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प्रेम, काम, वासना और रूप के देव कामदेव

अशोक प्रवृद्ध
भारतीय संस्कृति में धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है। यही कारण है कि विष्णु, शिव के अतिरिक्त काम के देवता कामदेव को भी यहाँ पूजनीय माना गया है। पुरातन ग्रन्थों में कामदेव की महिमा गान से असंख्य पृष्ठ भरे पड़े हैं, और वर्तमान में भी प्रेम प्राप्ति, और प्रेमी- प्रेमिका के सम्बन्ध को मधुरमय बनाने तथा पति- पत्नी के दाम्पत्य सम्बन्ध को प्रेममयी बनाये रखने के लिए कामदेव के पूजन- अर्चा की परिपाटी है। पुरातन काल से ही भारतवर्ष में काम को निकृष्ट नहीं मानकर दैवी स्वरूप प्रदान कर उसे कामदेव के रूप में मान्यता दी गई है। यदि काम इतना विकृत होता तो भगवान शिव अपनी क्रोधाग्नि में काम को भस्म करने के बाद उसे अनंग रूप में पुन: क्यों जीवित करते ? इसका अर्थ यह है कि काम का साहचर्य उत्सव मनाने योग्य है। जब तक वह मयार्दा में रहता है , उसे भगवान की विभूति माना जाता है,लेकिन जब और जैसे ही वह मयार्दा छोड़ देता है तो आत्मघाती बन जाता है , शिव का तीसरा नेत्र (विवेक) उसे भस्म कर देता है। भगवान शिव द्वारा किया गया काम-संहार मनुष्य को यही शिक्षा देता है ,समझाता है। कामदेव के पूजन का उत्तम दिवस अनंग त्रयोदशी की पौराणिक कथा भी शिव के इसी कथा से जुडी हुई है ।विभिन्न पुराणों के अनुसार बहुत प्राचीन काल की बात है जिस समय भगवान शंकर तपस्यासन पर थे, उस समय उनको अपने सत्पथ से विचलित करने के लिए राजाधिराज सम्राट इन्द्र को विशेष चिन्ता हुई । अपने स्वार्थ-साधन के लिए उन्होंने कामदेव से मिलकर शिवजी के तपोमंग का जाल रचा तथा कनक और कामिनी की विकार-संचारी मोहिनी का उपयोग किया । देवताओं के कहने पर कामदेव ने जब शंकर की तपस्या भंग करनी चाही तो उन्होंने तृतीय नेत्र खोलकर अग्नि तेजस उत्पन्न किया और उससे कामदेव जलकर भस्म हो गया था , परन्तु काम की महता और कामदेव की पत्नी रति के रूदन ,अनुनय-विनय व देवताओं के कहने पर शंकर ने कामदेव को पुन: अनंग रूप में जिन्दा कर दिया ।माना जाता है कि भगवान शंकर के द्वारा तृतीय नेत्र खोलने पर भस्म हो गए । परन्तु उनकी पत्नी रति के अति विलाप से करुणाद्रित होकर शंकर के वरदान से कामदेव का अनंग रूप में पुनर्जन्म तथा उनकी पत्नी रति के साथ पुन: मिलन हुआ था। मान्यता है कि कामदेव का अनंग रूप में यह पुनर्जन्म चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को ही हुआ था, इसलिए इस तिथि को कामदेव का पूजन किये जाने की परिपाटी है । पुराणों में भी इनके पूजन का उत्तम दिन अनंग त्रयोदशी को माना गया है।अनंग त्रयोदशी का व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है, इसके अतिरिक्त मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि में आता है। अनंग त्रयोदशी का व्रत प्रेमी जोड़ों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। आज के दिन व्रत रहते हुए भगवान शिव तथा माता पार्वती की पूजा करनी चाहिए। इसके साथ ही कामदेव तथा रति की भी पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। ऐसा करने से प्रेम संबंधों में सफलता प्राप्त होती है। संतानहीन दंपत्तियों को संतान सुख की प्राप्ति होती है।