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प्रयागराज के संगम में संयम,श्रद्धा एवं कायाशोधन का कल्पवास

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इलाहाबाद,27 जनवरी (सन्मार्ग) वैश्विक महामारी कोविड़-19 के बीच माघ मेला में पौष पूर्णिमा के पावन पर्व से कल्पवासी संगम में आस्था की डुबकी के साथ ही विस्तीर्ण रेती पर संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन के लिए गुरूवार से कल्पवास शुरू करेंगे।

कुछ कल्पवासी “मकर संक्रांति से माघ शुक्ल की संक्रांति तक कल्पवास करते हैं जबकि 90 से 95 फीसदी कल्पवासी पौष पूर्णिमा से माघी पूर्णिमा तक” कल्पवास करते हैं। “मकर संक्रांति से माघ शुक्ल की संक्रांति तक” कल्पवास करने वालो में मैथिल के साथ बिहार और बंगाल के श्रद्धालुओं के साथ कुछ साधु संत शामिल होते हैं।

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माघ मेला बसाने वाले प्रयागवाल सभा के महामंत्री राजेन्द्र पालीवाल ने कहा कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार और राजस्थान से पिछले वर्ष की तुलना में लगभग कल्पवासी मेला क्षेत्र में पहुंच चुके है। यहां पर वे संयम, अहिंसा, श्रद्धा एवं कायाशोधन का एक मास का कल्पवास करेंगे।

श्री पालीवाल ने बताया कि पुराणों और धर्मशास्त्रों में कल्पवास को आत्मा की शुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए जरूरी बताया गया है। यह मनुष्य के लिए आध्यात्म की राह का एक पड़ाव है। इस दौरान स्वनियंत्रण एवं आत्मशुद्धि का प्रयास किया जाता है। कल्पवासी भौतिक सुखों का त्यागकर मोक्ष की कामना से एक महीने तक संगम गंगा तट पर तीन समय स्नान, रेती पर रात्रि विश्राम, अल्पाहार ध्यान एवं दान के साथ कल्पवास का कठोर तपस्या करते है।

कल्पवास का जिक्र वेदों और पुराणों में भी मिलता है। हालांकि कल्पवास कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। यह मोक्षदायनी विधि की एक कठिन साधना है। इसमें पूरे नियंत्रण और संयम का अभ्यस्त होने की आवश्यकता होती है। पद्म पुराण में इसका जिक्र करते हुए महर्षि दत्तात्रेय ने कल्पवास के नियमों के बारे में विस्तार से चर्चा की है। माना जाता है कि कल्पवास का पालन करके अंतःकरण और शरीर दोनों का कायाकल्प हो सकता है।

वैदिक शोध एवं सांस्कृतिक प्रतिष्ठान कर्मकाण्ड प्रशिक्षण केन्द्र के पूर्व आचार्य डा आत्माराम गौतम ने “यूनीसन्मार्ग”से बताया कि राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास ने “माघ मकरगत रबि जब होई, तीरथपति आब सब कोई। देव दनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहि सकल त्रिबेनी” चौपाई की रचना कर इस बात काे प्रमाणित किया है कि त्रेतायुग में भी संगम नगरी में माघ मेला और कल्पवास की परंपरा आ रही है। लेकिन इस बार वैश्विक महामारी कोरोना का कल्पवास पर असर दिखलाई पड़ रहा है।

गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर संकल्प लेकर निश्चित अवधि तक प्रवास करना कल्पवास कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार कल्पवास की न्यूनतम अवधि एक रात्रि, तीन रात्रि, तीन महीना, छह महीना, छह वर्ष, 12 वर्ष या जीवनभर भी कल्पवास किया जा सकता है। संगम तट पर निवास करते हुए कल्पवासी जप, तप, ध्यान, साधना, यज्ञ एवं दान आदि विविध प्रकार के धार्मिक कृत्य करते हैं। कल्पवास का वास्तविक अर्थ है कायाकल्प। यह कायाकल्प शरीर और अन्तःकरण दोनों का होना चाहिए। इसी द्विविध कायाकल्प के लिए पवित्र संगम तट पर जो एक महीने का वास किया जाता है जिसे कल्पवास कहा जाता है।

आचार्य गौतम ने बताया कि प्रतिवर्ष माघ मास मे जब सूर्य मकर राशि मे रहते हैंए तब माघ मेला एवं कल्पवास का आयोजन होता है। महाभारत के अनुसार सौ साल तक बिना अन्न ग्रहण किए तपस्या करने के फल बराबर पुण्य माघ मास में कल्पवास करने से ही प्राप्त हो जाता है।

उन्होंने बताया कि आदिकाल से चली आ रही इस परंपरा के महत्व की चर्चा वेदों से लेकर महाभारत और रामचरित मानस में अलग-अलग नामों से मिलती है। बदलते समय के अनुरूप कल्पवास करने वालों के तौर-तरीके में कुछ बदलाव जरूर आए हैं लेकिन कल्पवास करने वालों की संख्या में कमी नहीं आई है। आज भी श्रद्धालु भयंकर सर्दी में कम से कम संसाधनों की सहायता लेकर संगम में कल्पवास करने पहुंचते हैं।

कल्पवास के पहले शिविर के मुहाने पर तुलसी और शालिग्राम की स्थापना और पूजा आवश्य की जाती है। कल्पवासी अपने घर के बाहर जौ का बीज अवश्य रोपित करता है। कल्पवास समाप्त होने पर तुलसी को गंगा में प्रवाहित कर देते हैं और शेष को अपने साथ ले जाते हैं। कल्पवास के दौरान कल्पवासी को जमीन पर रात्रि विश्राम करना होता है। इस दौरान फलाहार या एक समय निराहार रहने का प्रावधान होता है। कल्पवास करने वाले व्यक्ति को नियम पूर्वक तीन समय गंगा में स्नान और यथासंभव अपने शिविर में भजन-कीर्तन, प्रवचन या गीता पाठ करना चाहिए।

