के दौर में भी शरीर को पूरी तरह से ढंककर और बालों को भी ढंक कर हम संक्रमण को आसानी से रोक लेते हैं। इसी तरह इस्लाम धर्म में भी नमाज पढ़ते समय दिशा, स्थान और वस्त्रों का विशेष महत्व होता है। हम किस पोजिशन में बैठकर नमाज़ कर रहे हैं यह भी खासा महत्व रखता है। वहीं नमाज़ के द्वारा हम अल्लाह को तो याद करते ही हैं। लेकिन इसके अलावा नमाज़ के दौरान अपनाए गए अलग – अलग प्रक्रिया से कई वैज्ञानिक लाभ भी हैं।

1 – नमाज़ आरंभ करने पर सबसे पहला पढ़ाव नियत का ही आता है, जिसके अंतर्गत नमाज़ी ( नमाज़ पढ़ने वाला इंसान ) सीधा खड़ा होता है। इस अवस्था में उनके दोनों पैर एक-दूसरे से मिले होते हैं, और वह अपने दोनों हाथों को सामने अपनी छाती से कुछ नीचे रखता है। उनके हाथों की हथेलियां एक-दूसरे के ऊपर होती हैं। जिससे रीढ़ और पैरों से संबंधित रोग में और हड्डी एवं मांसपेशी के दर्द में आराम मिलता है। इसके साथ ही नमाज़ी द्वारा अपनाई गई इस पोजिशन से उनके हृदय को भी काफी लाभ मिलता है। ऐसे में उनके दोनों हाथ हृदय चक्र को बनाते हैं। जिससे उनका दिल सही सलामत काम करता है। दिल के साथ यह तरीका हमारे फेफड़ों के लिए भी लाभकारी है। इसके साथ ही यह पोजिशन हमारी भावनाओं एवं दिमागी इंद्रियों को संतुलित बनाए रखने में मददगार है।

2 – नमाज़ में दूसरी पोजिशन रुकू है| रुकू में नमाज़ी थोड़ा आगे की ओर झुक जाता है, और अपने दोनों हाथों को अपने घुटनों पर रख देता है। नमाज़ का यह आसन योग के आसन ‘अर्ध उत्तनासन’ से काफी मेल खाता है। इस आसन के माध्यम से नमाज़ी को अपनी कमर की मांसपेशियों को दुरुस्त करने में मदद मिलती है। यही नहीं इसमें
कमर दर्द में भी आराम मिलता है। जिन्हें अक्सर कमर दर्द की शिकायत रहती है उन्हें इस आसन को महज़ एक कसरत के तौर पर भी इस्तेमाल करनी चाहिए। इसके अलावा इस आसन में नमाज़ी के पेट एवं पेट से कुछ नीछे के हिस्से पर भी ज़ोर पड़ता है। इससे उनके पेट की कई परेशानियां सरलतापूर्वक खत्म हो जाती है।

3- तीसरी पोजिशन सजदा
नमाज है| सजदा नमाज़ पढ़ने का यह आसन सबसे ज्यादा देखा जाता है। इसमें नमाज़ी ज़मीन पर एक कपड़ा बिछाते हैं और उसपर घुटनों के बल बैठ जाते हैं। इसके बाद वे अपने माथे को ज़मीन पर लगाते हुए अपने शरीर को पूरा मोड़ लेते हैं, ताकि उनका नाक भूमि का स्पर्श कर सके। इस दौरान अधिकतम शारीरिक अंगों पर दवाब पड़ता है| वहीं इस अवस्था में कई बार नमाज़ियों द्वारा अपने दोनों हाथों को अपने मुख के आसपास भी रखा जाता है। नमाज़ का यह आसन सबसे अधिक फायदेमंद माना गया है, क्योंकि इस आसन में व्यक्ति के अधिकतम शारीरिक अंगों पर दवाब डाला जाता है। इससे
पेट संबंधी परेशानियों से मुक्ति मिल जाती है। रुकू की तरह ही सजदा भी योग के ‘वज्रासन’ के समान ही माना गया है। जिसे करने से व्यक्ति की पाचन शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। ऐसे लोग जिन्हें अक्सर पेट में गैस, पेट दर्द, या फिर खाना सही से ना पचने की परेशानी रहती है, उन्हें ये आसन के करने से फायदा मिलता है। पेट के अलावा जब नमाज़ी अपनी नाक को ज़मीन पर लगाते हैं और हाथों को भी चेहरे के आसपास रखते हैं, तो इससे उन्हें ज़मीन के सहारे एक प्रकार की मैगनेटिक फील्ड मिलती है। यह शारीरिक ऊर्जा को बनाए रखने के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध होती है।

16 – आखिरी पोजिशन इसमें
सजदा के बाद नमाज़ी नमाज़ के आखिरी चरण की ओर बढ़ता है। जहां वह अपने स्थान से उठकर सबसे पहले अपने चेहरे को दाईं ओर घुमाता है और फिर बाईं ओर। फिर अंत में दोनों हाथों को आकाश की ओर बढ़ाकर अपनी नमाज़ की अंतिम प्रार्थना करता है। इस दौरान गर्दन और कंधों की मांसपेशियों की कसरत हो जाती है। नमाज़ी इस आखिरी आसन में खासतौर पर अपाने गर्दन पर जोर देते हैं। उनकी गर्दन दाईं-बाईं ओर घूमती है। जबकि उनका धड़ उसी पोजिशन में रहता है जैसे कि सीधे खड़े होने पर था। इससे उनकी गर्दन और कंधों की मांसपेशियों की कसरत भी हो जाती है, और किसी भी प्रकार का दर्द रहने पर वह समाप्त हो जाता है। वहीं दूसरी ओर अगर कोई रोज़ाना नमाज़ करता है तो उन्हें इसका लाभ शारीरिक रूप से मिलता है और इस महामारी में भी नमाज़ कारगर साबित होगा।

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