प्रेम और काम के देवता कामदेव की पत्नी का नाम है रति। इन्हें प्रेम, जुनून और मिलाप की देवी माना गया है। मान्यता है कि कामदेव- रति की पूजा-अर्चना से पति-पत्नी के बीच कभी कोई मतभेद नहीं होता और दोनों के बीच उत्तम शारीरिक संबंध पैदा होते हैं जो कि एक खुशहाल दाम्पत्य जीवन के लिए अति आवश्यक भी हैं। मान्यतानुसार कामदेव की पत्नी के पूजन व उनका ध्यान कर किये गये ह्लॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चेह्व – मंत्र के लगातार इक्कीस दिनों तक एक माला अर्थात 108 बार जप से पति-पत्नी के बीच की समस्त प्रकार की दूरियां व नोक -झोक समाप्त हो जाती है और दोनों में नजदीकियां बढ़ जाती हैं। पौराणिक मान्यतानुसार रति का जन्म दक्ष के पसीने की एक बूंद के कारण हुआ था। कथा के अनुसार जब काम के देवता कामदेव ने दक्ष पर कामभावना को उजागर करने का बाण छोड़ा तब दक्ष का सामना अचानक एक सुंदरी संध्या से हुआ। संध्या ब्रह्मा की पुत्री थीं जिन्हें समस्त सुंदरियों में सबसे सुंदर माना जाता था। उनकी सुंदरता देखते ही दक्ष का मन विचलित हो उठा और वह उनकी ओर मोहित हो उठे। इस अनुभव के समय उनके शरीर से पसीने की एक बूंद गिरी। पसीने के उस बूंद के भूमि देवी को स्पर्श करते ही प्रेम और काम की देवी रति का जन्म हुआ। पुराणों के अनुसार रति देवी का रूप बेहद आकर्षक है। वे तन से सुंदर हैं, आकर्षित हैं और शस्त्र धारण कर घोड़े पर सवार हैं। वेदों, उपनिषदों, पुराणों में काम के प्रति सहजता का एक भाव पाया जाता है। सम्पूर्ण पुरातन भारतीय साहित्य काम की सत्ता को स्वीकार करता है और जीवन में काम की महत्वपूर्ण भूमिका को मानकर जीवन जीने की सलाह देता है । पुरातन ग्रन्थों के अध्ययन से इस सत्य का सत्यापन होता है कि प्राचीन काल में वसन्तपञ्चमी का दिन मदनोत्सव और बसन्तोत्सव के रूप में मनाया जाता था। इस दिन स्त्रियाँ अपने पति की पूजा कामदेव के रूप में करती थीं ।वसन्तपञ्चमी के दिन ही कामदेव और रति ने पहली बार मानव हदय में प्रेम एवं आकर्षण का संचार किया था और तभी से यह दिन वसन्तोत्सव तथा मदनोत्सव के रूप में मनाया जाने लगा। आनन्द,उल्लास और लोकानुरंजन के इस उत्सव को मदनोत्सव, वसन्तोत्सव, कामदेवोत्सव, कौमुदी महोत्सव, और शरदोत्सव आदि नामों से पुरातन साहित्य में अंकित किया गया है और इसमें काम और रति की पूजा का विधान है। कालिदास इसे ऋतु-उत्सव भी कहते हैं ।मदनोत्सव का अधिष्ठाता कामदेव को भारतीय शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता माना गया है।उल्लेखनीय है कि प्रेम, काम, वासना और रूप के देव माने जाने वाले कामदेव को भारतीय सभ्यता- संस्कृति और अध्यात्म में एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है तथा उन्हें भारतीय पुरातन ग्रन्थों में प्रेम का देवता माना गया है और अत्यंत प्राचीन काल से भारत में कामदेव की पूजा- अर्चा भी होती आई है। इनके अन्य नामों में रागवृंत, अनंग, कंदर्प, मनमथ, मनसिजा, मदन, समरहरि, चित्तहर ,रतिकांत, पुष्पवान, पुष्पधंव आदि प्रसिद्ध हैं। युवा और आकर्षक स्वरूप वाले कामदेव विवाहित हैं और अत्यंत सुंदर व मनमोहक कामदेव की पत्नी का नाम रति है। कामदेव को देवी श्री के पुत्र और श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न का अवतार माना जाता है जिनका अस्त्र धनुष गन्ने का धनुष और पुष्पों का तीर है तथा सवारी तोता है। कामदेव इतने शक्तिशाली हैं कि उनके लिए किसी प्रकार के कवच की कल्पना नहीं की गई है। कामदेव के आध्यात्मिक रूप को भारत में वैष्णव अनुयायियों द्वारा कृष्ण भी माना जाता है। जिन्होंने रति के रूप में सोलह हजार पत्नियों से महारास रचाया था और व्रजमण्डल की सभी गोपियाँ उन पर न्यौछावर थीं।