आचार्य ने बताया कि मत्स्यपुराण में लिखा है कि कल्पवास का अर्थ संगम तट पर निवास कर वेदाध्यन और ध्यान करना है। इस दौरान कल्पवास करने वाले को सदाचारी, शांत चित्त वाला और जितेन्द्रीय होना चाहिए। कल्पवासी को तट पर रहते हुए नित्यप्रति अधिकाधिक जप तप, हाेम और दान करना चाहिए।

समय के साथ कल्पवास के तौर तरीकों में कुछ बदलाव भी आए हैं। बुजुर्गों के साथ कल्पवास में मदद करते-करते कई युवा खुद भी कल्पवास करने लगे हैं। कई विदेशी भी अपने भारतीय गुरुओं के सानिध्य में कल्पवास करने यहां आते हैं। पहले कल्पवास करने आने वाले गंगा किनारे घास-फूस की कुटिया में रहकर भगवान का भजन, कीर्तन, हवन आदि करते थे। लेकिन समयानुसार अब कल्पवासी टेंट में रहकर अपना कल्पवास पूरा करते हैं।

उन्होंने बताया कि पौष कल्पवास के लिए वैसे तो उम्र की कोई बाध्यता नहीं है, लेकिन माना जाता है कि संसारी मोह-माया से मुक्त और जिम्मेदारियों को पूरा कर चुके व्यक्ति को ही कल्पवास करना चाहिए क्योंकि जिम्मेदारियों से बंधे व्यक्ति के लिए आत्मनियंत्रण कठिन माना जाता है।

कुम्भ, अर्द्धकुम्भ और माघ मेला दुनिया का सबसे बड़ा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक मेला है जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इसके लिए किसी प्रकार कोई प्रचार नहीं किया जाता है। पंचांग की निर्धारित तारीख पर लाखो-करोड़ों साधु-संत, पर्यटक, कल्पवासी और श्रद्धालु यहां बिना आमंत्रण और निमंत्रण के पहुंचते है।

आचार्य ने बताया कि प्रयागराज मे जब बस्ती नहीं थी, तब संगम के आस-पास घोर जंगल था। जंगल मे अनेक ऋषि-मुनि जप तप करते थे। उन लोगों ने ही गृहस्थों को अपने सान्निध्य मे ज्ञानार्जन एवं पुण्यार्जन करने के लिये अल्पकाल के लिए कल्पवास का विधान बनाया था। इस योजना के अनुसार अनेक धार्मिक गृहस्थ ग्यारह महीने तक अपनी गृहस्थी की व्यवस्था करने के बाद एक महीने के लिए संगम तट पर ऋषियों मुनियों के सान्निध्य मे जप तप साधना आदि के द्वारा पुण्यार्जन करते थे। यही परम्परा आज भी कल्पवास के रूप मे विद्यमान है।

आचार्य गौतम ने बताया कि महाभारत के एक प्रसंग में मार्कंडेय धर्मराज युधिष्ठिर से कहते हैं कि राजन तीर्थराज प्रयाग सब पापों को नाश करने वाला है। जो भी व्यक्ति प्रयाग में एक महीना इंद्रियों को वश में करके स्नान, ध्यान और कल्पवास करता है, उसके लिए स्वर्ग का स्थान सुरक्षित हो जाता है।

कल्पवास वेदकालीन अरण्य संस्कृति की देन है। कल्पवास के नियम हजारों वर्षों से चला आ रहा है। जब इलाहाबाद तीर्थराज प्रयाग कहलाता था और यह आज की तरह विशाल शहर न/न होकर ऋषियों को तपस्थली माना जाता था। यहां गंगा और यमुना के आसण्पास घना जंगल था। इस जंगल में ऋषिण्मुनि ध्यान और तप करते थे। ऋषियों ने गृहस्थों के लिए कल्पवास का विधान रखा।

उन्होंने बताया कि कल्पवास के नियम के अनुसार जब गृहस्थ कल्पवास का संकल्प लेकर आता है, वह पत्तों और घास-फूस की बनी कुटिया में रहता था जिसे उसे पर्ण कुटी कहा जाता था। इस दौरान एकबार ही भोजन किया जाता है और मानसिक रूप से धैर्य, अहिंसा और भक्तिभव का पालन किया जाता है। कल्पवासी सुबह की शुरूआत गंगा स्नान से करते हैं। उसके बाद दिन में संतो की सत्चर्चा किया जाता है, देर रात तक भजन कीर्तन चलता रहता है। करीब दो महीने से अधिक का समय सांसारिक भागदौड़ से दूर तन और मन को नयी स्फूर्ति देने वाला होता है।

पौष पूर्णिमा पर प्रयागराज माघ मेला का गुरूवार को दूसरा बड़ा स्नान पर्व है। हालांकि इस स्नान पर्व से संगम में स्नान करने के साथ त्याग-तपस्या का प्रतीक कल्पवास आरंभ हो रहा है। देशभर के गृहस्थ संगम तट पर तंबुओं में रहकर माह भर भजन-कीर्तन करना शुरू करेंगे। मोक्ष की आस में संतों के सानिध्य में समय व्यतीत करेंगे। सुख-सुविधाओं का त्याग करके दिन में एक बार भोजन और तीन बार गंगा स्नान करके तपस्वी का जीवन व्यतीत करेंगे।

दिनेश विनोद

सन्मार्ग

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