कामदेव का धनुष प्रकृति के सबसे ज्यादा मजबूत उपादानों में से एक है। यह धनुष मनुष्य के काम में स्थिर-चंचलता जैसे विरोधाभासी अलंकारों से युक्त है। इसीलिए इसका एक कोना स्थिरता का और एक कोना चंचलता का प्रतीक होता है। वसंत, कामदेव का मित्र है इसलिए कामदेव का धनुष फूलों का बना हुआ है। इस धनुष की कमान स्वर विहीन होती है। यानी, कामदेव जब कमान से तीर छोड़ते हैं, तो उसकी आवाज नहीं होती। इसका मतलब यह अर्थ भी समझा जाता है कि काम में शालीनता जरूरी है। तीर कामदेव का सबसे महत्वपूर्ण शस्त्र है। यह जिस किसी को बेधता है उसके पहले न तो आवाज करता है और न ही शिकार को संभलने का मौका देता है। इस तीर के तीन दिशाओं में तीन कोने होते हैं, जो क्रमश: तीन लोकों के प्रतीक माने गए हैं। इनमें एक कोना ब्रह्म के आधीन है जो निर्माण का प्रतीक है। यह सृष्टि के निर्माण में सहायक होता है। दूसरा कोना विष्णु के आधीन है, जो ओंकार या उदर पूर्ति अर्थात पेट भरने के लिए होता है। यह मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देता है। कामदेव के तीर का तीसरा कोना महेश (शिव) के अधीन होता है, जो मकार या मोक्ष का प्रतीक है। यह मनुष्य को मुक्ति का मार्ग बताता है। यानी, काम न सिर्फ सृष्टि के निर्माण के लिए जरूरी है, बल्कि मनुष्य को कर्म का मार्ग बताने और अंत में मोक्ष प्रदान करने का मार्ग भी सुझाता है। कामदेव के धनुष का लक्ष्य विपरीत लिंगी होता है। इसी विपरीत लिंगी आकर्षण से बंधकर पूरी सृष्टि संचालित होती है। कामदेव का एक लक्ष्य स्वयं काम हैं, जिन्हें पुरुष माना गया है, जबकि दूसरा रति हैं, जो स्त्री रूप में जानी जाती हैं। कवच सुरक्षा का प्रतीक है। कामदेव का रूप इतना बलशाली है कि यदि इसकी सुरक्षा नहीं की गई तो विप्लव ला सकता है। इसीलिए यह कवच कामदेव की सुरक्षा से निबद्ध है। यानी सुरक्षित काम प्राकृतिक व्यवहार केलिए आवश्यक माना गया है, ताकि सामाजिक बुराइयों और भयंकर बीमारियों को दूर रखा जा सके।पौराणिक ग्रन्थों में कामदेव के नयन, भौं और माथे का विस्तृत वर्णन अंकित मिलता है। उनके नयनों को बाण अथवा तीर की संज्ञा दी गई है। शारीरिक रूप से नयनों का प्रतीकार्थ ठीक उनके शस्त्र तीर के समान माना गया है। उनकी भवों को कमान का संज्ञा दी गई है। ये शांत होती हैं, लेकिन इशारों में ही अपनी बात कह जाती हैं। इन्हें किसी संग, साथ अथवा सहारे की भी आवश्यकता नहीं होती। कामदेव का माथा धनुष के समान है, जो अपने भीतर चंचलता समेटे होता है लेकिन यह पूरी तरह स्थिर होता है। माथा पूरे शरीर का सर्वोच्च हिस्सा है, यह दिशा निर्देश देता है।हाथी को कामदेव का वाहन माना गया है। लेकिन कुछ पौराणिक ग्रन्थों में कामदेव को तोते पर बैठा हुआ भी अंकित किया गया है। प्रकृति में हाथी एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो चारों दिशाओं में स्वच्छंद विचरण करता है। मादक चाल से चलने वाला हाथी तीन दिशाओं में देख सकता है और पीछे की तरफ हल्की सी भी आहट आने पर संभल सकता है। हाथी कानों से हर तरफ का आवाज सुन सकता है और अपनी सूंड से चारों दिशाओं में वार कर सकता है। ठीक इसी प्रकार कामदेव का चरित्र भी है। कामदेव भी स्वच्छंद रूप से चारों दिशाओं में घूमते हैं और किसी भी दिशा में तीर छोड़ने को तत्पर रहते हैं। कामदेव किसी भी तरह के स्वर को तुरंत भांपने की शक्ति भी रखते हैं।

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